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Friday, 1 May 2009

राजनीति में टेलीविजन,सरोगेट पार्टी वर्कर है


विज्ञापनों के माध्यम से छवि निर्मिति में सबसे बड़ी सहूलियत है कि इसे जरुरत के अनुरुप बदले जा सकते हैं, इसमें कुछ जोड़े-घटाए जा सकते हैं, नयी छवि पुनःस्थापित की जा सकती है।( डेनिअल बोअर्सटिनः1962,दि इमेज,पेज नं-186-87,न्यूयार्क,एथेनम)। 2004 में आडवाणी की छवि लौह पुरुष के रुप में बनायी गयी,2009 में आते ही वे युवा चेतना से लैश भाजपा के लिए मजबूत नेता यानी पीएम फॉर वेटिंग हो गए।( एनडीटीवी इंडियाः 8.06 बजे,8 अप्रैल,अखबार की कतरन पर लिखा-लौह पुरुषःआडवाणी) यह व्यक्ति के बजाय विज्ञापन के स्तर का बदलाव है। पार्टी कार्यकर्ता द्वारा किसी प्रत्याशी की छवि इतनी जल्दी नहीं बदली जा सकती लेकिन राजनीतिक विज्ञापन इसे संभव कर देता है।
छवि आधारित राजनीति का सबसे जरुरी पहलू है कि मतदाता अपने प्रत्याशी को किस रुप में देखना चाहता है। एक मतदाता टेलीविजन के माध्यम से भी अपने प्रत्याशी को देख रहा होता है तो उस पर दृश्य माध्यम का असर ज्यादा होता है। इसलिए पार्टी या उसकी स्वयं की विचारधारा, पारिवारिक या सामजिक पृष्ठभूमि,नेतृत्व क्षमता और यहां तक कि उसके अन्तर्वैयक्तिक संचार के तरीके को विजुअल्स रुप में दिखाने की कोशिशें होती हैं।( डैन एफ हॉनः1972,पॉलिटिकल मिथः दि इमेज एंड दि इश्यू. पेज न-57 टूडेज स्पीच 20,समर)। कांग्रेस अपने दोनों विज्ञापनों ( “तिनक तिनक तिन हाथ” और “जय हो”) में इसे विस्तार से स्थापित करती है। दोनों विज्ञापन मुख्य रुप से मनमोहन सिंह और राहुल गांधी को आदर्श प्रत्याशी के तौर पर स्थापित करना चाहता है. यह अलग बात है कि भाजपा की तरह कांग्रेस का कोई भी विज्ञापन प्रत्याशी केंद्रित न होकर पार्टी केंद्रित है। विज्ञापन राहुल गांधी को भाषण देते हुए,लोगों से मिलते-जुलते और बात करते हुए दिखाता है,मनमोहन सिंह भाषण देने की मुद्रा में मंच की ओर बढ़ते हैं, सक्रिय दिखाई देते हैं। दोनों प्रत्याशियों की पृष्ठभूमि को स्थापित करने के क्रम में कस्तूरबा गांधी, नेहरु,लालबहादुर शास्त्री,इंदिरा गांधी और राजीव गांधी जैसे राजनीतिक व्यक्तित्व के विजुअल्स शामिल किए गए हैं,प्रत्येक के साथ जुड़ी गतिविधियों को गाने के रुप में प्रस्तुत किया जाता है जिससे मतदाता-दर्शक को हिन्दुस्तान की तस्वीर बदल देनेवाले लोगों की परंपरा से जुड़ने का बोध पैदा हो। कांग्रेस इन विज्ञापनों के माध्यम से अपनी ऐतिहासिकता( जो उसके पक्ष में है) को विज्ञापित करती है।
राजनीतिक विज्ञापनों में मतदाता-दर्शक के महत्व को स्पष्ट करते हुए फिलिप कोटलर का मानना है कि पॉलिटिकल मार्केटिंग में प्रत्याशी को इस बात पर विशेष ध्यान देना होता है कि मतदाता क्या चाहता है बजाए इसके कि वो अनुमान लगाते रहे कि मतदाता क्या सोचता और चाहती है। (माउसरः1988,मार्केटिंग एंड पॉलिटिकल कैम्पेनिंगःस्ट्रैटजी एंड लिमिट्स,पेज नं-vii बेलमांट,बॉड्सवार्थ)। हमारे देश का मतदाता क्या चाहता है,इसकी अभिव्यक्ति मोबाइल फोन के एक विज्ञापन से बेहतर तरीके से हो जाती है। मंत्रीजी हमसे पूछ रही है कि खेतों में शॉपिंग मॉल बनना चाहिए कि नहीं,जनता ने कहा- न तो न। स्पष्ट है कि लोकतंत्र की राजनीति में मतदाता को प्राथमिकता के स्तर पर लिए जाने चाहिए । मतदाता चाहता कि देश के भीतर जो भी छोटे-बड़े फैसले हों,उनमें उनकी राय शामिल की जाए। इसलिए राजनीतिक विज्ञापन समाज के अलग-अलग हिस्सों और तबके के लोगों को शामिल करती है। विज्ञापन चाहे जिस भी पार्टी के क्यों न हो अधिक से अधिक लोगों के विजुअल्स को दिखाया जाना अनिवार्य समझा जाता है। इसे आप मायावती के पक्ष में जारी विज्ञापन में देख सकते हैं। बहुजन का हित जानते हैं/सर्वजन को मानते हैं/कौन की बात पुरानी/इंसानियत पहचानते हैं/जाति धर्म को भूल चुके हैं/मेरे पास उनका साथ है/( स्टार न्यूजः23 फरवरी,9.29 बजे रात)। कांग्रेस इसे और अधिक रचनात्मक तरीके से प्रस्तुत करता है. एक युवा दीवार पर कई रंगों को मिलाता है और फिर दूसरे से सवाल करता है, बताओ इसमें कितने रंग हैं। इससे कांग्रेस की छवि सांप्रदायिक सद्भावना और मिली-जुली संस्कृति को प्रोत्साहित करनेवाली पार्टी के रुप में बनाने की कोशिश है।(एनडीटीवी इंडियाः8.46 बजे 9 अप्रैल)
देशभर की राजनीतिक पार्टियों के साथ एक आम समस्या है कि वह अपने प्रत्याशी को दूसरे प्रत्याशी से बेहतर बताए इसके पहले राजनीतिक व्यक्ति होने की छवि को(चाहे जिस किसी भी पार्टी का क्यों न हो) साकारात्मक रुप में कैसे स्थापित की जाए। बैटरी के एक विज्ञापन में यहां के राजनीतिक व्यक्ति की छवि इस प्रकार है- हमरा वादा रहा,चौबीस घंटे बिजली....बस पांच साल और। जनता- इलेक्सन तो आता जाता रहता है लेकिन बिजली तो जाती ही है।(जी न्यूजः 10.15बजे रात,10 अप्रैल,एक्साइड इन्वर्टिकुलर का विज्ञापन ) । राजनीतिक विज्ञापन इस छवि को तीन कारकों के माध्यम से बेहतर करने की कोशिश करता है। 1.उच्च योग्यता सच्चरित्र और उर्जावान 2. अन्तर्वैयक्तिक आकर्षण या प्रभावी व्यक्तित्व और 3. सहजता( ट्रेंट जूडिथ,रॉबर्ट फ्रेडेनवर्गः1983, पॉलिटिकल कैम्पेन कम्युनिकेशनः प्रिंसिपल एंड प्रैक्टिसेज, पेज न-75 न्यूयार्क प्रेइगर)। इसलिए टेलीविजन के विज्ञापनों में दिखाए जानेवाले राजनीतिक व्यक्तित्व को पोशाक, हाव-भाव,प्रस्तुति और अंतर्वैयक्तिक व्यवहार के स्तर पर विशिष्ट दिखाने की कोशिशें की जाती है। यह न सिर्फ एक प्रत्याशी को बेहतर रुप में प्रस्तुत करने की कोशिश होती है बल्कि राजनीतिक व्यक्ति की छवि को मरम्मत करने का भी काम होता है। इस दृष्टि से राजनीतिक विज्ञापनों की अनिवार्यता बढ़ जाती है।
मौजूदा चुनाव में राजनीतिक विज्ञापनों की अनिवार्यता के संदर्भ में मैक् कैबी का मानना है कि मुझे तो इस बात पर हैरानी होती है कि जो इंसान अपने पक्ष में जोरदार विज्ञापन नहीं कर सकता,वह किसी देश को कैसे नियंत्रित कर सकता है।( सं. मैक् कैबीः1988,दि कैम्पेन यू नेवर शॉ,पेज 48,न्यूयार्क 12 दिसंबर)। मैक् कैबी की इस मान्यता से स्पष्ट है कि चुनाव अब सिर्फ जनसम्पर्क,मुद्दे और राजनीति के आधार पर लड़े औऱ जीते नहीं जा सकते। छवियों की इस लड़ाई में, राजनीतिक विज्ञापनों का प्रयोग अब नैतिकता के सवाल और बहस से बाहर, व्यावहारिक दृष्टिकोण का मामला बनता जा रहा है। सारा जोर इस बात पर है कि कौन कितने बेहतर तरीके से अपनी छवि प्रस्तुत कर सकता है। राजनीतिक पार्टियों और प्रत्याशियों के बीच का सारा तनाव इस बात को लेकर है कि वे किस रुप में दिखें( क्या हैं इसकी चिंता किए बगैर) जिससे कि चुनाव में उनके पक्ष में आधार बने। (डेनिअल बोअर्सटिनः1962,दि इमेज,पेज नं-186-87,न्यूयार्क,एथेनम). छवियों की इस लड़ाई का एक उदाहरण कांग्रेस के “जय हो” और बीजेपी द्वारा इसके विरोध में बनाए गए “भय हो” के विज्ञापन में आसानी से मिल जाते हैं। कांग्रेस के इस विज्ञापन में विकास कार्य की एक लंबी फेहरिस्त है- देख लो/कर दिखाया/नयी सड़को से ये विकास/देख लो,अरे कर लो,तुम भरोसा/रोजगार का हक है तुम्हारे पास/उंची शिक्षा,स्वास्थय का धन है/( यूट्यूब)। इसके जबाबी कार्यवाई के रुप में भाजपा की ओर से प्रसारित विज्ञापन है-
रत्ती रत्ती सच्ची हमने जान गंवाई है/भूखे पेट जाग-जाग रात बिताई है/मंदी की मार में,नौकरी गंवा दी/मंदी हो/आतंक हो/मंहगाई हो/फिर भी जय हो/
इसके साथ ही बीजेपी ने इसे ट्रेन एक डिब्बे में फिल्माकर यह स्थापित करने की कोशिश की है कि देश के आम आदमी की क्या स्थिति है। भय हो गानेवाले बच्चे को देखकर आपको पुरुलिया और मिर्जापुर के रास्ते खाली बोतलें बटोरनेवाले बच्चों का ध्यान आ जाएगा। इस मुकाबले कांग्रेस का जय हो विज्ञापन प्रायोजित जान पड़ता है जबकि बीजेपी का विज्ञापन प्रायोजित होने के वाबजूद भी स्वाभाविक नजर आता है।
मूलतः नया ज्ञानोदय मई 09 में प्रकाशित
टेलीविजन,राजनीतिक विज्ञापन और छवि निर्माण का लोकतंत्र
आगे भी जारी...

Wednesday, 29 April 2009

टेलीविजन,राजनीतिक विज्ञापन और छवि निर्माण का लोकतंत्र


मूलतः प्रकाशित नया ज्ञानोदय मई 09
सिनेमा के जिस गाने के दम पर पूरी दुनिया का दिल जीता जा सकता है, ऑस्कर जीते जा सकते हैं, तो फिर उसी गाने के बूते देश की जनता का मन और लोकसभा चुनाव क्यों नहीं? अपने चुनावी विज्ञापन के लिए,स्लमडॉग मिलेनियर के गीत ‘जय हो’ की कॉपीराइट खरीदनेवाली राजनीतिक पार्टी की इस समझदारी पर आप चाहें तो हंस सकते हैं, अफसोस जाहिर कर सकते हैं कि मौजूदा राजनीति में लोकतंत्र के सच और मनोरंजन की फंतासी में कोई फर्क नहीं रहने दिया गया है। आप चाहें तो इसके विरोध में विपक्षी दल की पैरॉडी में शामिल हो सकते हैं जहां जय हो के बदले भय हो की बात की जा रही है, जहां चतुर्दिक विकास और जय हो के लोकतंत्र का पर्दाफाश करते हुए भूख,गरीबी,मंदी औऱ आतंकवाद के बीच लथपथ एक लाचार लोकतंत्र दिखाया जा रहा है लेकिन इस बात से इन्कार नहीं कर सकते कि टेलीविजन औऱ राजनीतिक विज्ञापनों के गठजोड़ से लोकतंत्र की राजनीति की जो शक्ल उभरकर सामने आ रही है, वह प्रत्याशी,पार्टी कार्यकर्ता और मतदाता के सीधे हस्तक्षेप से बननेवाले लोकतंत्र से बिल्कुल अलग है। इसे आप चाहें तो वर्चुअल डेमोक्रेसी या फिर पिक्चर ट्यूब से पैदा हुआ लोकतंत्र कह सकते हैं जहां मतदाता के तौर पर हम सबकी सक्रियता का अर्थ इस बात से है कि कि ज्यादा से ज्यादा टेलीविजन देखें,उस पर बननेवाली राजनीतिक पार्टियों और प्रत्याशियों की छवियों को समझें,विज्ञापन के चिन्हों पर गौर करें और इस आधार पर राजनीतिक समझ तैयार करें। पिछले दो-तीन सालों से टेलीविजन की संवादधर्मिता बढ़ी है इसलिए चाहें तो फोनो के माध्यम से सवाल-जबाब कर सकते हैं। ऐसा करते हुए हम वर्चुअल डेमोक्रेसी की गतिविधियों में शामिल होते हैं और इस स्तर पर अपने को सक्रिय मतदाता मानते हैं। सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों में सीधे हस्तक्षेप के बजाय माध्यमों के स्तर पर सक्रिय होने की इस स्थिति को आर्मन्ड ने “क्राइसिस ऑफ पब्लिक कल्चर” के रुप में विश्लेषित किया है।( आर्मन्ड मैटेलार्टः1991,पेज न-196, एडवर्टाइजिंग इंटरनेशनलः दि प्राइवेटाइजेशन ऑफ पब्लिक स्पेस,राउट्लेज,11 न्यू फीटर लेन,लंदन EC4P 4EE)।
टेलीविजन की ताकत इस बात में है कि वह हमें बिना किसी धक्का-मुक्की वाले चुनावी रैलियों में शामिल हुए, बिना किसी पार्टी के पक्ष में नारे लगाए ,किसी प्रत्याशी के लिए हाय-हाय किए बिना और चुनावी वायदों पर वाह-वाह किए बिना ही हमें सजग मतदाता औऱ नागरिक होने का अहसास कराता है। यह,एक सुरक्षित औऱ सुविधाजनक मनोदशा में हमें राजनीति से जुड़ने का अवसर मुहैया कराता है। टेलीविजन में इस बात की क्षमता है कि यह “मास वोटर/ऑडिएंस”( अलग-अलग मनस्थिति और विचारधारा के लोग,एक-दूसरे से अपरिचित किन्तु माध्यम के स्तर पर एकजुट होनेवाले लोग) को छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित करने का काम करता है जिससे कि लक्ष्य-मतदाता के रुप में राजनीतिक विज्ञापनों का असर उन पर हो सके। टेलीविजन की यही ताकत राजनीतिक पार्टियों को अपने पक्ष में विज्ञापन करने के लिए उकसाती है औऱ आज नतीजा यह कि देश की अधिकांश राजनीतिक पार्टियां और प्रत्याशी टेलीविजन के माध्यम से लोकतंत्र की राजनीति करना चाहते हैं। यहां आकर टेलीविजन “सरोगेट पार्टी वर्कर” के रुप में काम करने लग जाता है।( रॉबर्ट एग्रनॉफः1977,दि न्यू स्टाइल इन इलेक्शन कैम्पेन्स,दूसरा संस्करण,पेज न-4-6,हॉलब्रुक प्रेस-बॉस्टन)।
दूसरी बात, यह जानते हुए भी कि मनोरंजन के पॉपुलर रुपों,फिल्मी गीतों,संवादों,हस्तियों और छवियों को स्क्रीन पर उतारकर स्वयं टेलीविजन राजनीतिक पार्टियों के पक्ष में हमसे वोट मांगने का जो काम कर रहा है, इसका सरोकार हमारी जमीनी हकीकत औऱ जरुरतों को समझने से नहीं है, राजनीतिक पार्टियां अपने पक्ष में विज्ञापन करके विकास के नाम पर जो कुछ भी दिखा रही हैं उसकी कल्पना हम और आप सिर्फ राम राज्य के मिथक के भीतर ही रहकर सकते हैं, आज विपक्षी दल, विकास को जय हो का लोकतंत्र के रुप में दिखाए जाने से परेशान हैं, इससे ठीक पहले के लोकसभा चुनाव में उसने भी साम्प्रदायिकता, बेरोजगारी और असुरक्षा के उपर इंडिया शाइनिंग का मुलम्मा चढ़ाया था, समाचार चैनल भी जो मतदाता के रुप में हमें सबसे ताकतवर साबित करने में जुटे हैं, इनका मकसद भी टीआरपी के पास आकर ठहर जाएगा, वाबजूद इसके हम टेलीविजन पर यह सब लगातार देख रहे हैं। हमारे पास इन सबों को गैरजरुरी और प्रवंचना साबित करने के कई आधार हैं लेकिन वाबजूद इसके हम टेलीविजन की इन गतिविधियों से घिरे रह जाते हैं और देश की एक बड़ी आबादी इसे ही समझदारी का आधार मानती है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि राजनीति सहित बाकी सामाजिक मसलों पर जब हम विचार करते हैं तब हमारी हैसियत एक नागरिक या मतदाता की होती है जबकि टेलीविजन पर उससे जुड़े विज्ञापनों को देखते हुए हमारी भूमिका एक दर्शक में बदल जाती है। हम दर्शक होने की सुविधा से अपने को मुक्त नहीं कर पाते हैं और एक हद तक हमारी समझ टेलीविजन में शामिल रंगों,आकृतियों,प्रस्तुति और ध्वनियों के आधार पर बननी शुरु होती है और हम इसे बाकी के कार्यक्रमों के रुप में ही देखना शुरु करते हैं। यहां आकर विचारधारा औऱ मुद्दों की जगह पार्टी के चिन्ह ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं। कांग्रेस के विज्ञापन में हाथ( आओ तुम्हें दिखाएं इस हाथ की करामात,आजतकः9.07 बजे रात,21 मार्च और बीजेपी के पहचान है,अभिमान है के विज्ञापन में कमल बार-बार बिजली की तरह चमकता है,इंडिया टीवी,8.14 बजे,29 मार्च। राजनीतिक विज्ञापनों और टेलीविजन का हमारे इस बदले रुप का भरपूर लाभ मिलता है और वे धीरे-धीरे नागरिक जरुरतों और सवालों की शिफ्टिंग, दर्शक की पसंद-नापसंद के रुप में करते चले जाते हैं। राजनीति विज्ञापन छवि निर्माण का काम दर्शक की इसी स्थिति के भीतर करता है। मसलन असल जिंदगी में लालकृष्ण आडवाणी के स्वास्थ्य की स्थिति क्या है,राजनीतिक विज्ञापन को इससे कोई खास मतलब नहीं है. उसे बस कुछ ऐसे विजुअल्स चाहिए जिसमें वे एक स्वस्थ और प्रभावी प्रत्याशी लगें क्योंकि टेलीविजन पर मतदाता/दर्शक हर हाल में अपने भावी प्रधानमंत्री को स्वस्थ, मजबूत और प्रभावी राजनीतिक व्यक्तित्व के रुप में देखना चाहते हैं। राजनीतिक पार्टियों द्वारा विज्ञापन पर करोंड़ों रुपये खर्च करने के पीछे का एक ही उद्देश्य होता है कि वह नागरिक की जरुरतों और दर्शक की पसंद,छवि और वास्तविकता के बीच में घालमेल कर दे ताकि उसे मुद्दों और मतदाता के प्रति जबाबदेही से हटकर छवि आधारित लोकतंत्र की राजनीति करने में सुविधा हो ।
माध्यम और राजनीतिक विज्ञापनों की अनिवार्यता की राजनीति के बीच से मुद्दों के बजाय छवियों को स्थापित करने की वड़ी वजह यही है कि राजनीति पार्टियां देश के मतदाताओं का दिल पहले दर्शक के स्तर पर जीतना चाहती हैं उसके बाद इसकी डिकोडिंग मतदाता के रुप में करना चाहती है। इस संदर्भ में रिचर्ड किरवी की मान्यता को समझना जरुरी है। किरवी,चुनाव में मुद्दों के नहीं होने को समस्या के बजाय एक बदलाव की स्थिति मानते हैं। उनके अनुसार अब किसी भी चुनाव में मुद्दे के मुकाबले- प्रत्याशी, नेता और राजनीतिक पार्टी का मूल्य ज्यादा है। इसलिए चुनाव अब मुद्दों के आधार पर की जानवाली राजनीति के बजाय छवि,रणनीति और चाल आधारित प्रतियोगिता है। मतदाता अब मुद्दों से ज्यादा छवि से प्रभावित होते हैं.( विलियम लीज, क्लीन, जैलीः 1990,सोशल कम्युनिकेशन इन एडवर्टाइजिंगः पर्सन,प्रोडक्ट्स एंड इमेज ऑफ वेल विइंग, पेज नं-309,राउट्लेज,11 न्यू फीटर लेन,लंदन EC4P 4EE)। बीजेपी की पंचलाइन- मजबूत नेता,निर्णायक सरकार में कहीं कोई मुद्दा नहीं है। यहां पूरी तरह एक प्रत्याशी की छवि को स्थापित करने की कोशिश है। यानी लोकतंत्र की राजनीति, विज्ञापनों और टेलीविजन की दुनिया में छवि निर्माण और नियंत्रण का खेल है। ऐसा होने से लोकतंत्र की राजनीति के भीतर एक प्रबंधन की शोली तेजी से पनप रही है जिसे कि अब पॉलिटिकल मार्केटिंग के अन्तर्गत विश्लेषित किया जाने लगा है। यहां भी उपभोक्ता व्यवहार के आधार पर सर्वे कराए जाते हैं और फिर रणनीति और विज्ञापन बनाए जाते हैं। उपभोग के लोकतंत्र की तरह यहां भी विज्ञापन के जरिए मतदाताओं को राजनीतिक पार्टी और प्रत्याशी के पक्ष में रिझाने के काम किए जाते हैं।( गैरी माउसरः1988,मार्केटिंग एंड पॉलिटिकल कैम्पेनिंगःस्ट्रैटजी एंड लिमिट्स,पेज नं-2 बेलमांट,बॉड्सवार्थ)।
आगे भी जारी....

Monday, 27 April 2009

पिक्चर ट्यूब का लोकतंत्र




न्यूज 24 की रिपोर्टर शैलजा सिन्हा ने लगभग दस लोगों से ये सवाल किया कि चुनावी महौल में नेता लोग मुद्दों पर बात न करके एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने में लगे हैं। कभी मनमोहन सिंह आडवाणी के बारे में कुछ कहते हैं तो कभी आडवाणी मनमोहन सिंह के बारे में कुछ कहते हैं। आप इस बारे में क्या सोचते हैं?
लड़कों के हॉस्टल(ग्वायर हॉल,दिल्ली विश्वविद्यालय)में मौजूद डूसू की एक्स प्रेसीडेंट रागिनी नायक सहित बाकी लोगों ने कहा कि ऐसा नहीं होना चाहिए। नेताओं को चाहिए कि वे मुद्दों पर बात करें। लोगों का मानना रहा कि गरीबी,आतंकवाद,आर्थिक मंदी सहित ऐसे दर्जनों मुद्दें हैं जिस पर की बात की जानी चाहिए लेकिन आज मुद्दा आइपीएल बन गया है,एक-दूसरे को भला-बुरा कहना और कोसना बन गया है। एक मीडिया स्टूडेंट होने के नाते मेरी अपनी जो समझदारी बनी उसे मैंने कुछ इस तरह रखा-
देखिए,इसमें पूरा मामला जो है जिस डेमोक्रेसी या लोकतंत्र की बात कर रहे हैं ये इमेज बिल्डिंग की डेमोक्रेसी है। ये छवि बनाने,बिगाडने,करप्ट और इन्जस्ट करने की डेमोक्रेसी है। इसलिए आज छवि इतना ज्यादा जरुरी हो गया है। मुद्दों पर राजनीति हो ही नहीं रही है और जैसे-जैसे अन्य माध्यमों का विकास होगा,मुद्दे की राजनीति खत्म हो जाएगी। आप देखिए कि क्यों करोड़ों रुपये लगाकर इतने विज्ञापन बनाए जा रहे हैं? क्यों वर्चुअल स्पेस जेनरेट किया जा रहा है? उसमें आडवाणी की कहें या राहुल गांधी की कहें,ऐसी छवि बनायी जो रही है जो जोश से लवरेज है। वो रातोंरात हिन्दुस्तान को बदल देने का जज्बा रखता है। लेकिन दूसरी तरफ ये भी देखिए कि वही इंडिया शाइनिंग करोड़ों रुपये लगाने के बाद भी पिट जाता है। जब तक इस इमेज बिल्डिंग की डिकोडिंग पर्सनल लाइफ में वोटर टू वोटर नहीं होगा,एक ऑडिएंस को जब तक मतदाता के रुप में कन्वर्ट नहीं करेंगे,ये इमेज बिल्डिंग आधारित डेमोक्रेसी जो बन रही है,ये बुरी तरह पिट जाएगी। इसलिए
मुद्दों का नहीं होना जैसा कि मेरे कुछ दोस्तों ने कहा,कोई बड़ी समस्या नहीं है। आनेवाले समय में सारे मुद्दे गायब हो जाएं,कोई बात नहीं। जरुरत सिर्फ इस बात की है कि आप जो छवि बना रहे हैं, टेलीविजन के जरिए,विज्ञापन के जरिए,उसकी डिकोडिंग मतदाता के सामने हो जाए बस।
आज से चार दिन पहले एनडीटीवी इंडिया के कार्यक्रम विनोद दुआ लाइव में अपूर्वानंद(प्राध्यापक और समाजशास्त्री,डीयू ) ने विज्ञापन आधारित राजनीति पर चिंता जताते हुए कहा कि- हमारी चिंता इस बात की है कि इस तरह की राजनीति से राजनीतिक व्यक्तियों से आम जनता का संवाद धीरे-धीरे खत्म हो ता चला जाएगा जो कि किसी भी लोकतंत्र के लिए चिंता पैदा करनेवाली स्थिति है।
यह बात साफ है कि विज्ञापन और टेलीविजन के जरिए लोकतंत्र की जो शक्ल बन रही है वो पार्टी कार्यकर्ता,प्रत्याशी और मतदाता के सीधे हस्तक्षेप से बनने वाले लोकतंत्र से बिल्कुल अलग है। इसे मैंने टेलीविजन,राजनीतिक विज्ञापन और छवि निर्माण का लोकतंत्र पर लेख लिखने के क्रम में( नया ज्ञानोदय के लिए) पिक्चर ट्यूब से पैदा लोकतंत्र या वर्चुअल डेमोक्रेसी कहा है जहां राजनीतिक रुप से सक्रिय होने के स्तर पर हमारी भूमिका बस इतनी भर है कि हम ज्यादा से ज्यादा टेलीविजन देखें,उनके चिन्हों को समझें औऱ एहसास करें कि हम सक्रिय मतदाता या नागरिक हैं।