
बिरजू,रुक काहे गए। तुम भी अंदर आओ न,भगवानजी जांत-पांत थोड़े न मानते हैं। बेला के कहने पर बिरजू मंदिर की सीढियों पर चढ़ना शुरु करता है तभी बेला के दद्दाजी का चिल्लाना शुरु हो जाता है- तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मंदिर में घुसने की। उसके बाद वीओ शुरु होता है- क्या बेला और बिरजू का मासूम प्रेम कर पाया जातिवाद पर प्रहार? इन दिनों अगर आप एफ.एम चैनल सुन रहे हैं तो इस तरह के प्रोमो लगातार आपको सुनाई दे रहे होंगे। दिल्ली मेट्रो पर के किऑस्क को स्टार प्लस पर शुरु होनेवाले नए सीरियल मितवा फूल कमल के से पाट दिया गया है। प्रेम पर जातिवाद का प्रहार को बड़ी मजबूती से स्टैब्लिश करने की कोशिश है।
स्टार प्लस पर आज यानी 27 मई से शुरु होने वाले इसी नए सीरियल मितवा फूल कमल के का प्रोमो अगर आप यूट्यूब पर देखें तो कुछ इस प्रकार के विजुअल्स दिखाई देंगे। मेले में बेला को बिरजू के साथ घूमते हुए उसकी मां देख लेती है और अफसोस जाहिर करते हुए कहती है- हमारी बेला इस नीच के साथ। हमरे खानदान की की इज्जत का कोई ख्याल नहीं इस छोरी को। इसी बीच बिरजू मेले से काला-खट्टी खरीदता है और उसके एक बार चूसते ही बेला भी मचल उठती है-मुझे नहीं देगा। तभी काले-खट्टे के खोमचे को तहस-नहस कर दिया जाता है। बेला देखती है कि पीछे उसके दद्दाजी समाज में जाति प्रथा को कायम रखने की भगीरथ कोशिश में लगे लोग बिरजू के आगे बंदूक ताने खड़े हैं। सीरियल की ओर से सवाल है- जातिवाद के दलदल में क्या खिलेंगे दो फूल कमल के?
यही वही टेलीविजन चैनल है जिसे सीरियल के मामले में सास-बहू सीरियल वाला चैनल,के फैक्टर वाला चैनल और घर फोड़ने वाला चैनल कहा जाता रहा है। जिसने सीरियल में मनोरंजन के नाम पर एक ऐसा उत्सवधर्मी महौल पैदा किया कि आए दिन करवाचौथ,घरेली,सगाई और शादी के बहाने साढ़े दिन करोड़ दर्शकों के बीच भरी दुपहरी में चहल-पहल हो जाया करता। जूलरी से लेकर साड़ी,चूड़ी,बिंदी और सैंडिल तक के जिसने बाजार पैदा किए। एक समय ऐसा आया कि लोग साड़ी का नाम कसौटी,तुलसी,कुंडली,कहानी घर-घर की बहू आदि के नाम से बेचने और खरीदने लगे। कस्बों में जिस साड़ी को देखकर औऱतें नाक-भौं सिकोड़ती,दूकानदार लगभग डपटने के अंदाज में कहता- बहनी आपको साड़ी के बारे में अंदाजा ही नहीं है, पिछले सप्ताह पार्वती ने यही साड़ी पहनी थी,देख रहे हैं न मयूर प्रिंट,ये हमने नहीं पार्वती भाभी ने पसंद किए। अब बताइए टीवी के आगे हमारी और आपकी पसंद के क्या मायने रह जाते हैं। आप कह सकते हैं कि स्टार प्लस ने सीरियल के जरिए जो तिलिस्म सात-आठ सालों तक दर्शकों के बीच फैलाए रखा उसकी चाहे जितनी भी आलोचना की जाए लेकिन सच्चाई है कि उसने मार्केट और कन्ज्यूमर विहेवियर को पूरी तरह बदलकर रख दिया। मॉल जाइए तो आपको तुलसी,पार्वती से लेकर बा तक के नाम से सेल्समैन के एप्रोच का अंदाजा लग जाएगा। इन सबके वाबजूद स्टार प्लस का तिलिस्म बहुत लंब समय तक चला नहीं। कलर्स के आने के बाद उसका असर घटने लग गया औऱ धीरे-धीरे करके ये सारे उत्सवधर्मी महौल पैदा करनेवाले सीरियल बंद होते चले गए।
भारतीय टेलीविजन के इतिहास में अगर कलर्स की चर्चा होती है तो उसे इस बात की क्रेडिट देनी होगी कि उसने टेलीविजन सीरियलों के रुख को उत्सवधर्मिता से हटाकर समस्यामूलक विमर्श की ओर ले जाने की कोशिश की है। ऐसा नहीं है कि इससे रातोंरात बदलाव आने शुरु हो गए हैं, उसमें भी एक हद तक स्टंट हैं। लेकिन इतना जरुर हुआ है कि सीरियलों का पैटर्न तेजी से बदलने लगा है। आज जितने भी चैनलों पर नए सीरियल आ रहे हैं वो किसी न किसी रुप में सामाजिक समस्याओं से जुड़े हैं और ऑडिएंस की ओर से उसे अच्छा रिस्पांस मिल रहा है। इसका सबसे बेहतर उदाहरण इन्डस्ट्री में पिट रहे जीवी टीवी का है। उसने मजबूरी और लड़की को लेकर नॉनसीरियसनेस एप्रोच के चलते बेटी बेचने की प्रथा को आधार बनाकर अगले जनम मुझे बिटिया ही कीजो सीरियल शुरु किया और टीआरपी की दौड़ में वो एक से पांच के पायदान पर काबिज है। उसे जीटीवी को एक हद तक ऑक्सीजन मिला है। सोनी भी इसी तरह की खेप जल्द ही उतारने वाला है।
पिछले कुछ सप्ताह से स्टार प्लस की स्थिति बेहतर हुई है जिसकी बड़ी वजह इस तरह के समस्यामूलक सीरियलों का शुरु किया जाना रहा है।
आज अगर आप गौर करें तो दहेज,भ्रूण हत्या,बाल विवाह से लेकर उन तमाम सामाजिक समस्याओं पर टीवी सीरियल मौजूद हैं जिसे कि हम औऱ आप नहीं भोगने की स्थिति में सिर्फ किताबों में पढ़ते आए हैं। इन सीरियलों का महत्व इस स्तर पर भी है कि टेलीविजन जेनरेशन जिनका कि इन सबों से सीधा सरोकार नहीं रहा है,वो भी एक हद तक प्रॉब्लमैंटिक स्पेस को समझ सकते हैं। दूसरी बात की लोकेशन का फर्क इतना अधिक है कि सीरियल अब सिर्फ एनआरआइ को ही नॉस्टॉलजिक नहीं करता बल्कि दिल्ली,मुंबई में बैठे हम जैसे लोगों को भी भावुक कर देता है। इस तरह के सीरियलों को देखकर सबों को अपने-अपने कस्बे का भुतहा इमली का पेड़,बरगद पर लदी चुड़ैल याद आ जाएगी।
मितवा ने ग्रामीण समाज में जिस जातिवाद की समस्या को उठाया है उसके संकेत सोनी इंटरटेन्मेंट के हम चार लड़कियां ससुराल से मायके तक में मिलती है लेकिन बाद में उसकी कहानी जातिवाद की बिडंबनाओं की तरफ न मुड़कर अहं और पारिवारिक पचड़ों में उलझने लग जाती है।
उम्मीद की जानी चाहिए कि मितवा में जातिवाद की समस्या के नाम पर हायपरबॉलिक करने का अंदाज नहीं होगा जो कि अब बालिका वधू औऱ उतरन में शुरु हो गया है। सीरियल आज शाम 7ः30 से शुरु होने जा रहा है। ठीक उसी वक्त रांची के लिए मेरी ट्रेन है। आप इसे देखें और कमेंट के तौर पर टीवी प्लस पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करें।