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Tuesday, 26 October 2010

चैनलों के रावण को कौन जलाएगा?

अबकी बार स्टार न्यूज ने जब अपने दिल्ली ऑफिस कैंपस में ही रावण दहन किया और पेड पंडित ने जब इसे राष्ट्र निर्माण का हिस्सा बताया तो मेरे मन में अचानक से सवाल उठा- क्या कभी ऐसा समय आएगा कि स्टार न्यूज बाहर से,पैसे से खरीदकर रावण लाकर जलाने के बजाय,चैनल के भीतर के रावणों को हमारे सामने करे। हमसे पूछे कि बताइए कि अब जब हमने अपने चैनल के भीतर रावण दहन शुरु कर दिया है लेकिन अपने ही चैनल के भीतर कुछ रावण मौजूद हैं तो उसका क्या करें? पेड पंडित के हिसाब से, टीआरपी की जुबान बकनेवाले पंडित के हिसाब से अगर सोचें तो अगर स्टार न्यूज अपने चैनल के भीतर के रावणों का दहन कर पाता है तो यकीन मानिए कि इससे बड़ा राष्ट्र निर्माण शायद ही कभी हो सकेगा। ये अलग बात है कि राष्ट्र शब्द अपने आप में एक भटकानेवाली अवधारणा है जिसकी एक गली अंधराष्ट्रवाद,पाखंड और आगे चलकर कट्टरता में खुलती है जिसका परिचय भी खुद स्टार न्यूज नें आज दिया। फिर भी, अगर स्टार न्यूज रावण दहन को लेकर सीरियस है तो उसे इस बात की पहल तो जरुर करनी चाहिए कि वो अपने भीतर पल रहे उन रावणों की साइज छोटी करे जिनका कद घटने के बजाय और बढ़ता चला जा रहा है। बल्कि हम ये कहें कि सिर्फ स्टार न्यूज ही क्यों,चैनल इन्डस्ट्री में ऐसे कई रावण हैं,जिनके हर साल के दहन के बीच उनका कद और अधिक पहले से बड़ा,खतरनाक और समाज को तहस-नहस करनेवाला होता जाता है।

स्टार न्यूज ने जब अपनी ऑफिस में ही रावण दहन का कॉन्सेप्ट बनाया तो जाहिर है कि उसके दिमाग में सिर्फ औऱ सिर्फ बाकी दूसरे चैनलों को पटकनी देते हुए आगे निकलने की रही। लेकिन ऐसा सोचते हुए चैनल के दिमागदार लोग ये भूल जाते हैं कि घर में टेलीविजन के आगे अपने को झोंक चुकी ऑडिएंस इस बात को इस रुप में नहीं लेती। कोई भी ऑडिएंस हवा में चीजों और टेलीविजन को नहीं लेती। वो उसे एक कॉन्टेक्स्ट के साथ जोड़कर देखती है। मैंने भी यही किया। जब मैंने इस ड्रामे को देखना शुरु किया तो सोचने लगा कि क्या ऐसा करते हुए चैनल के आकाओं को कभी इस बात पर ध्यान गया होगा कि इसी चैनल में सायमा सहर के साथ कुछ दबंग( दीपक चौरसिया वाला दबंग नहीं जो बिहार में दबंग मुख्यमंत्री चुनने की सलाह दिए फिर रहे हैं) और मनचले चैनलकर्मियों ने क्या किया? अविनाश पांडे और गौतम शर्मा ने किस हद तक सायमा सहर को परेशान किया, किस तरह उनपर लगातार प्रेशर क्रिएट किया औऱ जब मामला बढ़ता गया,तब वीमेन कमीशन तक जाकर चैनल के सो कॉल्ड समझदार मीडियाकर्मियों ने सबकुछ मैनेज करने की कोशिश की,ये सब अब सार्वजनिक है। इसकी खबर एनबीटी और दि टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी ली है। क्या एक ऑडिएंस की निगाह में ये सारे लोग रावण नहीं हैं और दहन करते वक्त इनकी तस्वीर दिमाग में नहीं आती?

उम्मीद है कि बॉस लोग उस अक्लमंद प्रोड्यूसर की पीठ ठोक रहे होंगे और वो भी खुद फैल रहा होगा जिसने पिछली रात "लक्ष्मण का रावण वध" स्टोरी बनायी। मिथकों में जाएं तो राम ने रावण का वध किया था,लक्ष्मण ने नहीं। लेकिन चूंकि इस देश में सबसे ज्यादा दिमाग चैनल में काम कर रहे लोगों के पास हैं क्योंकि उनके पास करोड़ों रुपये की छतरी है इसलिए वो जो करें,सब सही है। चैनल ने लक्ष्मण बनाया क्रिकेट के वी वी एस लक्ष्मण को और रावण माना अस्ट्रेलिया को और उतार दिया एक झटके में क्रिकेट की पटरी पर। सारे के सारे फुटेज क्रिकेट के और वी वी एस लक्ष्मण की क्रिकेट गाथा। एक सीधा सवाल कि जिस अस्ट्रेलिया से भारत के संबंध सुधारने की लगातार कोशिशें जारी है, फॉरेन अफेयर्स दिन-रात जिसके पीछे लगा है,उसे आप रावण करार देते हैं और वो भी भारतीय छात्रों की हत्या करने के बजाय से नहीं बल्कि क्रिकेट में वी वी एस लक्ष्मण के प्रयास से हराने की वजह से। ऐसा लगातार दिखाकर चैनल या तो ये समझता है कि उससे ज्यादा देशभक्ति किसी और में नहीं या फिर ये मानकर चलता है कि अस्ट्रेलिया के लोगों को हिन्दी नहीं आती,चाहे जो दिखाओ। उसकी इस समझ के आगे कोई क्या कहे? लेकिन, चैनल की ऐसी ही स्टोरी से अगर अस्ट्रेलिया के लोगों के बीच नफरत पनपती है,संबंध बनने के बजाय और बदतर होते हैं तो फिर ये चैनल के अक्लमंद, देशभक्त प्रोड्यूसर उनके और उनके परिवारवालों के लिए मर्यादापुरुषोत्तम राम होगें या फिर असली रावण करार दिए जाएंगे,इस फैसले को लेकर कोई विकल्प नहीं बचता। रावण कुछ किलो के बारुदी पटाखों का नाम नहीं है,वो समाज के उस खौफनाक इरादों का नाम है जिसका होना ही समाज को मौत के उपर टिके होने जैसा है। क्या चैनल तैयार है,अपने भीतर के इस रावण के दहन के लिए?
2 अक्टूबर को दीपक चौरसिया ने बाइक पर लहराते हुए जॉन इब्राहिम के साथ बिना हेलमेट पहने इंटरव्यू लिया।..नीचे पट्टी आयी कि चैनल ने ऐसा करने की इजाजत ले रखी है। गौतमबुद्धनगर पुलिस स्टेशन ने हमारी शंका का समाधान करते हुए ये कहा भी कि हां ऐसी अनुमति मिल जाती है। लेकिन साथ में मेरी इस बात पर सहमति भी जतायी कि कल अगर बाकी के चैनल भी ऐसी ही अनुमति मांगने लगेंगे तो क्या स्थिति बनेगी? बात करनेवाले अधिकारी का कहना है- बात तो आपने बहुत सही पकड़ी है। क्या बाइक विपासा से सुंदर है का जबाब जानने के लिए देश का सो कॉल्ड सबसे सक्रिय टीवी पत्रकार के भीतर अगर ये बदमाशी घुस आती है और सैंकड़ों लोगों की जान खतरे में पड़ सकती है,जिस सड़क पर परसों ही एक बच्चे की मौत हो गयी, आप उस पत्रकार के भीतर के रावण का दहन कैसे करेंगे? इतना ही नहीं,इसके बाद भी जैसा कि कुछ पत्रकार साथियों ने फोन करके बताया कि दीपक चौरसिया बिहार में कर रहे अपने स्पेशल शो-कौन बनेगा मुख्यमंत्री में भी कुछ लोगों के साथ बाइक पर लहराते नजर आए।( मैंने इस शो के इस हिस्से को देखा नहीं इसलिए यकीन के साथ नहीं कह सकता) क्या चैनल को उस रावणी मानसिकता की पहचान है?
13 अगस्त 2010 को गुजरात के मेहसाना में एक शख्स आग लगाकर आत्महत्या कर लेता है जिसके पीछे एक मीडिया संस्थान के दो पत्रकारों पर आरोप है कि उसने उसे इस काम के लिए उकसाया। इस बाबत ठीक दस दिन बाद यानी 27 अगस्त को दिल्ली में ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एशोसिएशन की फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट आ जाती है। कुल दस पन्ने की रिपोर्ट में जो कि एक ही तरफ छपाई है, 4 पन्ने कवर,कंटेंट और सिग्नेचर के पन्ने हैं। सिर्फ 6 पन्ने पर केस स्टडी है,उसमें सारी बातें समेट दी जाती है और टीवी-9 के जो एक्यूज्ड पत्रकार है कमलेश रावल,उनसे फोन पर बात करने की अपार्चुनिटी का जिक्र भर है। इसी तरह की कुछ सतही बातें और फाइंडिंग्स हैं जिन्हें पढ़ते ही अंदाजा लग जाता है कि ये खानापूर्ति से ज्यादा कुछ भी नहीं है। इस रिपोर्ट के बाद हमें मेहसाना में आत्महत्या करनेवाले शख्स के बारे में मीडिया की तरफ से कोई जानकारी नहीं है। अगर ये मामला कोर्ट,पुलिस के अधीन है तो इसकी फॉलोअप स्टोरी हमें कहीं दिखाई नहीं दी। इस मामले को स्टार न्यूज के रावण के तहत देखना इसलिए जरुरी लगा क्योंकि जिस ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एशोसिएशन ने रिपोर्ट जारी की है, उसके अध्यक्ष स्टार न्यूज चैनल हेड के शाजी जमां है। उनकी नाक के नीचे अगर चैनल में जर्नलिज्म के अलावे बाकी सबकुछ हो रहा है,चलताउ तरीके से किसी की आत्महत्या की रिपोर्ट पेश की जा रही है और वही चैनल अगर मौज में आकर ऑफिस में रावण दहन कर रहा है तो ये पाखंड से कहीं ज्यादा घिनौनी हरकत नहीं तो और क्या है?

दशहरे के मौके पर लगभग सारे चैनल अपने-अपने तरीके से रावण की ब्रांड वैल्यू बेचने में लगे थे। खुद स्टार न्यूज 51 रावण का दहन दिखा रहा था तो न्यूज 24 अलग-अलग फील्ड और कुकर्मों के रावण की खोज कर रहा था। ऐसे ही वक्त दिमाग में आया कि क्या न्यूज चैनलों में रावण नहीं हैं और अगर हैं तो उसकी साइज दिनदुनी रात चौंगुनी बढ़ती ही क्यों चली जा रही है? क्या इस रावण पर अंकुश लगाना समाज की सबसे बड़ी चुनौती है या फिर समाज अभी इस लायक हुआ ही नहीं है कि वो इस पर लगाम कस सके। इसलिए जिस तरह चैनल ने अपने-अपने तरीके से रावण खोजे,सच बात तो ये है कि चैनल के भीतर उनके अपने-अपने रावण है। कहीं कोई रावण सैंकड़ों पत्रकारों का करियर लील जा रह रहा है तो कहीं कोई चैनल को आजाद नाम देकर उसके पत्रकारों को लाइन में लगाकार सैलरी बांटता है।..जरुरत है कि चैनलों पर रावण देखने के बजाय,चैनलों के रावण की शिनाख्त करें,सरेआम उन्हें हतोत्साहित करे। बेहतरा दशहरा यही होगा।

फिलहाल मैंने स्टार न्यूज के भीतर जो रावण पल रहें हैं,किसी शख्स से ज्यादा वो मानसिकता है,उस पर लिखा है। आप सब पहल करेंगे तो बाकी चैनलों के भी रावण हमारे सामने बेनकाब हो सकेंगे। कोशिश कीजिए, अच्छा रहेगा।

Wednesday, 13 January 2010

चर्चित एंकरों को क्यों नहीं मिलती टीआरपी?


टेलीविजन अखाड़ों में इन दिनों टीआरपी को लेकर बहस जारी है। टेलीविजन और मीडिया के दिग्गज इस अखाड़े में विचारों की अपनी-अपनी पेंच भिड़ाने में जुटे हैं। सबों के पास कुछ न कुछ कहने को है और सबों ने इसके लिए अपनी-अपनी सुविधा के लिए मंचों का चुनाव कर लिया है। आइबीएन7 के आशुतोष ने जहां दैनिक हिन्दुस्तान में अपनी बात कही,रवीश कुमार ने अपने ब्लॉग पर ही इस मामले को उठाया तो वहीं न्यूज24 के मैनेजिंग एडीटर अजीत अंजुम ने फेसबुक पर ही टेलीविजन का अखाड़ा खोल दिया और लगातार अपनी बात कह रहे हैं। दिलीप मंडल ने टीआरपी की बात मीडियाखबर डॉट कॉम पर रखी है। यहां तक कि खुद एक टीवी चैनल ने इसके विरोध में मोर्चा खोलते हुए आधे घंटे का कार्यक्रम प्रसारित किया। कुल मिलाकर कहानी ये है कि प्रिंट,टेलीविजन,इन्टरनेट और उसी नयी विधाओं में टीआरपी का मामला गर्म है। जनतंत्र ने भी इस पूरी बहस को उठाने की कोशिश की है। टी प्लस की कोशिश है कि टीआरपी की पूरी बहस को गंभीरता से ले औऱ सारी बातों को आप तक पहुंचाने का काम करे। आपसे अपील है कि आप अपनी बेबाक राय जाहिर करें जिससे कि कुछ नतीजे निकलकर सामने आ सकें। ये अलग बात है कि इन सबके वाबजूद दिलीप मंडल,अजय ब्रह्मात्मज सहित दूसरे कई बरिष्ठ मीडियाकर्मियों का मानना है कि टीआरपी पर बात करने के लिए एडीटर सहित हमलोग अनक्वालिफाइड लोग हैं। ऐसा इसलिए भी कि टीआरपी बाजार,बिजनेस और विज्ञापन का हिस्सा है जो कि सिर्फ भाषिक बहसबाजी से नहीं बदलनेवाला। मेरी अपनी समझ है कि जब आप टीआरपी की बात कर रहे हैं तो कंटेंट पर भी बात करें क्योंकि एक आम ऑडिएंस को इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि टेलीविजन का रेवन्यू मॉल क्या है? उसे इस बात से मतलब है कि उसका टेलीविजन कंटेंट के स्तर पर दुरुस्त हो रहा है कि नहीं? बहरहाल यहां हम फेसबुक पर इसी से जुड़ी एक बहस को आपके सामने पेश कर रहे हैं जिसे कि अजीत अंजुम ने उठाया है कि आखिर चर्चित एंकरों को टीआरपी क्यों नहीं मिलती? इस बहस में जो लोग शामिल यहां उन्हें हायपर लिंक नहीं कर रहा,बहुत टाइम टेकिंग का काम है। आप व्यक्तिगत तौर पर उन्के बारे में जानना चाहें तो इस लिंक पर चटकाकर जान सकते हैं:-

तस्वीर- साभार- मीडिया मंत्र

Ajit Anjum

टीवी चैनल्स के जिन कार्यक्रमों को आप लोग पसंद करते हैं , उसे टीआरपी क्यों नहीं मिलती ? जिन चुनिंदा एंकर्स के बुलेटिन की आप तारीफ करते हैं , उसे अपेक्षित टीआरपी क्यों नहीं मिलती ? क्या दर्शकों का मिजाज बदला है ? क्या पब्लिक एट लार्ज वो नहीं देखती , जिसे आप पसंद करते हैं ? आपमें से बहुत लोग कह रहे हैं कि अगर कार्यक्रम बढ़िया होगा तो दर्शक जरूर देखेंगे लेकिन टीआरपी मीटर उसे अक्सर खारिज कर देता है,क्यों?


Sachin Gaur public ko kya pasand hai kya nahi isse news channels ko matlab kahan hai. 2-3 mahine pahle global warming ka rag alapne wala media ab him yug ki wapsi par stories chala raha hai. shame on the electronic media. sirf trp ki parvah hai aap logo ko. aur kisi ki nahi.aam admi ke faer psychosis ko jitna exploit aap log kar rahe hain uski had hai. har mosam main chillana gala fadna bas yahi kam reh gaya hai news channels ka.
9 hours ago

Sachin Gaur garmi jyada padi toglobal warming. thand jyada to him yug. rubbish. news 24 ki story main dava kar rahe hai ki gulf stream jam rahi hai scientist dava kar rahe hai ki ye him yug ki wapsi ke sanket hain. naam kya hain scinetists ke . aap batayenge jo ye dave kar rahe hain.
8 hours ago

Sajid Khan mujhe yeh samjh nahi aata yeh trp meter lagte kin gharoo main hai aur in meter ko lagaane ka paimana kya hai..kya yeh midlle calss gharoo mai lagte hai ya uper calss ya ganv ke kacche gharoo main.ya nayee ki dukanoo par nayee ki dujanno par...aur rahi baat aache progrme ko ya acche anchor ke progrme ko trp milne ki..ab jab hum is trp khel par yaakin hi nahi karte to jawab mujhe sujh nahi rha..kyon ki acache progrme aur acche anchor ke progme loog dekhte hai ..
8 hours ago

Ajit Anjum सचिन आपका गुस्सा बहुत हद तक जायज है लेकिन हम युग के बारे में आप जल्दी में नतीजे पर पहुंचकर गुस्सा व्यक्त कर रहे हैं . पूरी दुनिया में तापमान जितना नीचे गिरा , उसे देखिए , समझिए . ये कोई मनगढंत कहानी नहीं है . पूरे यूरोप में रिकार्ड टूट गया है . दुनिया को कई कोनों में कोहराम मचा है . बाकी आपकी बात सर माथे पर . यही तो जानना चाहते हैं हम कि अगर एनडीटीवी इंडिया , जी न्यूज , स्टार न्यूज , आईबीएन , आजतक या कोई और चैनल कोई सार्थक कार्यकम बनाता है तो जनता उसे देखती क्यों नहीं है ...
8 hours ago

Sachin Gaur seedhe sadhe sapt mosam ka majak bana diya hai trp ke chakkar main. jesi sardi aaj pad rahi hai. isse kahin jyada sardi kai bar pad chuki hai. aur jesi garmi is bar padi thi usse bahut jyada garmi pahle pad chuki hai. is bar highest tapman 44.8 jabki 10 saal pahle delhi main 47 tatah 45-46 kai bar ho chuka hai. lekin tab electronic media nahi tha isliye global warming nahi thi. 1degree 2-3 degree tak delhi ka tapman bahut baar pahle bhi ja chuka. 2006 ke december last 0 degree tak gaya tha delhi ka tapman. tab to himyug wapas nahi aaya.
8 hours ago

Hasan Jawed आप ने मुद्दा सही उठाया है पर ये टीआरपी का रोना बेहद बेतुका है! कौन कहता है की हम बेहतर प्रोग्राम को बेहतर नहीं कहते! पहली बात ये की दर्शक अपनी बात कहे कैसे? जिस के आधार पर आप समझेंगे की लोगों ने हमें सराहा है! मेसेज और मेल करना आसान नहीं है और नाही लोगों के पास टाइम है आप के लिए क्यूंकि लोग समझते हैं की मनोरंजन चैनल का कंटेंट चुरा कर लोगों को दिखान...
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8 hours ago

Sachin Gaur us aur europe main aisi barfbari pahle bhi ho chuki hai. ye koi nai baat nahi. logo ko murkh banana chod dijiye. aisi news dekhkar log ghabra jate hain. unhe dariye mat normalzindagi jeene dijiye.
8 hours ago

Ajit Anjum हमयुग कोई दिल्ली के संदर्भ में नहीं है , दुनिया के संदर्भ में है . पूरी दुनिया के तापमान पर नजर डालिए . चाहे तो गूगल पर सर्च कर लीजिए .
8 hours ago

Sachin Gaur aise wahiyat aur fizul programmes ko trp isliye milti hai kyunki fear psychosis ki wajah se wo ise dekhte hain. unka dar unhe ye dekhne ko prerit karta hai. aur aapko trp mil jati hai. shame on news channls
8 hours ago

Ajit Anjum वैसे बता दूं कि हम युग या आइस एज के नाम से कार्यक्रम हर चैनल पर चले हैं आप खामखा न्यूज 24 से नाराज हो रहे हैं . हर अखबार में खबरें छप रही है . फिर भी आपकी नाराजगी की मैं कद्र करता हूं . जहां तक रही टीआरपी की बात तो मैं तो कह ही रहा हूं टीआरपी मजबूरी और अभिशाप है . अगर अच्छे कार्यक्रमों से टीआरपी मिलने लगे तो चैनलों की तस्वीर बदलने लग जाएगी .
8 hours ago

Nabeel A. Khan @Anjum ji I guess ye jo "AAP" hai yahee to public hai to jo "AAP" ko pasand wahi sabka baap-------all in one blunt but straight forward statement (Sincere apology for the harsh lingo)
8 hours ago

Om Singh अंजुम सर, लगता है बहस की दिशा भटक गई है ... मुद्दे की बात नहीं हो रही है ...
8 hours ago

Sachin Gaur ajeet ji 2 mahine pahle dunibhar main global warming ko lekar shor tha copenhegan main summit ho raha tha. how is it possible that with in 2 months an ice age can come. and its matter of happines if such a snow fall is occuring. glaciers pe barf jamegi. nadiyon ko pani milega.
8 hours ago

Sachin Gaur aap gaon main jaiye wahan log normal zindagi ja rahe hain. agar thand pad rahi hai to pad rahi. garmi pad rahi hai to pad rahi hai. koi hangama nahi hai. kyonki wahan news channels nahi hain. weather cycle has just changed. niether its global warming nor ice age. may main ab utni garmi nahi padti jitni pahle padti thi garmi ab june se start hoti ...
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8 hours ago

Nabeel A. Khan @Anjum ji@ Sachin ji It is the over all character of an individual media matters-had it been done on BBC, NDTV or written in any newspaper without any doubt it would have been accepted but as the mentioned channel had been involved in some irrelevant stories now even the good and correct stories becomes tough to believe for the viewers, However, i dont have any evidence to prove the veracity of the story or prove it to be wrong
8 hours ago

Om Singh सचिन गौर जी... आपकी पीड़ा को हमने समझ लिया ....
8 hours ago

Sachin Gaur i tell u first panipat war was fought on30 april 1526. that time it was too hot in april . we cant expect such hot april now.
8 hours ago

Sachin Gaur its a routine weather change which happens after every 5-600 years after. us main aisi barf 30 saaal pahle bhi padi thi. tab to ice age nahi aaya ab kese aa jayega.
8 hours ago

Ajit Anjum नबील,आपकी जानकारी के लिए बता दूं कल रात साढ़े नौ बजे एनडीटीवी इंडिया ने भी आधे घंटे का कार्यक्रम किया था . संजय अहरवाल शायद एंकर कर रहे थे . कल मेल टुडे समेत कई अखबारों में आइस एज के नाम से ही खबरें छपी थी . आज भी छपी है . बिना फैक्ट चैक किए जजमेंट न दें . एपीटीएन से दिन भर में फूटेज की बारिश हो रही है .
8 hours ago
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Ajit Anjum आप सिर्फ शीर्षक पर जा रहे हैं . हेडिंग या हेडलाइन का मतलब अगर उस तरह से निकालेंगे तो हर खबर बेकार है .
8 hours ago

Nabeel A. Khan @Anjum ji didn't challenge the veracity of the news- moreover I don't say that this news is irrelevant but I think you should agree the way news is presented at times on some hindi channels which trivialises even the important aspect and for a class of viewers it forces them to create a partial perception. However, we all know that no one is ...
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8 hours ago

Nabeel A. Khan @Anjum ji But headline should ideally be the crux of story-let me share with u one incident -a report gives a headline -about two actors from Bollywood getting married(the name like A set to marry B ) which interested me to read the story - but when i read it i found that they r making film where they will play husband wife -it happened 2 years back in office-now should i consider it ideal ------no i will never
7 hours ago

Ajit Anjum दोस्त क्या आपको लगता है कि इतनी ज्ञान भरी बातों के बारे में हमें पता नहीं है ? मैंने सात साल प्रिंट में भी काम किया है दोस्त और टीवी में तो कर ही रहा हूं . ऐसा नहीं है कि जो आप कह रहे हैं वो मैं समझता नहीं हूं . ऐसा भी नहीं कि जो टीवी में हो रहा है , उसे अतिप्रसन्न हूं . होता तो अपनी बात कहने यहां नहीं आता . यही तो मैं कह रहा हूं कि जिस तरह के कंटेंट की आप लोग तारीफ करते हैं ,उसे पब्लिक एट लार्ज नहीं देखती . या फिर
7 hours ago

Hasan Jawed GUSSA AAP KO BHI AATA H
7 hours ago

Ajit Anjum अरे मैं भी तो आदमी हूं यार . ओखल में सर दे दिया तो इसका मतलब ये तो नहीं कि चिल्लाने का अधिकार भी न रहा
7 hours ago

Nabeel A. Khan I can never dare your knowledge- I salute your skill but the main issue is that an adroit person of great intellect knowledge like you and many other in the media can afford to be ruled by marketing gimmick--and compromise with our soul--Even in my office for that matter many seasoned journalists are happily ready to kill the essence of journalism to woo some market-I fear we will be soon loosing our sheen----
7 hours ago

Nabeel A. Khan In our own world we are allowing the aliens to set up the rules --------@Ajit ji I apologies if i hurt u by any means- it was just for the discussion
7 hours ago

Ranjan Rituraj मै मीडिया से नहीं हूँ . काफी दिनों से "बहस" का हिस्सा बन रहा हूँ . कुल मिला कर - यही पता चला की ...टी आर पी ..बकवास है ! टी वी न्यूज़ चैनल "रामायण" और " महाभारत" की तरह पुरे देश के सडकों को सुना नहीं कर सकता ! दर्शक कई वर्गों में बंटा है ! हर कोई सर्फ़ नहीं खरीदता है -"निरमा" और हिपोलिन भी बाज़ार में है - पुरे बाज़ार को "निरमा" और "हिपोलिन" की तर्ज़ प...
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7 hours ago

Nabeel A. Khan @Rituraj ji I agree --but nirma ho ya hipolin dono mein detergent hi hona chahiye aur uska kam bhi ek hi hona chahiye gandagi ko saaf karne -lekin aap detergent ke packet mein balu (sand) bhar kar bechenge to achhi baat to naheen hai??
7 hours ago

Sachin Gaur om singh ji aapne hamari pida ko smjha dhanyavad. aap ab chaplusi chod kar behas ka hissa baniye ya chup rahiye.
7 hours ago

Sachin Gaur ajit ji kya aap ko lagta hai ravish kumar ya kamal khan ki special reports ko log nahi dekhte hain. chini ko ravish kumar ki report lajawab thi. unki sheli presentation sab kuch a one. kese ek aam admi usko chod him yug ki wapsi ko dekh sakta hai.
7 hours ago

Sachin Gaur ruchika case ko news 24 ne bahut acche se follow kiya tha. i appreciate it. kese koi isko mana kar sakta hai.
7 hours ago

Pravakar Chanchal सर, पहले के मुकाबले अब दर्शकों का नज़रिया काफी बदला है...मेरे ख्याल से अब दर्शक न्यूज़ चैनल पर न्यूज़ देखना ज्यादा पसंद करता है...और ये ज़रूरी है नहीं कि दर्शक एंकर का चेहरा देखकर ही आपका चैनल देखे...और ये भी सच है कि दर्शक जिन कार्यक्रम को ज्यादा पसंद करते हैं उसे टीआरपी नहीं मिलती ठीक वैसे ही जैसे कि कोई फिल्म जो दिल तो छू जाती है मगर वो हिट नहीं होती....
6 hours ago

Rahul Goel हम मीडिया से जुड़े लोग जब किसी कार्यक्रम को देखते हैं तो अलग नजरिये से ..अब कुछ हजार मीडिया वालों से टीआरपी आने से तो रही ...मेरे दोस्त जो पत्रकार नहीं है ..कॉल सेंटर में काम करते हैं ..या एम बी ए कर रहे हैं..या किसी दूसरे पेशे से जुड़े है..उन्हे बुंदेलखंड या सौराष्ट्र में भुख मरी और किसानों की मौत से जुड़ी खबर देखने में कोई मजा नही आता शायद उन्हे ...
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6 hours ago

Ajit Anjum चलिए अब फिर मुद्दे पर आते हैं सचिन जी , मैं पहले तो शुक्रिया अदा कर दूं कि आपने रूचिका पर न्यूज 24...
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6 hours ago

Rahul Goel मैं रंजन की बात से कुछ हद तक सहमत हूं
6 hours ago

Diwan Singh Kathayat सर, माफ कीजिएगा पर मैं अक्सर देखता हूं की आप प्रोग्राम, एंकर्स और टीआरपी के बीच उलझे रहते हैं...एक चैनल का हैड होने के नाते वाजिब भी है...सर थोड़ी देर के लिए एक दर्शक की नजर से देखिए...आज हमारी गिनती से ज्यादा चैनल हमारे पास हैं...और ये हमारा भर्म है कि हमारे एंकर्स कोई स्टार हैं...चैनल के बाहर कोई किसी को नहीं जानता...जो रोज उसे देखने बैठे...
6 hours ago

Diwan Singh Kathayat और सर दूसरी बात प्रोग्राम के कंटेंट में दम हो या ना हो प्रोमो जोरदार होना चाहिए...कहा भी गया है पैकिंग अच्छी होनी चाहिए...अंदर कुछ भी बेचो...लाइक इंडिया टीवी
6 hours ago

Nabeel A. Khan I guess Ruchika case got worst on Times Now--------i ll support it tomorrow gud night
6 hours ago

Richa Sakalley अजीत सर, सच तो यही है कि ज्यादातर दर्शक अच्छे कार्यक्रम ही देखना चाहते हैं, आप जिन चुनिंदा एंकर्स की बात कर रहे हैं उनके सभी कार्यक्रम लगभग सभी वर्ग के दर्शकों में सराहे जाते हैं...(टीन एजर्स, बच्चों को छोड़कर)
इसका सबसे बड़ा उदाहरण 'समय' चैनल 'था'...जब सहारा समय का नेशनल चैनल 'समय' के रुप में दर्शकों के सामने आया तो हर जगह चर्चा में रहा...'समय' में उस दौरान हर वो फैसला हिम्मत के साथ लिया गया जिसे लेने में आज तमाम बड़े चैनल सौ बार सोचेंगे...मसलन, ज्योतिष कार्यक्रम नहीं चलाए गए...टीवी सीरियल, नाच गाना, कॉमेडी नहीं दिखाई गई। चैनल गंभीरता के ताने-बाने में बुना गया...6 महीने के भीतर चैनल के चर्चे हर ज़ुबान पर थे और टीआरपी भी मिल रही थी...खैर...मुझे लगता है सर बात थोड़े से धैर्य और थोड़े से विल पॉवर को दिखाने की है...सर टीआरपी से अभिशप्त होने या मजबूर होने का गाना गाने से अच्छा है क्यों न तमाम चैनल मिलकर कुछ क्रांति करें...टीआरपी को मजबूर करें....बाज़ार को मज़बूर करें...हिम्मत के साथ ये सच कहकर कि "भैया ये है हमारे पास बेचने को...जनता हमारे साथ है....हम यही बेचेंगे"....मुझे लगता है शायद हम जीत जाएं...टीआरपी का खेल रुक जाए...हालांकि मैं इन सब मामलों को और बड़े स्तर की मजबूरियों को उतना अच्छे से समझती नहीं हूं हो सकता है हाइपोथिटिकल बात कह रही हूं...लेकिन फिर भी पता नहीं क्यों लगता है कि ऐसा कर सकते हैं...
5 hours ago

Dinesh Mansera ajit ji, aapko yaad hoga ki manoher kahaniya, satya katha jaisi patrikaye bhi apne zamane me dharmyug,sapatahik hindustan se jayaada bikti thi wahi daur aaj bhi hai , jise aap TRP se jod kar dekhte ha , TRP unhe karykarmo ki jyaada ho jati joki india tv , sansani,jaise hote hai, jabki news point ya doosre progrme neeche khisak jate hai..humare yahan achche karykram dekhne wale deir raat tak partiyo me hote ha.
बहस आगे भी जारी है...

Saturday, 21 November 2009

IBN7 पर हमला किस लोकतंत्र पर हमला है?





मूलतः प्रकाशित मोहल्लाLIVE
पोस्टर- साभारः मीडियाखबर डॉट कॉम
IBN7 और IBN7 लोकमत के मुंबई और पुणे दफ्तर में शिवसेना के गुर्गे ने जो कुछ भी किया, वेब लेखन के जरिये हम उसका विरोध करते हैं। दफ्तर के अंदर घुसकर शिव सैनिकों ने महिला मीडियाकर्मियों के साथ जो दुर्व्यवहार किया, हम उसके ख़‍िलाफ़ न्याय की मांग करते हैं। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के भीतर गुंडई और जाहिलपने को लेकर आये दिन किये जानेवाले प्रयोग और पेश किये जानेवाले नमूनों का हम पुरज़ोर विरोध करते हैं। पिछले 15 दिनों के भीतर और उससे भी पहले शिवसेना और उसी की कोख से पैदा हुआ मनसे ने लोकतंत्र के दो स्तंभों – विधायिका और मीडिया को कुचलने और ध्वस्त करने की जो कोशिशें की है, हम उसका विरोध करते हैं। संजय राउत जैसे देश के उन तमाम संपादकों और पत्रकारों को धिक्कारते हैं, जिनकी औकात रहनुमाओं के पक्ष तक जाकर ख़त्म हो जाती है। दिमाग़़ी तौर पर सड़ चुके लोगों के लेखन को फर्जी करार देते हैं जिनके भीतर तर्क करने की ताक़त नहीं रह गयी है। हम चाहते हैं कि ऐसे लोगों को पत्रकारिता बिरादरी से तत्काल बेदखल किया जाए। हमारे इस विरोध के बावजूद अगर मुंबई सरकार इस दिशा में सक्रिय होकर कार्यवाही नहीं करती है तो हम अपनी आवाज़ और तेज़ करेंगे। हम मीडिया की आवाज़ को किसी भी स्तर पर दबने नहीं देंगे। हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को किसी के हाथों का खिलौना बनने नहीं देंगे। हम देश की मीडिया को किसी भी रूप में तहस-नहस नहीं होने देंगे।

अपनी बात कहने और सच बयान करने की इच्छा रखनेवाले देश के बाकी पत्रकारों और मानव अधिकारों के पक्ष में बात करनेवालों की तरह मैं भी शिवसेना की बर्बरता का विरोध करता हूं। हम सबों को अपने-अपने स्तर से इस तरह की गतिविधियों को रोका जाना चाहिए। लेकिन ये सब लिखते-कहते हुए मैं उन शब्दों, अभिव्यक्तियों और मेटाफर पर थोड़ा इत्‍मीनान होकर सोचना चाहता हूं, जिसे कि मीडिया के लोग इस्तेमाल करते हैं। इस मामले में मैं समर्थन के स्तर पर जज़्बाती होते हुए भी अभिव्यक्ति के स्तर पर तटस्थ होना चाहता हूं। मुझे लगता है कि ऐसा करना शिवसेना जैसी बवाल मचाने वाली पार्टी के समर्थन में जाने के बजाए मीडिया और खुद को देखने-समझने की कोशिश होगी। इसलिए तोड़फोड़ की घटना का लगातार दो दिनों तक विरोध किये जाने के बाद अब इस स्तर पर विचार करें कि हम किस लोकतंत्र पर हमले की बात कर रहे हैं? लोकतंत्र के पर्याय के तौर पर बतायी जानेवाली मीडिया के किस हिस्से पर हमला किये जाने का विरोध कर रहे हैं? मीडिया अपने ऊपर हुए हमले को लोकतंत्र पर किया जानेवाला हमला बता रहा है, इसे किस रूप में समझा जाए? कुल मिलाकर हम पहले तो लोकतंत्र को रिडिफाइन करना चाहते हैं और उसके बाद उसके खांचे में काम कर रही मीडिया को समझना चाहते हैं?

एजेंडा (IBN7 का कार्यक्रम) में एंकर संदीप चौधरी ने कहा कि आगे जब हिंदी पत्रकारिता का इतिहास लिखा जाएगा तो इसे काला शुक्रवार के तौर पर समझा जाएगा। इसके पहले भी जो फ्लैश चलाये गये, उसमें बार-बार इस हमले को लोकतंत्र पर किया जानेवाला हमला बताया गया। संदीप चौधरी ने काला शुक्रवार शब्द रूस की बोल्शेविक क्रांति से उधार के तौर पर लिया। बाकी के न्यूज़ प्रोड्यूसरों और रिपोर्टरों ने भी लोकतंत्र पर हमला या चौथे स्तंभ पर हमला जैसे शब्दों का प्रयोग कहीं न कहीं ऐतिहासिक संदर्भों से उठा कर किये। यहां दिक्कत इस बात की बिल्कुल भी नहीं है कि इतिहास से इस तरह के शब्द नहीं लिए जाने चाहिए। इतिहास के शब्दों और अभिव्यक्तियों को अगर मीडिया के लोग खींचकर वर्तमान तक लाते हैं तो हमें उसका स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन असल सवाल है कि क्या जिस लोकतंत्र पर हमले और उसे बचाने की बात की जा रही है, वो महज कुछ वैल्यू लोडेड शब्दों के प्रयोग कर दिए जानेभर से जिंदा रहेगा? क्या हम लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, आजादी इन सबों को सिर्फ शब्दों के तौर पर जिंदा रखना चाहते हैं? हम इसे बोलने के लिहाज से चटकीला भर बनाना चाहते हैं? क्या हम लोकतंत्र, सरोकार, मानवीयता और इस तरह के वैल्यू लोडेड शब्दों को पुतलों की शक्ल में बदलना चाहते हैं? ऐसे पुतले जिसे कि दागदार, धब्बे लगे, बदबूदार समाज और फ्रैक्चरड डेमोक्रेसी के बीच लाकर रख दिया जाए, तो सब कुछ अचानक से चमकीला हो जाए। चित्ते-चित्ते रंगों के बीच एकदम से चटकीले रंगों का प्रभाव पैदा हो जाए। क्या इन शब्दों का प्रयोग अपनी ज़ुबान को सिर्फ चटकीला बनाने भर के लिए है?

टेलीविजन मीडिया से ये सवाल पूछा जाना इसलिए भी ज़रूरी है कि लोकतंत्र कोई वैक्यूम में पैदा हुई चीज नहीं है। इसके भीतर हाड़-मांस, दिल-दिमाग़, जज़्बात और सोच लिये लोग मौजूद होते हैं। इसलिए जैसे ही आप लोकतंत्र शब्द का प्रयोग करते हैं, आपको लोकतंत्र को लोकेट तो करना ही होगा। पहले तो आपको और फिर हमें समझाना होगा कि आप लोकतंत्र से क्या समझ रहे हैं? आप जिस लोकतंत्र की बात कर रहे हैं, उसके भीतर कौन से लोग शामिल हैं? आप किसके वीहॉफ पर अपने को लोकतंत्र का पर्याय बता रहे हैं? क्या आप खुद से पैदा किये जानेवाले लोकतंत्र को संबोधित कर रहे हैं या फिर अभी भी देश के भीतर बहाल लोकतंत्र को लेकर बात कर रहे हैं? मुझे नहीं लगता कि मीडिया पर किये जानेवाले हर हमले को लंबे समय तक लोकतंत्र पर किया जानेवाला हमला बताया जाना आगे जाकर आसान होगा। तत्काल जज़्बाती होकर हम मीडिया के पक्ष में होते हुए भी इत्‍मीनान होने पर सवाल तो ज़रूर करेंगे कि हम किस मीडिया के पक्ष में खड़े हैं? उसके सालभर का चरित्र क्या है? हम न तो लोकतंत्र को मुहावरे की शक्ल देना चाहते हैं और न ही मीडिया को मुहावरे के तौर पर इस्तेमाल करने देना चाहते हैं? इसलिए ज़रूरी है कि हम ऐसे में हम मीडिया हमलों के बीच लोकतंत्र के संदर्भों को समझने की कोशिश करें।

एक बात पर आप लगातार ग़ौर कर रहे होंगे कि पहले के मुकाबले निजी चैनलों पर राजनीतिक पार्टियों, धार्मिक संगठनों और संस्थाओं की ओर से हमले तेज़ हुए हैं। नलिन मेहता ने अपनी किताब INDIA ON TELEVISION और पुष्पराज ने अपनी किताब नंदीग्राम डायरी में सकी विस्तार से चर्चा की है। हाल ही में हमने देखा कि गुजरात में नरेंद्र मोदी की सरकार ने आजतक को लंबे समय तक केबल पर आने से रोक लगा दी। आसाराम बापू के चेले-चपाटियों ने आजतक की संवाददाता पर हमले किये और घायल कर दिया। इसके पीछे की लंबी रणनीति हो सकती है। लेकिन एक समझ ये भी बनती है कि जिस तरह मीडिया और चैनलों के कार्पोरेट की शक्ल में तब्दील होने की प्रक्रिया तेज़ हुई है, राजनीतिक पार्टियों के प्रति उसकी निर्भरता पहले से कम हुई है। साधनों के स्तर पर तो कम से कम ज़रूर ही ऐसा हुआ है। दूसरी तरह कार्पोरेट और विश्व पूंजी की ताकत से इन चैनलों का मनोबल भी बढ़ा है। इसके आगे राजनीतिक पार्टियों की क्षमता का आकलन इनके लिए आसान हो गया है। इसलिए अब ये स्थिति बन जाती है कि कोई भी चैनल किसी राजनीतिक पार्टी, धार्मिक संगठन या संस्थानों पर बहुत ही साहसिक तरीके से स्टोरी कवर करता है, प्रसारित करता है। ऐसे में ये बिल्कुल नहीं होता कि राजनीति स्तर की निर्भरता उसकी एकदम से ख़त्म हो जाती है, लेकिन इतना ज़रूर होता है कि मैनेज कर पाना और संतुलन बना पाना पहले के मुकाबले आसान हो गया है। यहां राजनीति और मीडिया की ताक़त की आज़माइश होने के बजाय राजनीति और कार्पोरेट की आज़माइश होनी शुरु होती है। कार्पोरेट का पलड़ा मज़बूत होने की स्थिति में चैनल और मीडिया बहुत आगे तक राजनीतिक पार्टियों की धज्जियां उड़ाते हैं, धार्मिक संगठनों पर बरस पाते हैं। हमें ये सबकुछ लोकतंत्र का पक्षधर होने के स्तर पर दिखाया-बताया जाता है। एक हद तक सही भी है कि कम से कम राजनीतिक मामलों में दूरदर्शनी दिनों के मुकाबले निजी चैनल ज़्यादा मुखर हुए हैं। चैनल की इस बुलंदी का स्वागत किया जाना चाहिए।

लेकिन दूसरी स्थिति पहली स्थिति से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक हैं। अगर बारीकी से समझा जाए तो ये लोकतंत्र के नहीं बचे रहने से जितना नुक़सान नहीं है उससे कहीं ज़्यादा नुकसान टेलीविज़न की ओर से पैदा किये जानेवाले और तेज़ी से पनपनेवाले लोकतंत्र से है। टेलीविज़न का लोकतंत्र, जनता के लोकतंत्र को लील जाने की फिराक में है। इसके हाल के कुछ नमूनों पर गौर करें तो हमें अंदाजा लग जाएगा। तालिबान और आतंकवाद पर स्पेशल स्टोरी दिखाते हुए एनडीटीवी इंडिया के रवीश कुमार ने कहा कि तापी चिदंबरमलिबान में देश का कोई भी रिपोर्टर नहीं है लेकिन वहां की ख़बरें रोज़ दिखायी जा रही है। ये खबरें यूट्यूब की खानों से फुटेज निकालकर बनायी जा रही है। हंस के वार्षिक समारोह में अरुंधति राय ने कहा कि सलवाजुडूम इलाके में देश के किसी भी पत्रकार को जाने की इजाज़त नहीं है। पाखी के वार्षिकोत्सव में पुण्य प्रसून वाजपेयी ने कहा कि विदर्भ को आइडियल शहर घोषित किया गया लेकिन वहां चालीस हज़ार किसानों ने आत्महत्याएं की। आज मीडिया में गांव नहीं है, मीडिया से जुड़े लोग गांव की स्थितियों को संवेदना के स्तर पर नहीं ला पा रहे हैं। 2 नवंबर को जब शर्मिला इरोम को बर्बर प्रशासन के खिलाफ़ अनशन पर बैठे दस साल पूरे हो गये, देशभर के अनुभवी मीडियाकर्मी शाहरुख खान के बर्थ केक काटने के फुटेज लेने के लिए बेकरार होते रहे। एक ही साथ नक्सलवाद और सरकारी कार्रवाइयों के ख़ौफ़ में झारखंड के आदिवासी आशंका के दिन खेप रहे होते हैं, देशभर के चैनल की बाइट को उलट-पुलट कर सुलझाने में जुटे रहे। देश के एक चैनल पर ताला लग जाने से करीब चार सौ मीडियाकर्मी रातोंरात सड़कों पर आ जाते हैं, वो कभी भी लोकतंत्र का हिस्सा नहीं बनने पाता। तो क्या ये मीडिया तय करेगा कि लोकतंत्र के भीतर का कौन सा हिस्सा टेलीविजन पर आकर लोकतंत्र की शक्ल लेगा और कौन सा नहीं? अगर सचमुच ऐसा है तो हमें मीडिया के लोकतंत्र पर नये सिरे से विचार करना होगा।

आप अगर चैनल की इन ख़बरों के बीच सरोकार से जुड़ी ख़बरों और हिस्सेदारी की मांग करेंगे तो टीआरपी का शैतान सामने आ जाएगा। इनमें से सारी घटनाएं टीआरपी पैदा करने के लिहाज से बांझ है। इसलिए टीआरपी तो उन्हीं ख़बरों से पैदा होती है, जिनमें कि मेट्रो और मध्यवर्ग की ऑडिएंस दिलचस्पी ले। संकेत साफ है। मंजर साफ है। फीदेल कास्त्रो के पद को उधार लेकर कहा जाए तो ये सांस्कृतिक संप्रभुता का संकट है। टेलीविज़न देश की संप्रभुता को बचाये रखने के दावे से लैस है। लेकिन उसके भीतर के ठोस के जार-जार हो जाने की चिंता बिल्कुल भी नहीं है।

देश की सत्तर फीसदी आबादी को जब पीने को पानी नहीं है, बच्चों के हाथों में स्लेट नहीं है, स्त्रियों की आंखों में सपने नहीं है – टेलीविजन पर कीनले है, विसलरी है, पॉकेमॉन है, बार्बी है, मानव रचना यूनिवर्सिटी है, लक्मे है, झुर्रियों को हटाने के लिए पॉन्डस है। एक धब्बेदार, बदबूदार और लाचार लोकतंत्र टेलीविज़न पर आते ही चमकीला हो उठता है। पिक्चर ट्यूब से गुज़रते ही देश का सारा मटमैलापन साफ हो जाता है। सवाल यहां बनते हैं कि टेलीविज़न के दम पर जो आइस संस्कृति (information, entertainment, consumerism) एक ठंडी संस्कृति के बतौर पनप रही है, क्या उसी लोकतंत्र पर हमला हो रहा है और उसी को बचाये जाने की बात की जा रही है? हम वर्गहीन समाज जैसे मार्क्सवादी यूटोपिया से बाहर निकलकर भी सोचें तो क्या ज़रूरी है कि इस आइस संस्कृति के बूते देशभर के लोगों को खींच-खींचकर मध्यवर्गीय मानसिकता के खांचे में लाया जाए। ये मानसिकता चार रुपये लगा कर अपनी पसंद और नापसंद जाहिर करे। क्या हमें इस लोकतंत्र पर हमला किये जाने से अफ़सोस होगा? दुर्भाग्य से इस लोकतंत्र पर हमला कभी नहीं होना है लेकिन बदकिस्मती है कि जिस लोकतंत्र पर हमले हो रहे हैं उसे शायद ही कभी बचाया जा सकेगा। इसलिए लोकतंत्र के रैपर में मीडिया जिसे बचाना चाहती है, पहले उसे साफ कर दे, तो पक्षधरता कायम करने में आमलोगों को सहूलियतें होगी। क्योंकि जज़्बाती होने की वैलिडिटी जल्द ही ख़त्म होने जा रही है।

Monday, 2 November 2009

2 नवबंर 09: टेलीविजन के इतिहास में एक अश्लील दिन



मूलतः प्रकाशित- मोहल्लाlive
हमें स्क्रीन पर तीन-चार बुज़ुर्ग टकले, सिर्फ सिर दिखाई देते हैं। एक के ऊपर एक आपाधापी करते हुए मीडियाकर्मी आगे बढ़ते हैं। बादशाह उन्हें बार-बार बैठने की सलाह देता है। कभी मुस्कराते हुए,कभी आवाज़ में थोड़ी तल्खी बरतते हुए लेकिन इन पर कोई असर नहीं होता। उसी धकमपेल में बादशाह की ओर से घोषणा की जाती है – आपलोग परेशान मत होइए, केक काटे जाने के फोटोग्राफ्स आपलोगों के बीच बांट दिये जाएंगे… यू ऑल आर माइ फ्रैंड्स… तू आ न इधर से… तेरे को तो मैंने पहले भी दिया था… हैव कोल्डड्रिंक प्लीज़। बादशाह इन अनुभवी मीडियाकर्मियों को अपना दोस्त बताते हुए शुक्रिया अदा करते हैं। स्क्रीन पर लगातार फ्लैश होता है – शाहरुख़ लाइव। सिलेब्रेटी को कवर करने का दौरा इस तरह से पड़ता है कि हम ऑडिएंस को सिर्फ टकले सिर दिखते हैं। टेलीविज़न ये एथिक्स भी भूल जाता है कि ऑडिएंस के साथ किस हद तक ईमानदारी बरतनी है। क्या आज हम अपने हिस्से आयी इन तस्वीरों के जरिये टेलीविज़न के हीस्टीरिया फेज का अंदाजा लगा सकते हैं? थोड़े-बहुत हेर-फेर के साथ ये नज़ारा लगभग सभी चैनलों पर था।

पांच-दस-पंद्रह साल, बीस साल से जर्नलिज्म करनेवाले देश के मीडियाकर्मी किंग खान कहे जानेवाले शख्स की केक काटने की तस्वीर लेने के लिए पूरी ताक़त झोंक देते हैं। आपाधापी के बीच वो किसी भी तरह से उस तस्वीर को हम तक लाइव पहुंचाना चाहते हैं। टेलीविज़न ने लाइव देखने का जो रोमांच और दिखाने का जो आंतक हमारे बीच पैदा किया है, उसके पीछे किसी भी तरह के इथिक्स काम नहीं करते। हम सिर्फ टकले सिर और पिछाड़ी देखकर किस प्लेज़र मोड में अपने को पाते हैं, चैनल को इस पर एक बार ज़रूर सोचना चाहिए। बाज़ार की गोद में बैठकर भी पसीना बहानेवाले और उसका पक्ष लेनेवाले मीडियाकर्मियों से एक बार सवाल तो ज़रूर किये जाने चाहिए कि हम अगर आपके चाल-चरित्र को समझते हुए ये समझ रहे हैं कि आपके एजेंडे में सामाजिक विकास और दायित्व का मामला कहीं नहीं है तो फिर क्या देश के ये अनुभवी पत्रकार सिर्फ इस काम के लिए रह गये हैं कि वो हांफते हुए, अपनी हड्डियां चटकाते हुए केक काटने का लाइव शॉट तैयार करें? यहीं से उनकी एक्टिविटी के दो चरित्र हमें साफ तौर पर दिखाई देते हैं। एक चरित्र जहां कि वह लगातार “आइस संस्कृति” ( इनफॉर्मेशन, इंटरटेनमेंट और कनज्‍यूमरिज्म से पैदा की जानेवाली संस्किकृति) को मज़बूत करता नज़र आता है और दूसरा कि ख़बर हर कीमत पर या जहां हम हैं वहां ख़बर है के दावे के साथ अपने को समाज का पहरुआ साबित करने की कोशिश में लगे रहने की घोषणा करता है। मीडिया के ये दोनों चरित्र ऊपरी तौर पर एक दूसरे के वायनरी नज़र आते हैं लेकिन गंभीरता से देखें तो ये पहले के चरित्र को ही सपोर्ट करता नज़र आता है। ऐसे में सामाजिक मसले के सारे सवाल पहले के चरित्र में इमर्ज कर जाते हैं और एक नये किस्म की ख़तरनाक स्थिति पैदा होती है।

पिछले तीन दिनों से देश के लगभग सारे हिंदी चैनलों ने अपनी-अपनी इंदिरा खोजने और गढ़ने में अपनी ताक़त झोंक दी। इस इंदिरा यात्रा के जरिये उन सवालों से ऊपरी स्तर पर ही सही, लोकतंत्र के मिज़ाज और ज़रूरतों को समझने की कोशिश की गयी जो कि किसी भी देश के लिए खाद-पानी का काम करते हैं। इन तीन दिनों में फ्रैक्चर्ड डेमोक्रेसी का भी मसला जहां-तहां उठाया गया। अगर चैनलों की इस कोशिश में मौजूदा समय के सवाल जुड़ते तो उन्हें आज दस साल से लगातार अनशन पर बैठीं इरोम शर्मिला का ध्यान आता। उन्हें ये चेहरा उस प्रतिरूप के तौर पर याद आना चाहिए था जो कि प्रशासन के बर्बर हो जाने पर उसके प्रतिरोध में खड़े होनेवाले चेहरे को याद करने के तौर पर याद आते हैं। लेकिन भाव, आस्था और फिर अंधश्रद्धा की गोद में जाकर गिरनेवाले इस देश की ऑडिएंस के लिए चैनलों ने इस प्रतिरूप की सुध लेने के बजाय इंदिरा की स्टोरी करके बाद की थकान मिटाने के लिए शाहरुख़ की तरफ मुड़ना ज़रूरी समझा। वो अब चौबीसों घंटे देश के इस शख्स को दिखा-दिखाकर अवतार की इमेज बनाने में थक कर चूर हो जाएगा लेकिन वो कभी भी इस बात को सामने लाने की कोशिश नहीं करेगा कि मौजूदा हालात में मणिपुर का प्रशासन इरोम के साथ किस तरह की ज़्यादतियां कर रहा है? उसके लाख प्रतिकार के जाने के बावजूद भी किस तरह से नली के जरिये उन्हें खाना खिलाये जाने की जबरन कोशिशें की जा रही है, कैसे उन पर आइपीसी की धारा 309 लगाकर आत्महत्या की कोशिश के आरोप में 21 नवंबर 2000 को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया?

टेलीविज़न में सरोकार की ख़बरों की हिस्सेदारी की मांग करते हुए हमें देश के उन तमाम मीडियाकर्मियों तर्क बेहतर ढंग से याद हैं, जो ये मानते हैं कि जो दिखता है वही तो दिखाया जाएगा? इस मार-काट के धंधे में हम उन ख़बरों को लेकर रिस्क तो नहीं ले सकते जो कि टीआरपी पैद करने की कूव्‍वत नहीं रखते? तर्क और बहस का फिर उन तालठोंक चैलेंजों की तरफ मुड़ जाना कि तो आप ही सामाजिक सरोकार की ख़बरें दिखाते हुए चैनल चलाकर दिखा दीजिए, हम फिलहाल इस चैलेंज से तौबा करते हुए सिर्फ एक ही सवाल करना चाहते हैं? क्या हम चैनल सिर्फ केक के टुकड़े देखने के लिए देखते रहें, आपाधापी करते मीडियाकर्मियों के टकले सिर और पिछाड़ी देखने के लिए चैनल देखते रहें, सास की आस में दिल में सच और ज़ुबां पर इंडिया का लेबल लगा कर देखते रहें? ये आपका चैनल है, आपको जो जी में आए कीजिए, मन करे तो कैटरीना को रिपोर्टर बना दीजिए जो कि आपने बना ही दिया है लेकिन रह-रहकर सामाजिक विकास औऱ सरोकार का जो दौरा आप पर आता है, उसका हम क्या करें? आप जब ये दिखाते हैं कि इस देश में नक्सलवाद एक गंभीर समस्या है, इसे किसी भी रूप में कुचलनेवाले पी चिदंबरम का हीरोइक इमेज बनाते हैं, इस मसले पर राष्ट्र की चिंता का लेबल चस्पाते हैं, तब इन सारी बातों को हम किस रुप में लें? अगर आपके तर्क पर ये समझा जाए कि आप अपने को बचाये रखने के लिए इसे ज़रूरी मानते हैं कि टीआरपी ऑरिएंटेड होकर काम किया जाए तो फिर ये राष्ट्र, विकास, सरोकार ब्ला, ब्ला सब टीआरपी का ही हिस्सा हुआ न? तो फिर आप अपने भीतर वो ताकत क्यों नहीं पैदा कर पाते कि नक्सलवादियों द्वारा घरों के जलाए जाने,लोगों के मारे जाने की खबर टीआरपी का हिस्सा बन जाती है लेकिन राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर हजारों बेकसूर लोगों के जान लिए जाने की घटना टीआरपी का हिस्सा नहीं बनने पाती। पुलिस ने नक्सलियों को किस तरह से मार गिराया,टीआरपी का हिस्सा बन जाती है लेकिन पुलिस मशीनरी किससे किससे किसको बचाने का तुक्का प्रयास कर रही है ये हिस्सा नहीं बन पाता। गांधी के नाम पर कहां-कहां मूर्तियां लगायी गयी,समारोहों का आयोजन हुआ ये तो हिस्सा बन जाती है लेकिन उसी गांधी की अहिंसा का रास्ता अपनानेवाली इरोम शर्मिला कभी भी हिस्सा नहीं बन पाती। कहीं ऐसा तो नहीं कि मीडिया का पूरा चरित्र जहां उत्सवधर्मिता पैदा करने के मामले में बहुत चटकीला दिखायी देता है वहीं सरोकारों के सवाल पर ग्रे बनकर रह जाता है।
इस देश की तो फितरत ही रही है कि गांधी, भगत सिंह और शास्त्री जैसे लोगों को आदमी से बढ़कर अवतार की तरह पूजा जाता है लेकिन न तो इस बात की कामना होती है कि हमारे घर गांधी और भगत पैदा हो और अगर इसके चिन्ह कहीं दिखाई देते हैं तो उसे कुचल डालो। इसमें आपकी और टीआरपी की काबिलियत कहां तक है? इस देश में इंडियन ऑयडल खोजना आसान हो गया है, वॉइस ऑफ इंडिया खोजना आसान हो गया है, किंग खान की खोज एक दिन के भीतर हो सकती है लेकिन बदलाव के लिए उभरते चेहरों की या तो पहचान ध्वस्त की जाती है या फिर अपनी पूरी ताक़त इसे मिटा देने में लगा दी जाती है। अब जब आजादी, बदलाव, हैप्पीनेस और मैराथन टीआरपी के खांचे में ही रहकर आनी और होनी है, ऐसे में ज़रूरी है कि टीआरपी के खेल का विस्तार हो।

ख़बरों के चरित्र को लेकर जब भी टेलीविज़न की आलोचना की जाती है तो प्रिंट मीडिया का सिर अपने आप ही उचक जाता है। बरी कर दिये जाने के दर्प से उसकी अकड़ छिपाये नहीं छिपती। लेकिन इस क्रम में आइस यानी सूचना (मीनिंगलेस), मनोरंजन और उपभोक्तावाद के जरिये पैदा की जानेवाली ठंडी संस्कृति को मज़बूत करने में जुटा है, इस पर भी बात करना ज़रूरी है। आधे-आधे पन्ने में नंबर वन हरियाणा का राग अलापनेवाले अख़बारों से ये सवाल होने चाहिए कि तुरही बजाने की कला में लगातार निष्णात होनेवाले महानुभावो, क्या आपके पास एक कॉलम भी नहीं बचा रह जाता कि सरोकारों से जुड़ी ख़बरें उनमें छापी जा सके। क्या सामाजिक गतिविधियों की सूचना जानने के नाम पर हम अख़बार सिर्फ इसलिए खरीदते हैं कि उससे हम जान सकें कि गांधी जयंती के मौके पर खादी पर कितने प्रतिशत की छूट मिली है। ऐतिहासिकता और संदर्भों को इस आइस संस्कृति में लपेट मारने के पहले आपको कई सवालों के जबाब देने होंगे। ख़बरों को धकेलकर आप आंकड़ों की बदौलत राज करने की खुशफहमी में ज़्यादा दिनों तक जिंदा नहीं रह सकते।