Monday, 23 February 2009

इसके पहले भी कई चैनलवाले आए यहां


जरा ड्राइंग रुम से बाहर तो झांकिए, पूरा भारत आपका इंतजार कर रहा है। ये रवीश कुमार का विश्लेषण है, एनडीटीवी इंडिया का विश्लेषण है उस फिल्म को लेकर जिसे मेरे साथी ब्लॉगर भारतीय औऱ विदेशी के साथ जोड़कर देख रहे हैं। वो एक सवाल को लेकर बैठे हैं कि क्या अगर इस फिल्म को कोई भारतीय बनाता, तब भी उसे ये अवार्ड मिलता। हम कब वैश्विक हो जाते हैं औऱ कब खालिस भारतीय, पता ही नहीं चलता। पोस्ट को देखकर एकबारगी तो मन में आया कि एक कमेंट दे मारुं कि क्या भारतीयता का सवाल आज भी हमारे लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि आज से चालीस-पचास साल पहले रहा है। अगर तिरंगे का होना ही एक बड़ा सच और शाश्वच सच है तब तो भारतीयता का चिरकाल तक जिंदा रहना तय है। तब हमें भूमंडलीकरण, वैश्विक संकट आदि मसलों पर बात करनी ही नहीं चाहिए। लेकिन मैं कोई कमेंट करता, इसके पहले ही एनडीटीवी इंडिया पर स्लमडॉग मिलेनियर को लेकर एक दूसरा ही विश्लेषण चल रहा था जो कि चलते-चलते मेरी पकड़ में आ गया।
रवीश कुमार ने कहा औऱ देश के उस घिसे इलाके की बाइट दिखायी जहां के लोगों की आंखे मनमोहन सिंह या फिर शीला दीक्षित के आने पर नहीं चमकती है, रानी मुखर्जी को देखकर चमकती है। इसे आप सिर्फ पसद-नापसंद का मामला समझकर नजरअंदाज नहीं कर सकते। आप ऐसा नहीं कह सकते कि लोगों की राजनीति समझ खत्म होती जा रही है, राजनेताओं के प्रति सम्मान घटता जा रहा है औऱ सारी की सारी श्रद्धा सिनेमा और टीवी पर मौजूद लोगों की भेंट चढ़ गयी है। यह मिजाज की शिफ्टिंग और उत्साह की वजहों के बदल जाने की भी खबर है। यह नाउम्मीदी औऱ हताशा को जाहिर करने की भी खबर है। यह माध्यमों में संभावना तलाशने की भी खबर है। लेकिन ये किसकी संभावना की खबर है।
निजी चैनलों के शुरुआती दिनों में चैनल के रिपोर्टर्स जब दूरदराज गांव, कस्बों में जाकर लोगों से सवाल-जबाब करते, उनके दर्द के हमदर्द बनकर उनसे बातें करते तो एकबारगी लगा कि जिस दर्द औऱ तकलीफ को हमारे नेता नहीं सुन पाते, जिन पगडंडियों पर राजनेताओं की बड़ी गाडियां नहीं पहुंच पाती, वहां जैसे ही चैनल की गाडियां पहुचीं लोगों के बीच संभावना पैदा हुई कि जब इनकी गाडियां यहां तक पहुंच सकती है तो फिर हमारे नेताओं की क्यों नहीं। इसका सीधा मतलब है कि हमारे नेता हमें नजरअंदाज करती है। यहीं पर आकर लोगों ने न्यूज चैनलों पर भरोसा करना शुरु किया। देश की जनता या ऑडिएंस ने एक लम्बे अर्से तक चैनल के भरोसे हालात बदलने की उम्मीद में बिताए हैं। आज आप देश के किसी भी कोने में, इंटिरियर से इंटिरियर इलाके में चले जाइए, कैमरे और माइक लेकर, वहां के लोग आपको हैरत से नहीं देखेंगे, एक घड़ी बहुत उत्सुक होकर आपके कैमरे और माइक को देखे औऱ फिर आपको देखे। लेकिन पीछे से किसी न किसी अनुभवी का आवाज जरुर आ जाएगी, कई बार तो एक दो चैनल तक नाम ले लेंगे कि इसके पहले भी फलां चैनल के लोग आए थे और फोटो लेकर चले गए।
रवीश ने इसी शब्द को दोहराया, कैमरा से तस्वीर लेनेवाले लोग आते हैं और तस्वीरें लेकर चले जाते हैं। इधर पिछले दस सालों से एनजीओ का जाल फैलने से एक बार फिर उम्मीद जगी कि चैनल वाले सीधे-सीधे कोई काम न भी करें लेकिन एनजीओ इनके द्वारा दिखायी गयी खबर के बाद कुछ तो हमारी सुध लेगी। देश की ये ऑडिएंस तब भी नहीं समझ पायी कि एनजीओ का काम करते हुए कैसे लोग मल्टीनेशनल कंपनियों के वाहक बन बैठे, उनके उत्पादों को बेचने में लग गए। साबुन से लेकर चिप्स तक। अब जब वो ये कहते हैं कि स्लमडॉग ने लोगों को बता दिया कि ड्राइंगरुम से बाहर निकलकर झांकिए, पूरा भारत आपका इंतजार कर रहा है,तब मेरे दिमाग में बस एक ही सवाल आ रहा है कि अब देश की ऑडिएंस किस हैसियत से ड्राइंग रुम से बाहर आनेवाले लोगों को देखेगी। अपनी कामना तो यही है कि ड्राइंगरुम से निकलकर झांकनेवाले लोग सिर्फ झांककर ही न रह जाएं बल्कि रचना के साथ सामाजिक सक्रियता के स्तर पर भी उनके बीच जाएं। ताजिल गोलमई के शब्दों में देश में कई ऐसे स्लमडॉग हैं, हमें उन्हें भी देखना चाहिए।

4 comments:

  1. शुक्रिया विनीत भाई, मौजू पोस्ट करने के लिए। जहां तक ड्राइंग रूम से बाहर झांकने का बात कही जा रही है तो मैं कहूंगा कि झांकने की नहीं वहां जाने की भी आवश्यकता है।

    दूसरी बात जो आपने कही- कुछ लोग डैनी बॉएल की फिल्म को अलग अंदाज में ले रहे है तो मैं उनका विरोधी हूं। अरे गुरु आप कब ग्लोबल हो जाते हैं और कब खुद को ड्रांइग रूम में कैद कर लेते हैं पात ही नहीं चलता है। हमें ग्लोबल होना होगा, ताकि सभी आगे बढ़ सकें।


    तीसरी बात न्यूज चैनलों को लेकर। तो जान लें अब गांव-देहात आपसे अंजान नहीं है। वो आश्चर्यचकित नहीं होता है आपके माइक और कैमरे को देखकर। वो अब इससे अनजान नही है। आजतक, इंडियाटीवी, सहार और इटीवी ने इन्हें आपसे दोस्ती करा दी है।

    हमारे कोसी इलाके में लोग एनडीटीवी के कुछ रिपोर्टरों को भी पहचानते हैं, जिसमें रवीश कुमार भी हैं। शायद रवीश इस कारण बेबाक होकर आपसे कह रहे हैं कि - "जरा ड्राइंग रुम से बाहर तो झांकिए, पूरा भारत आपका इंतजार कर रहा है।"

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  2. बिल्‍कुल सही लिख रहे हैं आप
    इत्‍तेफाक पूरा रखता हूं आपके
    विचार से, या तो वैश्विक मत
    होइए, अथवा बिसूरना बंद करें।

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  3. बढ़िया पोस्ट लिखी है।लेकिन लगता नही कि बाकी के स्लमडॉग की कोई सुध लेगा।

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