Wednesday, 2 May 2012

सौ साल का सिनेमा: जीजा वही जो सिनेमा दिखाए

मोहल्ले भर की दीदी एक-दूसरे को कोहनी मारते हुए किसान सिनेमा ( बिहार शरीफ) में घुसती और हम जैसे उम्र में बहुत ही छोटा भाई चपरासी की तरह पीछे-पीछे. शादी के बाद पहली बार ससुराल आए जीजाजी के साथ सालियों का फिल्में दिखाने ले जाना कोई वैवाहिक कर्मकांड का हिस्सा तो नहीं था लेकिन मजाल है कि ये परंपरा किसी भी तरह से टूट जाए. मोहल्ले की किसी दीदी की शादी हुई और वो पहली बार मायका आई और उनके पति ( हालांकि अब ये पति टीवी फैशन में सोलमेट और फेमीनिज्म के पन्नों में बुरी तरह बिलेन हो चुका है) ने सालियों को सिनेमा नहीं दिखाया तो समझिए कि उसकी पर्सनालिटी में कहीं न कहीं खोट है. दामाद दिलदार है, खुले मिजाज का मिलनसार है, इसकी पहचान इस बात से होती थी कि ससुराल पहुंचने के घंटे-दो घंटे बाद अपनी सबसे छोटी साली जिसके कि अक्सर पीरियड भी शुरु नहीं होते से पूछे- सलोनी,जरा हिन्दुस्तान देखकर बताइए तो कि किस टॉकिज में कौन-कौन सिनेमा लगा है ? बस इतना पूछा नहीं कि मोहल्ले में ढोल-दुदंभी पिट गई- सदानंद बाबू के छोटका मेहमान दिलदार आदमी है, बड़ा करेजावाला है, आते ही सिनेमा जाने के बारे में कह रहा है. वैसे तो मोहल्ले की लड़कियों का सिनेमा देखना चाल-चरित्र का नाश हो जाने जैसा था लेकिन जीजाजी के साथ सिनेमा देखने जाना अपने आप में ऐसा सिनेमा था जैसे कि सेंसर बोर्ड के सर्टिफिकेट मिल जाने के बाद शील-अश्लील की बहस खत्म हो जाया करती है. सिनेमा को बदनाम विधा से मुक्त कराने में देश के लाखों जीजाओं का बड़ा हाथ रहा है. बहरहाल,

सलोनी हुलसकर हिन्दुस्तान ( पटना संस्करण) उठाकर लाती जिसमें कि पहले तो आधे से ज्यादा पटना के सिनेमाहॉल की चर्चा होती फिर नीचे दुबके हुए कॉलम में बिहार शरीफ के सिनेमाहॉल. सलोनी अपने जीजा को देखती कि वो सेब,बुंदिंया के फक्के मारने में लगे हैं, पूछती- जीजाजी,पढ़कर सुनाएं. जीजाजी बिना पीरियड शुरु हुए अपनी इस छोटी साली को बहन की तरह स्नेह करते. ये अलग बात है कि दीदी से एकांत में उसी तरह का घटिया मजाक करते जैसे कि अभी गली- मोहल्ले के लौंडे विद्या वालन की डर्टी पिक्चर देखने के बाद करते नजर आते हैं. लिहाजा वो पढ़ती- अंजता में खुदगर्ज, अनुराग में सुहाग, वंदना में करन-अर्जुन, नाज में आधी रात की मस्ती केवल व्यसकों के लिए. रहने दो,रहने दो. आधी रात की मस्ती सुनते ही पास बैठी कुछ दीदीयों के चेहरे सुर्ख लाल हो जाते. जीजाजी का कमीनापन चेहरे पर तैर जाता. बोलिए कौन सा देखिएगा ? चौतरफी जीजाजी को घेर रखी दीदीयां उन फिल्मों पर ज्यादा जोर देती जिसे मोहल्ले की चाचियां जाने से आमतौर पर मना कर देती. जैसे मेरी मां ही कहती- इ फिलिम नहीं देखेंगे रागिनी, सुने हैं बहुत चुम्मा-चाटी है इसमें. कोढिया असलमा सब होगा,जोर-जोर से सीटी मारेगा. मेरी मां की धारणा थी,सिनेमाहॉल में सीटी मारने और लफुआ हरकतें करनेवाले सब मुसलमान होते हैं क्योंकि हिन्दू लड़कें या तो शरीफ होते हैं या फिर गार्जियन का एतना कंट्रोल होता है कि ऐसा करते किसी ने जान लिया तो खाल उघार देंगे. जीजाजी के साथ ऐसी रिजेक्टेड फिल्में देखी जा सकती थी. क्या हुआ, चुम्मा-चाटी है तो साथ में तो जीजाजी हैं न. फिर दीदी भी तो जा रही है. मां-चाची के मना करने पर कोई मुंहफट दीदी तड़ाक से जवाब देती- रहने दो, नहीं जाते हैं. आएगा पढ़के विनीत तो शैलेन्द्रा के यहां से भीसीपी मंगाकर शिव महिमा देख लेंगे. घर के किसी मर्दाना जात ने टोका कि फैमिली के साथ देखनेवाला सिनेमा नहीं है तो पीछे से कोई सुना देती- तो हम कौन सा फिल्म देखने जा रहे हैं ? 

कुल मिलाकर जीजाजी के साथ वो फिल्में देखी जाती जिसमें थोड़ा-बहुत मसाला हो. ऐसे में मां-चाची जीजाजी के दो-चार घंटे की एक्टिविटी पर गौर करती. सबकुछ सही रहा तो हरी झंड़ी मिल जाती. जाने देते हैं, घर के मेहमान हैं, उन्नीस-बीस होगा तो साथ में हैं न और फिर जूली ( जो ब्याहकर आयी है) बउआ थोड़े हैं,समझती नहीं है कि मेहमान-पाहुन के साथ एतना-एतना जुआन-जवान बहिन के साथ जा रही है तो ध्यान रखे. बाकी तो हम जैसे चपरासी छोटे भाई होते ही जो थोड़ा भी इधर-उधर आने पर चट से मां को रिपोर्ट करते-  मां, इन्टरवल हुआ न तो जीजाजी सबको फंटा दे रहे थे औ लास्ट में सुषमा दीदी को दिए न त हाथ पकड़े ही रह गए. जीजाजी को बीच में बैठना होता,अमूमन एक तरह ब्याहकर आयी दीदी लेकिन दूसरी तरफ हम जैसों को जम बिठाया जाता तो जीजाजी का मूड उसी समय खराब हो जाता. आपकी बहिन को लेके भाग नहीं जाएंगे सालाजी, उठिए.बैठने दीजिए अल्का को यहां पर. हम अपना सा मुंह लेके हट जाते. अच्छा,हमें सभी दीदी की जासूसी करने के लिए तैनात नहीं किया जाता. हमें सिर्फ उस दीदी पर ज्यादा ध्यान देना होता जिसकी तुरंत शादी होनेवाली है, जिसकी कुंडली इधर-उधर कूद-फांद रही है. नहीं तो मोहल्ले की औरतों को दो मिनट भी गुलाफा ( अफवाहें ) उड़ाने में समय नहीं लगता- मेहमानजी के क्या है, मरद जात थोड़ा चंचल होता ही है लेकिन इ नटिनिया अल्कावा के नय सोचे के था कि सिनेमा जा रहे हैं त एतना सटके काहे बैठे, धतूरा पीस के खा ली थी क्या ? औ जूली के तो जब से बिआह हुआ है, जमीन पर गोड रहता ही नहीं है. पूरे सिनेमा देखने के दौरान हम मां-चाची के ब्यूरो होते जो अक्सर जीजाजी की नजरों में खटकते,कई बार दीदीयों के भी. मुझे तो जब अमिताभ मीडिया को जब-तब दुत्कारते हैं तो अपना बचपन याद आ जाता है.

सिनेमा देखकर लौटने के बाद दीदी लोगों पर नशा सा छा जाता. जो जीजाजी शहर के होते, लड़कियों के साथ पहले से फैमिलियर होते बेहिचक एक गोलगप्पा मुंह में डालकर खिलाते. कुछ दीदी मना कर देती लेकिन महसूस करती कि मन में खोट नहीं है तो खा लेती. इसी में किसी की सैंडल टूट जाती, जीजाजी रुककर मरम्मत करवा देते या नई खरीद देते. उसके बाद तो पूरे मोहल्ले में डंका. जाय दीजिए अर्चना के माय, शादी करने में हम भले ही बिक गए लेकिन दामाद मिला एकदम वृंदावन के बांके बिहारी. इस एक सिनेमा जाने में मोहल्ले भर के दामाद का चरित्र डिफाइन होता. तीन घंटे का एक सिनेमा और दो-ढ़ाई घंटे का फुचका-शीतल छाया की चाट से उनका आकलन होता.

अब तो बचपन का वो शहर बिहार शरीफ छूट गया. वहां गए दस साल से ज्यादा हो गए. दीदीयों का ब्याह अब भी होता है, जीजाजी पहलेवाली खेप से ज्यादा बिंदास होते होंगे, क्या पता पूरे मोहल्ले की बहनों को न ले जाकर सिर्फ अपनी साली को ले जाते होंगे, हम जैसा चपरासी भाई कहीं बैंग्लुरु, पुणे से एमबीए करने चला गया होगा..लेकिन बेहतर सिनेमा को क्या अब भी शहर के मेहमानजी ही जाकर पारिभाषित करते होंगे ? सौ साल के सिनेमा के इस साल पर मैं एक बार तो जरुर जाउंगा, शहर के उस बदले मंजर और सिनेमाहॉल देखने.


Thursday, 26 April 2012

"मंडी में मीडिया" बाजार में उपलब्ध

मीडिया भ्रष्टाचार और धत्तकर्म पर लिखी किताब "मंडी में मीडिया" अब बाजार में बिक्री के लिए उपलब्ध है. किताब को लेकर अब तक जितनी तरह की अटकलें लगायी जा रही थी, उस पर विराम चिन्ह लग गया है. आप इसे बहुत ही सहजता से खरीद सकते हैं. फ्लिपकार्ट के जरिए मेरे जिन दोस्तों ने आज से दस-पन्द्रह दिन पहले किताब की बुकिंग करायी है, दो-तीन दिन के भीतर ये किताब उनके हाथ में होगी.

किताब के बारे में अभी कुछ कहना सही नहीं होगा. आपके हाथ में जाने के बाद इसे लेकर आपकी अपनी खुद की प्रतिक्रिया होगी जो कि मेरे लिए ज्यादा मायने रखते हैं. हां इतना जरुर है कि फेसबुक, ईमेल और फोन के जरिए जो सवाल आपने हमसे किए हैं, उस संबंध में दो-तीन बातें स्पष्ट करना जरुरी है.


 पहली बात कि ये किताब मेरे किसी भी तरह के अकादमिक काम मसलन एम.फिल् या पीएच.डी रिसर्च का हिस्सा नहीं है. न ही पिछले कुछ सालों से समय-समय पर मीडिया के अलग-अलग मसलों पर लेख लिखे हैं उनका संकलन है. ये स्वतंत्र रुप से लिखी गई किताब है. इस थीम पर कि जो मीडिया अपने को लोकतंत्र का चौथा खंभा होने का दावा करता है दरअसल उसका चरित्र कैसा है ? दूसरी तरफ एक ऑडिएंस की हैसियत से मीडिया को लेकर हमारी जो उम्मीदें हैं, हमारे जो सपने है, मीडिया उन सबके बीच कैसे अपने धंधे का विस्तार करता है. हमने इस किताब का नाम मीडिया बिजनेस या अर्थशास्त्र इसलिए भी नहीं दिया कि ये साफ-सुथरे ढंग से बिजनेस भी नहीं करता. सच पूछिए तो जितना महान और सरोकार से जुड़े काम करने का दावा करता है, उसका मूल चरित्र उतना ही गंदला है.


 आमतौर पर मीडिया पर जो भी किताबें खासकर हिन्दी में लिखी जाती है,उसमें मीडिया के इस चरित्र की धुंआधार चर्चा तो जरुर होती है लेकिन जैसे ही मामला पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग का आता है, उसे नजरअंदाज करते हुए एक तरह से क्लीन चिट दे दिया जाता है. इस किताब में पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग यानी दूरदर्शन, आकाशवाणी और एफ एम रेडियों पर भी विस्तार से चर्चा की गई है.


राडिया मीडिया प्रकरण पर मीडिया ने जिस चतुराई से अन्ना आंदोलन का पर्दा डाला, उसे समझने में मुझे उम्मीद है कि ये किताब मदद करेगी. राडिया प्रकरण को मीडिया पाठ्यक्रम में बाकायदा एक केस स्टडी के तौर पर शामिल किया जाना चाहिए. सेवंती नैनन ने अपने कॉलम "मीडिया मैटर्स" में लिखा भी था कि राडिया से पत्रकारों की हुई बातचीत पीआर कोर्स करनेवालों के लिए पाठ सामग्री है लेकिन मेरा ख्याल है कि इसे पत्रकारिता कर के छात्रों लिए समान रुप से उपलब्ध कराया जाना चाहिए,उस पर बात होनी चाहिए. इस किताब में इस पर एक स्वतंत्र अध्याय है.


मीडिया में मौके-बेमौके सुधार की पंचायत लगती है. इनडस्ट्री के कुछ दिग्गज चेहरे गर्दन की नस फुलाकर दावा करते हैं कि मीडिया में पहले से तेजी से सुधार हो रहा है. लेकिन उनका ये दावा झोला छाप दवाईयों से कैंसर की बीमारी खत्म होने के दावे से कम हास्यास्पद नहीं है. बीइए और एनबीए जैसी संस्थाएं जो अनिवार्यतः चैनलों के पक्ष में काम करते हैं, वो कैसे एक राजनीतिक पार्टी की तरह काम करते हैं, उम्मीद है कि इस किताब से गुजरते हुए आप बेहतर ढंग से समझ सकेंगे. बहुत सपाट शब्दों में कहा जाए तो इन संस्थानों की नैतिकता इस बात पर टिकी है कि ऐसा कुछ भी न किया जाए जिससे कि चैनल की बैलेंस शीट खराब हो, उसकी सेहत पर बुरा असर पड़े.


इन सब तमाशे और मीडिया सर्कस के बीच जस्टिस काटजू का अवतरण आज का अर्जुन की तरह हुआ और एकबारगी ऐसा लगा कि वो अकेले ऐसे शख्स हैं जो मीडिया के इस धत्तकर्म और चीटफंट के खेल को तहस-नहस करेंगे लेकिन चूंकि मीडिया अपने बहरुपिए चरित्र निभाने में सिद्धस्थ है, ऐसे में जस्टिस काटजू भी टाइम्स नाउ के बहाने उस चमत्कार में उलझकर रह जाते हैं.


चैनल के कुछ चमकदार चेहरे जब प्रेस का पट्टा लगाकर कहते हैं कि हम मीडिया के जरिए समाज में हक की लड़ाई लड़ रहे हैं और हाशिए के समाज के लिए संघर्षरत हैं, उनके इस मुंबईया सिनेमा के डायलॉग को नेटवर्क 18 जैसा मीडिया बेंचर नुक्कड नाटक के लिए रिहर्सल मात्र का हिस्सा बनाकर छोड़ देता है, इसे आप उसकी रिलायंस इन्डस्ट्रीज से हुए जुगलबंदी से गुजरते हुए समझ सकेंगे. क्रॉस मीडिया ऑनरशिप को समझने के लिए इस पर लिखा स्वतंत्र अध्याय एक हद तक मदद करेगा.


इन सब बातों और विवादों के बीच ये कहना जरुरी है जिसे कि मैंने किताब की भूमिका में लिखी थी लेकिन फिसलकर मेरी लैप्पी में ही रह गयी- ये मेरी किताब है, ऐसा दावा करना सही नहीं होगा । ये दरअसल मेरे जैसे उन हजारों मीडिया छात्रों की सामूहिक अभिव्यक्ति है जो फ्लैट और गाड़ीधारी मीडियाकर्मी बनने से पहले ही इस मीडिया के लिए मिसफिट हो जाते हैं । ये उन हजारों पत्रकारों की कसक है जो सचमुच कुछ अलग करना चाहते हैं, फोन पर लंबी-लंबी बातचीत में इस मीडिया मंडी की हकीकत और फसाने सुनाया करते हैं । मेरे पास घंटों टीवी देखने, रेडियो सुनने के समय थे, जेआरएफ नाम का एक पेड़ था जिस पर पांच साल के लिए मेरी जरुरत से ज्यादा पैसे उगते थे और टाइपिंग स्पीड थी...तो बस एक किताब लिख डाली ।


कहां से मिलेगी "मंडी में मीडिया" ?-


1. वाणी प्रकाशन,4695,21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-110002, संपर्क-01123273167
2. फ्लिपकार्ट

3. बुक सेंटर, आर्टस फैकल्टी, दिल्ली विश्वविद्यालय, नार्थ कैंपस
4. मीडियाखबर.डॉट.कॉम, संपर्क- pushkar19@gmail.com( मीडियाखबर के जरिए किताब खरीदने पर विशेष छूट)

5. विनीत कुमार- 9811853307 ( मीडिया के जो छात्र और साथी किताब पढ़ना भर चाहते हैं,फिर लौटा देंगे )


नोट- अभी किताब की सिर्फ हार्डकॉपी उपलब्ध है, पेपरबैक अगले सप्ताह तक..

Wednesday, 25 April 2012

शोर से संगीत पैदा करने की कोशिश: साउंड ट्रिपिन


दुनिया के लिए जो आवाज शोर है, वो स्नेहा खानवलकर के लिए संगीत है.  सड़कों पर जिन ऑटो रिक्शा, हार्न की चिल्ल-पों, भागती-चिल्लाती भीड़ देखकर हम झल्ला उठते हैं, स्टडी टेबल पर बैठकर हम कुछ पढ़ना चाहते हैं और बाहर की ढन-ढन और किचन की उठापटक से हम इरिटेट हो जाते हैं, स्नेहा के लिए उन सबके बीच संगीत है. एमटीवी की बांह पकड़कर इन दिनों वो इसी तरह की आवाज को रिकार्ड करने और फिर उसे गानों की शक्ल देने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में घूम रही है.

 साउंडट्रिपिन नाम के इस शो को एमटीवी जिस तरह से प्रोमोट कर रहा है, अगर उसके दावे आगे चलकर सच निकलते हैं तो टीवी का वाकई एक दिलचस्प शो होगा. एक तो ये कि कई आवाजें, ध्वनियां शायद आनेवाले समय में खत्म हो जाएंगी, जिसे आज हम शोर मानकर नकार दे रहे हैं, बाद में उसे याद करके नॉस्टैल्जिक हो उठें, उन सबका संग्रह हो सकेगा. दूसरा कि जो ध्वनियां और धुनें छोटी जगहों पर सिमट गयी है, किसी खास बिरादरी या क्षेत्र का हिस्सा बनकर रह गयी है, उसका विस्तार हो सकेगा. और इन दोनों से भी जरुरी एक बात की संगीत की धुनें सिर्फ साज से ही पैदा नहीं होतीं, रोजमर्रा की उन हरकतों और हलचलों से भी पैदा होते हैं, इस दिशा में आगे भी प्रयोग की संभावना बढ़ेगी. बेलन, घड़ा,थाली-परात के जरिए संगीत अजब-गजब कारनामों में जब-तब दिखाया जाता रहा है, हिन्दी सिनेमा और साहित्य में ऐसी ध्वनियों की जब-तब चर्चा होती रही हैं लेकिन ये खोज का हिस्सा कभी नहीं रहा.
स्नेहा और एमटीवी इस शो के जरिए आज अगर ये दावा कर रहा है कि वो इन आवाजों और नकारे जानेवाले शोर से दस गाने हमारे सामने पेश करेगा तो हम सिर्फ मनोरंजन के लिहाज से नहीं देख रहे हैं. हम देख रहे हैं कि एक तरफ तो नैचुरल आवाजें भी जहां सिंथेसाइजर और कैसिओ में जाकर कैद हो जा रही है, कीबोर्ड के जरिए सारी ध्वनियां पैदा कर दी जाती है, वहीं भीड़-भाड़ और धक्का-मुक्की के बीच से जिन शोर और आवाज की रिकार्डिंग होगी, वो संगीत की दुनिया में क्या अलग करेगा ? अच्छा ही है अगर इनमें से एक भी गाने पॉपुलर होते हैं तो हमारी दुनियाभर के शोर-शराबे के बीच रहते हुए भी झल्लाहट पैदा होने के बजाय उनमें संगीत के बीज खोजने की बेचैनी बनी रहेगी.

Tuesday, 24 April 2012

न्यूज चैनलों से ज्यादा संवेदनशील है क्राइम पेट्रोल


अपराध से जुड़ी घटनाओं और खबरों पर आधारित कार्यक्रमों के जरिए जागरुक करने के न्यूज चैनल चाहे जितने भी दावे कर ले लेकिन उसका असली मकसद जुर्म को तमाशे में तब्दील करने से ज्यादा कुछ नहीं है. ये बात मजबूती से इसलिए भी कही जा सकती है कि जिस नाट्य रुपांतर का इस्तेमाल घटना के बिखरे तारों और सबूतों को जोड़कर अधिक प्रामाणिक और विश्वसनीय बनाने के होने चाहिए, उसे पूरी तरह टीवी सीरियल का असर पैदा करने के लिए किया जाता है.

ढिंचिक-ढिंचिक बैग्ग्रांउड म्यूजिक, व्ऑइस ओवर और सर्कस की तरह एंकरिंग से घटना के प्रति चैनल की संवेदना और पूरी तरह खत्म हो जाती है. ऐसे में ऑडिएंस के सामने सीधा सवाल है कि अगर उसे सच्ची घटनाओं पर आधारित तमाशे ही देखने हैं तो वो सनसनी, वारदात या जुर्म क्यों देखे क्राइम पेट्रॉल क्यों न देखे ? कम से कम उसके दिमाग से ये भ्रम तो खत्म हो जाएगा कि वो कोई न्यूज चैनल देख रहा है.

सोनी एन्टरटेन्मेंट चैनल पर वैसे तो सालों से क्राइम से जुड़े कार्यक्रम दिखाए जा रहे हैं लेकिन सीजन 4 में सच्ची घटनाओं पर आधारित जो एपीसोड प्रसारित किए जा रहे हैं, वो थोड़े वक्त के लिए भरोसा पैदा करते हैं कि मनोरंजन के जरिए भी ऑडिएंस को बेहतर ढंग से संवेदनशील और क्रिटिकल बनाया जा सकता है. मनोरंजन चैनल होने के नाते चैनल को पूरी छूट है कि वो इन घटनाओं को ज्यादा से ज्यादा नाटकीय ढंग से पेश करे लेकिन इसकी सादगी और शांत शिल्प में प्रस्तुति कार्यक्रम को अधिक विश्वसनीय बनाती है. अनूप सोनी न्यूज चैनलों की तरह किसी भी तरह की ड्रामा शैली अपनाने की जरुरत नहीं पड़ती और सामान्य ढंग से घटना के बारे में तफसील से बताते जाते हैं जो कि ज्यादा प्रभावी लगता है. शायद यही कारण है कि जब भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़नेवाले सत्येन्द्र दुबे जिसकी हत्या कर दी गई पर चैनल ने एपीसोड (100) दिखाए तो किसी भी न्यूज चैनल के स्टिंग ऑपरेशन से ज्यादा स्पष्ट और भरोसेमंद लगे.

इसमें कोई दो राय नहीं कि क्राइम पेट्रॉल जिस “जुर्म के खिलाफ जंग” के दावे कर रहा है, उसमें उसका व्यावसायिक हित छिपा है और ऐसा करके कोई समाज सेवा नहीं कर रहा. लेकिन अगर मनोरंजन के जरिए भी समाज को बेहतर ढंग से संवेदनशील और मुद्दों के प्रति जागरुक बनाया जा सकता है तो इसकी तारीफ की जानी चाहिए. सीरियल के पीछे बेहतरीन रिसर्च वर्क है जो कि स्क्री पर साफ झलकता है. जिसे देखकर शायद आप भी कहें- काश, इसी तरह की समझ और सतर्कता से हमारे न्यूज चैनल भी काम करते तो उसका अलग ही असर होता. वो मनोरंजन से कहीं आगे संबंधित व्यक्ति/ संस्थान पर दबाव बनाने का काम कर पाता. ( मूलतः तहलका में प्रकाशित )

Monday, 23 April 2012

स्टार न्यूज का उतरन लगता है एबीपी न्यूज का लोगो


स्टार न्यूज से आनंद बाजार पत्रिका का करार खत्म होने के बाद पत्रिका का अपने दम पर चैनल लांच करने की प्रक्रिया शुरु हो गयी है. आनंद बाजार पत्रिका ने चैनल का नाम एबीपी न्यूज रखा है. अब तो चैनल का लोगो भी वर्चुअल स्पेस पर तैरने शुरु हो गए हैं. फेसबुक और सोशल मीडिया पर एबीपी चैनल के लोगो और नाम को लेकर धुंआधार प्रतिक्रिया जारी है.

एबीपी नाम के साथ सबसे बड़ी दिक्कत है कि इसका उच्चारण करते हुए जीभ लड़खड़ाती है. फर्राटेदार तरीके से जैसा कि चैनल के एंकर बोलने के अभ्यस्त होते है, ये नाम उनकी इस आदत से मेल नहीं खाता है. ऐसे में बहुत संभव है कि स्टार न्यूज के बैनर तले काम करनेवाले एंकर इस चैनल को एबीपी के बदलते एबीवीपी न कह दें. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को तो बिना कुछ किए-धरे क्रेडिट मिल जाएगी लेकिन एंकर की किरकिरी होनी तय है.

चैनल का नाम रखने के दौरान आनंद बाजार पत्रिका भले ही अपने नाम का मोह नहीं छोड़ पाया हो लेकिन इतना जरुर है कि नाम रखने के पहले इसके सीइओ सहित बड़े एंकरों को डेस्क पर आकर,सामने आईना रखकर दो-चार बार बोल लेना चाहिए था- नमस्कार, मैं हूं दीपक चौरसिया और आप देख रहे हैं एबीपी न्यूज..तब शायद वो इसे कोई और नाम देने के बारे में गंभीरता से सोच पाते.

दूसरी बड़ी दिक्कत इसके लोगो को लेकर है. देखकर एकबारगी लगता है कि किसी बिल्डिंग की लिफ्ट की लालबत्ती वाली साइन की फोटोकॉपी कराकर,उसे ब्लू रंग से रंगकर चिपका दी गई हो. अब लोगो बेचारा बेतहाशा अदनान सामी के माफिक गा रहा है- थोड़ी सी तो लिफ्ट करा दे. चैनल शुरु होने के पहले ही इसे टीआरपी के लिए मंगता चैनल का हुलिया देने की भला क्या जरुरत थी ? अब इससे बड़ी बिडंबना क्या हो सकती है कि इन सबके वाबजूद एबीपी ने पंचलाइन नहीं बदली है. अभी भी स्टार न्यूज की पंचलाइन ही नत्थी किए हुए है- आपको रखे आगे. अब सवाल है कि जिस चैनल के अभी दूध के दांत भी नहीं उगे और झड़े हैं, वो भला देश की ऑडिएंस को क्या आगे रखेगा ? ये साल 2012 के अबतक का सबसे बड़ा मीडिया चुटकुला है.:) मीडिया का बच्चा( चैनल) पैदा होने के पहले ही सरोकार की चादर ओढ़ने की फिराक में क्यों लगा रहता है ?

कहते हैं इतिहास के निशान इतने गहरे होते हैं कि कई बार रीढ़ की हड्डी बनकर पीठ पर चमकते हैं. एबीपी न्यूज के लोगो के साथ भी कुछ ऐसा ही है. स्टार न्यूज ने आनंद बाजार पत्रिका से तलाक के बाद भी अपना इतिहास उसमें जड़ दिया. अपने सितारे का एक कोना तोड़कर दे दिया जो कि लिफ्ट की साइन है. मानो कह रहा है- लो तुम्हें स्टार न्यूज का एक टुकड़ा दिया, ये मेरे साथ इतने सालों की रिलेशनशिप की निशानी है. इसे संभालो और धीरे-धीरे स्टार बना लो, हम दूसरी संतान पैदा कर लेंगे.
मूलतः प्रकाशित- मीडियाखबर डॉट कॉम

Monday, 16 April 2012

ये किस घटिया खेल में शामिल हैं मोहल्लालाइव के अविनाश ?

सुबह उठकर जब मैंने वेबसाइट खंगालने शुरु किए तो देखा जनसत्ता के जिस लेख "पेड न्यूज के पिछवाडे" की पीडीएफ मोहल्लालाइव को भेजी थी,वो लेख भड़ास4मीडिया पर छपा है. उस लेख में इस बात का कहीं जिक्र नहीं था कि ये पहले जनसत्ता में छप चुका है. लिहाजा सबसे पहले मैंने भड़ास4मीडिया के कमेंट बॉक्स में लिखा- सर,ये लेख कल जनसत्ता में छप चुका है और इस बात का जिक्र किया जाना जरुरी है. थोड़ी देर बाद वेबसाइट ने इसे शामिल कर लिया.

जीमेल इन्बॉक्स देखा तो उसमें अविनाश के मेल थे. लिखा था- चूंकि यह अभियान भड़ास ने चलाया है,वहां ये छपे तो ज्यादा सही रहेगा. रात में ब्रॉडबैंड न चलने की स्थिति में मैंने ये मेल सरसरी तौर पर मोबाईल से देखा था लेकिन लैपटॉप से पूरा खोलकर देखने पर पता चला कि यूनीकोड में कन्वर्ट करने के बाद अविनाश ने वो लेख भड़ास4मीडिया के मॉडरेटर यशवंत सिंह को भेजा है. मुझे अटपटा लगा और साथ में बेतुका भी. जब मैंने लेख मोहल्लालाइव के लिए भेजा था तो उसे भड़ास4मीडिया को भेजने की क्या जरुरत थी ? अगर अविनाश को ये लेख मोहल्लालाइव पर नहीं छापनी थी तो उसे इग्नोर करने या फिर मना करने के कई बहाने हो सकते थे. ये मॉडरेटर का अपना विवेक और निर्णय है कि वो अपनी वेबसाइट पर क्या छापे,क्या नहीं. जैसा कि वो पहले से करते आए हैं. नहीं छापने की स्थिति में मेरे सहित दूसरे लोगों को भी वजह बताई है कि चूंकि ये लेख पहले कहीं छप चुका है, हम इसे मोहल्लालाइव पर नहीं छाप सकते. ये अलग बात है कि कई ऐसे लेख जो उन्हें जरुरी लगा,वर्चुअल स्पेस की कब्र से खोदकर निकालकर छापते रहे हैं. खैर,

मोहल्लालाइव या किसी भी दूसरी वेबसाइट के लिए भेजा गया लेख वहां न छपने की स्थिति में कहां छपेगा,ये तय करने का अधिकार उस वेबसाइट के मॉडरेटर को है या फिर खुद लेखक को,ये अविनाश जैसे सधे मॉडरेटर से बेहतर भला कौन बता सकता है ? उन्होंने किस समझदारी से ये लेख भड़ास4मीडिया को भेज दिया,ये अभी तक मेरी समझ के बाहर है. अगर उनके तर्क के हिसाब से भी समझने की कोशिश करें कि इस लेख में भड़ास4मीडिया का जिक्र है तो वहां छपनी चाहिए. इसमें सीधा सा सवाल है कि लेख में मीडिया दरबार डॉट कॉम का भी तो जिक्र था, फिर उसे क्यों नहीं भेजा. जब इस लेख के जरिए प्रचार-प्रसार( उनसे लिया उधार के शब्द) ही करना था तो ये मौका मीडिया दरबार को क्यों न दिया गया ? अविनाश ऐसा करके आखिर साबित क्या करना चाहते हैं ? कहीं भड़ास4मीडिया के मॉडरेटर को ये एहसास कराना तो नहीं कि विनीत कुमार की इच्छा थी कि ये लेख इस वेबसाइट पर छपे और चूंकि पिछले चार सालों से मॉडरेटर यशवंत सिंह से सीधे बात नहीं की है तो अविनाश दास के जरिए लेख छपवाने की कोशिश की ? अविनाश को क्या ऐसा करने का हक है कि वो इस तरह की अटकलें और आकलन लगाने की छूट उस वेबसाइट को दे जहां पिछले चार सालों से लेखक की कोई भी पोस्ट नहीं छपी है.

ये वही अविनाश हैं जिन्होंने आज से चार साल पहले मोहल्ला( तब वो ब्लॉग भर था) पर मेरी पोस्ट ये कहते हुए छापने से मना कर दिया था कि जो भड़ास पर छपता है,हम उसे यहां नहीं छापते. आज आखिर ऐसा क्या हो गया कि चार साल से जो लेखक सिर्फ मोहल्ला औऱ मोहल्लालाइव के लिए लिखता आया है, उसका लेख भड़ास4मीडिया को यूनिकोड में कन्वर्ट करके भेजा गया ? ये बात भड़ास4मीडिया पर छपे लेख और किए गए परिवर्तन पर ध्यान देने पर आसानी से समझ आ जाता है.

दरअसल लेख में मैंने लिखा था कि सबसे पहले स्टार न्यूज ने निर्मल बाबा के विरोध में स्टोरी चलायी जबकि अविनाश को इस बात से असहमति थी. उनके अनुसार न्यूज एक्सप्रेस ये काम पहले से करता आया है. न्यूज एक्सप्रेस के कुछ प्रोग्राम कार्टून की शक्ल में हमने पहले भी देखे थे. उड़ती-उड़ती ये भी खबर आयी कि चूंकि न्यूज एक्सप्रेस को निर्मल बाबा ने विज्ञापन देने लायक नहीं समझा तो आखिर में चैनल के मुखिया मुकेश कुमार झंड़े लेकर खड़े हो गए. थर्ड आइ ऑफ निर्मल बाबा पिछले ढाई-तीन महीने से आ रहा है, जाहिर है मुकेश कुमार इस कार्यक्रम से गुजरे होंगे.लेकिन ये चैनल हर खबर के पीछे पॉलिटिकल एंगिल खोजता है,समाज और अंधविश्वास का एंगिल बहुत बाद में आता है,लिहाजा इस पर कोई स्टोरी करना जरुरी नहीं समझा. बाद में विज्ञापन न मिलने और निर्मल बाबा का नाम सांसद इंदर सिंह नामधारी से जुड़ने के कारण स्टोरी करनी शुरु कर दी. न्यूज एक्सप्रेस और मुकेश कुमार को इस बात की पीड़ा लगातार बनी रही कि स्टोरी सबसे पहले उन्होंने की लेकिन उन्हें कोई क्रेडिट क्यों नहीं दे रहा ? शायद इसलिए भड़ास4मीडिया ने जब जनसत्ता में मेरा लेख छापा तो उसमें इस चैनल का नाम जोड़ दिया. साथ में ये स्पष्टीकरण देना भी जरुरी नहीं समझा कि इस लेख में वेबसाइट की तरफ से कुछ फेरबदल किए गए हैं. अगर मैंने लेख में गलत जानकारी दी थी तो इसका सबसे बेहतर तरीका था कि वेबसाइट अपनी तरफ से इसे लिखता,मेरे लिखे को खारिज करता,जनसत्ता को पत्र लिखकर शिकायत करता लेकिन नहीं. उसने अपने तरीके से मूल लेख को एडिट करके छापा. बहरहाल

भड़ास4मीडिया ने ऐसा क्यों किया, इस वेबसाइट को लगातार विजिट करनेवाले लोगों के लिए समझना आसान नहीं है. न्यूज एक्सप्रेस का विज्ञापन औऱ मुकेश कुमार की प्रशस्ति पहले लगातार आते रहे हैं और शायद आगे भी आएं. इस लेख में अलग से चैनल का नाम जोड़कर वेबसाइट ने अपने तरीके से ठीक ही किया. लेकिन ये सब करने से मोहल्लालाइव और अविनाश को क्या लाभ मिला, इसे समझने में मुझे थोड़ा सा वक्त लगा.

दुनिया की नजर में अविनाश दास और यशवंत सिंह दो अलग-अलग टापू पर बैठे मॉडरेटर हैं जहां से गुजरनेवाली हवा को एक-दूसरे से छूकर गुजरने की भी मनाही है. लेकिन मेल के जरिए यूनीकोड मटीरिअल का भेजा जाना साबित करता है कि अविनाश दास की उदारता कुछ दूसरी ही गली में जाकर खुलती है. जाहिर है ये अविनाश का बडप्पन नहीं बल्कि एक तरह की खीज और बाद में उसे पीआरगिरी की शक्ल में बदलने की कोशिश से ज्यादा नहीं थी. ये बात तब और स्पष्ट हो गई जब

फेसबुक पर शशिभूषण एक पीस लिखी और उसमें निर्मल बाबा के पर्दाफाश के लिए असली हकदार मोहल्लालाइव और हंस को दिया. मोहल्लालाइव को इसलिए कि उसने सबसे पहले निर्मल बाबा के सच को सामने लाने की कोशिश की थी. उसने अमेरिकी वेबसाइट पर छपी सामग्री का उल्था पेश किया था और हिन्दी समाज के बीच गर्माहट पैदा करने की कोशिश थी. हंस को क्रेडिट इसलिए दिया जाना चाहिए था क्योंकि सबसे पहले मुकेश कुमार ने वहां लेख लिखकर पर्दाफाश किया था. जाहिर है शशिभूषण ने मेरी जानकारी ही बढ़ाई थी लेकिन साथ में ये भी जतला दिया था कि उनका उद्देश्य निर्मल बाबा के विरोध के प्रसंग को क्रम से देखना नहीं था बल्कि मुकेश कुमार और मोहल्लालाइव का जो हक मारा जा रहा था, उसे जाहिर करना था. अगर ऐसा नहीं होता तो वे मार्च में छपे तहलका के उस लेख का भी जिक्र करते जिसका शीर्षक था- ये देश संसद से नहीं,निर्मल बाबा से चलता है..

अविनाश ने शशिभूषण की इस एफबी पोस्ट के नीचे कमेंट में सिर्फ विनीत कुमार लिखा जिसका मतलब था- विनीत कुमार,आप कहां सोए पड़े हैं,ये देखिए निर्मल बाबा के पर्दाफाश का असली सच. इसी क्रम में बात मुकेश कुमार तक आ गयी और एक सज्जन ने उनमें खास दिलचस्पी इसलिए दिखाई क्योंकि वो मुकेश कुमार के बारे में कुछ और ही जानते थे और उन्हीं के इलाके के थे. अविनाश ने तपाक से लिखा था- हां ये वही मुकेश कुमार हैं जिन्होंने सहारा में रहकर सहारा प्रणाम करने से मना कर दिया था. एक-दो और ऐसे कमेंट जिसमें हमें सलाह दी गई कि अगर हमने मुकेश कुमार के चैनल न्यूज एक्सप्रेस को देखा होता तो शायद उनके बारे में ऐसी निगेटिव राय नहीं रखते. हालांकि शशिभूषण की एफबी वॉल पर से मुकेश कुमार से जुड़ी सारी टिप्पणियां हटा दी गई हैं. मुकेश कुमार ने मौर्या टीवी में रहकर क्या किया है औऱ कैसे चैनल को नंबर वन बनाया है,ये अलग से बताने की जरुरत नहीं है. इस पर तहलका ने कवर स्टोरी ही की है. स्टोरी में स्पष्ट किया है कि केबल के साथ चैनल ने ऐसी सेटिंग की कि कुछ घंटे के लिए पटना में सिर्फ मौर्या टीवी ही आया और चैनल रातोंरात नंबर वन हो गया. बाद में इसकी क्या हालत हुई, कैसे बेतहाशा छंटनी का दौर शुरु हुआ,ये सब इंटरनेट पर मौजूद है.

इस तरह कहानी यहां आकर पहुंचती है कि भड़ास4मीडिया ने  मेरे लेख में न्यूज एक्सप्रेस का नाम जोड़कर संशोधन/ नमक का हक अदा किया तो अविनाश हमें कौन सा सच समझा रहे थे ? अविनाश और यशवंत में परस्पर विरोध होने जो कि जब-तब वर्चुअल स्पेस में जाहिर होता रहा है के वाबजूद एक धागा है जो इस पूरे धत्तकर्म से जुड़ती है और वो हैं मुकेश कुमार. मुकेश कुमार ने तो भड़ास4मीडिया को विज्ञापन देकर यशवंत सिंह को अपना मुरीद बना लिया लेकिन अविनाश को सहारा प्रणाम का विरोध याद रह गया और मौर्या टीवी का गंदा खेल नहीं, ये कैसे भूल गए ? क्या जो विज्ञापन नहीं दिखता है, उसके भी अपने लाभ होते हैं ?

वर्चुअल स्पेस पर क्रेडिट लेने की मारकाट उसी तरह से जारी है जिस तरह से स्टार न्यूज की स्ट्रैटजी से मार खाया हुआ इंडिया टीवी भी घसीट-घसीटकर एक्सक्लूसिव कहलाए जाने की बेचैनी से भोकार रहा है.

Sunday, 15 April 2012

बराबर के गुनाहगार है टीवी चैनल्स


निर्मलजीत सिंह नरुला, जो इन दिनों निर्मल बाबा के नाम से देश के 39 टीवी चैनलों पर काबिज हैं, चतरा, झारखंड से निर्वाचित लोकसभा सांसद इंदरसिंह नामधारी के साले हैं। निर्मल बाबा उर्फ निर्मलजीत सिंह ने इससे पहले झारखंड में ठेकेदारी की, ईंट भट्टा चलाया, कपड़े की दुकान खोली और जब सब जगह से हताश और विफल हो गए तो सब कुछ छोड़ कर दिल्ली चले आए। यहां आकर उन्होंने ‘समागम’ शुरू किया, जिसमें देश के हजारों लोग शामिल होते रहे हैं। वर्चुअल स्पेस यानी इंटरनेट पर निर्मल बाबा से जुड़ी इस तरह की खबरें पिछले एक महीने से चल रही थीं।
मीडिया से जुड़ी वेबसाइटें लगातार इस खबर की फॉलो-अप खबरें दे रही थीं। जबकि एकाध चैनलों को छोड़ दें तो देश के सभी प्रमुख राष्ट्रीय चैनलों पर लाखों रुपए लेकर निर्मल बाबा दरबार और समागम से जुड़े कार्यक्रम प्रसारित होते रहे। इन कार्यक्रमों में भोले श्रद्धालुओं को समस्याओं के टोटके सुझाए जाते थे। जहां तुक्का सही लगा, ‘बाबा’ उसे अदृश्य शक्ति की ‘किरपा’ बताते, जो उनके जरिए श्रद्धालु तक पहुंची! इस बीच इंडीजॉब्स डॉट हब पेजेज डॉट कॉम ने निर्मल बाबा के फ्रॉड होने का सवाल उठाया। उसे निर्मल दरबार की ओर से कानूनी नोटिस भेजा गया और सामग्री हटाने को कहा गया। अब वह पोस्ट इस वेबसाइट से हटा ली गई है। इसके बाद कई मीडिया वेबसाइटों को कानूनी नोटिस दिए जाने की बात प्रमुखता से आती रही। लेकिन किसी भी चैनल ने इससे संबंधित किसी भी तरह की खबर और निर्मल बाबा के विज्ञापन की शक्ल में कार्यक्रम दिखाए जाने को लेकर स्पष्टीकरण देना जरूरी नहीं समझा। टोटके जारी रहे और लंबे-चौड़े ‘कार्यक्रम’ से होने वाली भारी-भरकम कमाई भी।

11 अप्रैल को झारखंड से प्रकाशित दैनिक प्रभात खबर ने ‘‘कौन है निर्मल बाबा’’ शीर्षक से पहले पन्ने पर खबर छापी और फिर रोज उसका फॉलो-अप छापता रहा। हालांकि अखबार की इस खबर में ऐसा कुछ भी नहीं था, जिसे पहले सोशल वेबसाइट और फेसबुक पर शाया न किया गया हो। लेकिन सांसद इंदरसिंह नामधारी का वह वक्तव्य प्रकाशित किए जाने से उन खबरों की आधिकारिक पुष्टि हो गई, जिसमें निर्मलजीत सिंह के अतीत का हवाला भी था। सबसे पहले 12 अप्रैल की शाम स्टार न्यूज ने ‘‘कृपा या कारोबार’’ नाम से निर्मल बाबा के पाखंड पर खबर प्रसारित की। चैनल ने दावा किया कि वह इस खबर को लेकर पिछले एक महीने से तैयारी कर रहा है, लेकिन उसकी इस खबर में उन्हीं बातों का दोहराव था, जो सोशल मीडिया पर प्रकाशित होती आई थीं। यहां तक कि निर्मल बाबा की कमाई के जो ब्योरे दिए, वे समागम में शामिल होने वाले लोगों और उनकी फीस को लेकर अनुमान के आधार पर ही निकाले गए थे।

चैनल ने वह कार्यक्रम प्रसारित करने से पहले जो स्पष्टीकरण (डिस्क्लेमर) दिया, वह भी अपने आप में कम दिलचस्प नहीं था। बताया गया कि वह खुद भी निर्मल बाबा के कार्यक्रम को विज्ञापन की शक्ल में प्रसारित करता आया है, जिसे अगले महीने 12 मई से बंद कर देगा। किसी दूसरे विज्ञापन की तरह ही चैनल इसके लिए जिम्मेदार नहीं है। इस विज्ञापन की पूरी जिम्मेदारी निर्मल बाबा की संस्था निर्मल दरबार के ऊपर है। इसका मतलब है, चैनल निर्मल बाबा के खिलाफ खबर के बावजूद एक महीने तक पाखंड भरे विज्ञापन रूपी कार्यक्रमों को प्रसारित करता रहेगा। इस स्पष्टीकरण और आगे के प्रसारण को लेकर दो-तीन गंभीर सवाल उठते हैं।

पहली बात तो यह कि 12 अप्रैल को जब चैनल को पता चल जाता है कि निर्मल बाबा पाखंडी है और दुनिया भर में अंधविश्वास फैलाने का काम कर रहा है, फिर भी व्यावसायिक करार के चलते इसका प्रसारण करता रहेगा। क्या किसी चैनल को कुछेक लाख रुपए के नुकसान की बात पर देश के करोड़ों लोगों के बीच अगले एक महीने तक अंधविश्वास फैलाने की छूट दी जा सकती है, जिसे वह खुद विवाद के घेरे में मानता है। दूसरा, अगर निर्मल बाबा समागम के कार्यक्रम विज्ञापन हैं तो स्टार न्यूज ही क्यों, बाकी न्यूज चैनल भी उसे ‘‘कार्यक्रम’’ की शक्ल में क्यों दिखाते आए हैं? उसे कार्यक्रमों की सूची में क्यों शामिल किया जाता रहा है? क्या किसी दूसरे विज्ञापन के बारे में चैनलों पर कभी बार-बार बताया जाता है कि कौन विज्ञापन कब-कब प्रसारित होगा? चैनलों का इस कदर पल्ला झाड़ लेना कि चूंकि यह विज्ञापन है, इसलिए उनकी जिम्मेदारी नहीं है, क्या सही है? पैसे के दम पर विज्ञापन देकर कोई भी कुछ भी प्रसारित करवा सकता है? फिर आने वाले समय में राजनीतिक विज्ञापन और पेड न्यूज से किस तरह लड़ा जा सकेगा? क्या यह पिछवाड़े से पेड न्यूज का प्रवेश नहीं है, जो पैसा देकर वह सब प्रसारित करवा ले, जो विज्ञापनदाता और विज्ञापन पाने वाले के हित में है, मगर समाज के अहित में?

सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा गठित मीडिया मॉनिटरिंग सेल जब कभी बैठक करता है और चैनलों को स्कैन करके जो रिपोर्ट जारी करता है, उसके साथ विज्ञापन के निर्देश भी नत्थी करता है। क्या न्यूज चैनलों के लिए वह सब निरर्थक है? तीसरी, इन सबसे बड़ी बात यह है कि अगर ये विज्ञापन थे- जो थे ही- तो फिर टीआरपी चार्ट में उन्हें बाकायदा चैनल कंटेंट के रूप में क्यों शामिल किया जाता है? न्यूज 24, जिसने सबसे पहले निर्मल बाबा के विज्ञापन को कमाई का जरिया बनाया, जिसका एक भी कार्यक्रम (कालचक्र को छोड़ दें तो) टॉप 5 में नहीं रहा, पिछले दो महीने से निर्मल बाबा पर प्रसारित विज्ञापन इस सूची में शामिल रहा है? क्या इससे पहले कोई और विज्ञापन बतौर चैनल कंटेंट टीआरपी चार्ट में शामिल किया गया है और उसके दम पर चैनल की सेहत सुधारने की कवायद की गई है? गोरखधंधे का यह खेल क्या सिर्फ निर्मल बाबा और टीवी चैनलों तक सीमित है या फिर इसका विस्तार टीआरपी सिस्टम तक होता है?

निर्मल बाबा के इस विज्ञापन ने टीवी चैनलों के व्याकरण और सरकारी निर्देशों को किस तरह से तहस-नहस किया है, इसे कुछ उदाहरणों के जरिए बेहतर समझा जा सकता है। हिस्ट्री चैनल, जो कि अपने तर्कसंगत विश्लेषण, शोध और तथ्यपरक सामग्री के लिए दुनिया भर में मशहूर है, वहां भी निर्मल बाबा समागम के कार्यक्रम बिना किसी तर्क और स्पष्टीकरण के प्रसारित किए जा रहे हैं। सीएनएन आइबीएन चैनल, जो कि स्टिंग ऑपरेशन के मामले में अपने को बादशाह मानता रहा है, वहां भी निर्मल बाबा का विज्ञापन चलाने के पहले उनकी पृष्ठभूमि की कोई पड़ताल शायद नहीं की गई। आजतक ने सप्ताह के बीतते हुए सच को जानने-बताने का जरूर जतन किया, कुछ तार्किक लोगों से बात की, जिन्होंने निर्मल बाबा का उपहास किया। लेकिन निर्मल बाबा से की गई ‘एक्सक्लूसिव’ बातचीत काफी नरम थी। क्या यह अकारण है कि निर्मल बाबा ने बाकी हर चैनल को इंटरव्यू देने से इनकार कर दिया?
वैसे तो टीवी चैनलों, खासकर न्यूज चैनलों पर संधि-सुधा, लाल- किताब, स्काई-शॉपिंग के विज्ञापनों के जरिए सरकारी निर्देशों की धज्जियां सालों से उड़ाई जा रही हैं। रात के ग्यारह-बारह बजे उनमें सिर्फ विज्ञापन या पेड कंटेंट दिखाए जाते हैं, जबकि उन्हें लाइसेंस चौबीस घंटे न्यूज चैनल चलाने का मिला है। लेकिन निर्मल बाबा के जरिए यह मामला तो प्राइम टाइम तक पहुंच गया। सवाल है कि जब इन चैनलों के पास चौबीस घंटे न्यूज चलाने की सामग्री या क्षमता नहीं है, तो उन्हें चौबीस घंटे चैनल चलाने का लाइसेंस क्यों दिया जाए? दूसरे, क्या दिन में दो-तीन बार आधे-आधे घंटे के लिए लगातार ऐसे विज्ञापन प्रसारित करना केबल एक्ट के अनुसार सही है? गौर करने की बात है कि इस तरह के लंबे-चौड़े कार्यक्रम-रूपी विज्ञापनों में प्रसिद्ध अभिनेताओं का इस्तेमाल भी होता है, जो मासूम दर्शकों को विज्ञापन के ‘कार्यक्रम’ होने का छलावा पैदा करने में मदद करते हैं।
2011 में भ्रष्टाचार के खिलाफ जो तमाशे दिखाए गए और अण्णा के लाइव कवरेज से 37.5 की रिकॉर्डतोड़ टीआरपी मिली, उससे टीवी संपादकों का सुर अचानक बदला। शायद टीआरपी की इस सफलता के दम पर ही न्यूज चैनलों के हित में काम करने वाले बीइए और एनबीए जैसे संगठनों ने दावा किया कि इस देश को अण्णा की जरूरत है! अब निर्मल बाबा की टीआरपी अण्णा के उस रिकार्ड को तोड़ कर चालीस तक पहुंच गई है, तो इसका मतलब क्या यह होगा कि देश को लोगों को चूना लगाने वालों की जरूरत है? संभव है कि स्टार न्यूज ने निर्मल बाबा के खिलाफ जो खबर प्रसारित की है, उसकी टीआरपी समागम से भी ज्यादा मिले। यह भी संभव है कि आजतक पर प्रसारित निर्मल बाबा के इंटरव्यू को सबसे ज्यादा देखा गया हो। ऐसा भी हो सकता है कि चैनल अब एक दूसरे की देखादेखी निर्मल बाबा के खिलाफ शायद ज्यादा खबरें प्रसारित करें, क्योंकि सहयोग न करने वाले चैनल को बाबा के भारी – भरकम विज्ञापन मिलने बंद हो जाएंगे। अभी तो बाबा के कारनामों के बारे में जानकारी बहुत प्राथमिक स्तर पर है। तब और तफसील से सूचनाएं आने लगेंगी। लेकिन, क्या एक-एक करके दर्जनों चैनल निर्मल बाबा का असली चेहरा यानी धर्म के नाम पर अंधविश्वास फैलाने वाला पाखंड साबित कर देते हैं तो इससे पूरा सच सामने आ जाएगा? दरअसल, यह तब तक आधा सच रहेगा, जब तक यह बात सामने नहीं आती कि इस करोड़ों (बाबा ने खुद यह राशि करीब 240 करोड़ रुपए सालाना बताई है) की कमाई से टीवी चैनलों की झोली में कितने करोड़ रुपए गए?

तेज-तर्रार संपादकों के आगे ऐसी कौन-सी मजबूरी थी कि उन्होंने अपनी साख ताक पर रख कर इसे प्रसारित किया? क्या कोई संपादक हमारे टीवी चैनलों में ऐसा नहीं, जिसने जनता को गुमराह करने वाले कार्यक्रम-रूपी विज्ञापनों के खिलाफ आवाज उठाई हो? क्या टीवी चैनलों पर सचमुच संपादक हैं? यह सवाल इसलिए जरूरी है, क्योंकि पेड न्यूज मामले में हमने देखा कि 2011 में चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश के विधायक उमलेश यादव की सदस्यता रद्द कर दी, लेकिन जिन दो अखबारों ने पैसे लेकर खबरें छापीं, वे अब भी सीना ताने खड़े हैं। निर्मल बाबा के खिलाफ न्यूज चैनलों द्वारा लगातार खबरें प्रसारित किए जाने से संभव है कि शायद उन पर भी कार्रवाई हो। लेकिन प्रसारित करने वाले 39 चैनल, जो कि इस अनाचार में बराबर के भागीदार हैं, उनका क्या होगा? भविष्य में और ‘निर्मल’ बाबाओं के पैदा होने न होने का मुद्दा भी इसी से जुड़ा है।


 मूलतः प्रकाशित- जनसत्ता, 15 अप्रैल 2012