Saturday, 2 May 2009

मतदाता को सिर्फ ऑडिएंस मत समझिए


नया ज्ञानोदय में प्रकाशित लेख- टेलीविजन,राजनीतिक विज्ञापन और छवि-निर्माण का लोकतंत्र की अंतिम किस्त

आर्मन्ड ने राजनीतिक विज्ञापनों की चर्चा करते हुए इसे “टोटल कम्युनिकेशन” यानी सम्पूर्ण संचार कहा है।( आर्मन्ड मैटेलार्टः1991,पेज न-187,एडवर्टाइजिंग इंटरनेशनलः दि प्राइवेटाइजेशन ऑफ पब्लिक स्पेस,राउट्लेज,11 न्यू फीटर लेन,लंदन EC4P 4EE)। सम्पूर्ण संचार का अर्थ किसी प्रत्याशी या पार्टी की तमाम गतिविधियों औऱ छवियों को मतदाता के सामने लाने से नहीं है। यह काम तो समाचार चैनल कर ही देते हैं, फिर राजनीतिक विज्ञापनों की क्या अनिवार्यता रह जाती है। संपूर्ण संचार का आशय पार्टी या प्रत्याशी की उस छवि से है जिसे कि वह स्थापित करना चाहते हैं। राजनीतिक विज्ञापनों का प्रयोग इसी छवि को स्थापित करने के लिए किया जाता है जिसे कि “इमेज प्रोजेक्शन” कहा जाता है।( डैन निम्मोः1970,दि पॉलिटिकल पर्सुएडर्स,पेज न-129 एंगलवुड्स क्लिफ्स,एन.जे. प्रिंटिस हॉल)। संपूर्ण संचार के अन्तर्गत किसी प्रत्याशी या पार्टी के बारे में वही सब कुछ प्रसारित किया जाता है जिसे कि मार्केटिंग या विज्ञापन एजेंसी तय करती है।
2009 के लोकसभा चुनाव के पहले भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस की अलग-अलग छवियां रही है। ये छवियां मतदाता के दिमाग में एक हद तक स्थिर हो चुकी है. पार्टी कार्यकर्ता के स्तर पर यह आसान काम नहीं है कि मतदाता के बीच अब तक बनी उन छवियों में से अपनी नकारात्मक छवि को ध्वस्त कर दे लेकिन सम्पूर्ण संचार के फार्मूले पर काम करते हुए राजनीतिक विज्ञापनों की जिम्मेवारी है कि वे इस चुनाव के लिए उसे ध्वस्त कर एक निश्चित छवि स्थापित करें।
कांग्रेस के विज्ञापनों में बार-बार मिसाइल,मेट्रो ट्रेन,फ्लाइओवर,खेतों में ट्रैक्टर, तकनीकी क्रांति, निर्माण, आविष्कार, गांव में लैबटॉप पर काम करती लड़की, टेलीफोन से बात करते हुए लिए ग्रामीणों की तस्वीरें और विजुअल्स दिखाई देते हैं। ये विजुअल्स “तिनक-तिनक तिन हाथ” और “कांग्रेस की जय हो” वाले विज्ञापनों में समान रुप से दिखाई देते हैं। इन दोनों विज्ञापनों में कांग्रेस की छवि एक ऐसी पार्टी के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की गयी है जिसके यहां विकास की एक पूरी परम्परा रही है। तस्वीरों में कस्तूरबा गांधी, नेहरु,लालबहादुर शास्त्री,राजीव गांधी से लेकर मनमोहन सिंह तक मौजूद हैं और इनके बीच से लगातार विकसित होते हुए भारत की तस्वीर गुजरती चली जाती है। देश की आजादी को जब मतदाता याद करे तो उसे कांग्रेस का योगदान साफ दिखाई दे। विज्ञापन की शब्दावली में यह “इमोशल अपील” पर आधारित विज्ञापन है। आर्थिक, तकनीकी और संसाधन आधारित विकास और बदलते भारत की तस्वीर दो ऐसे संदर्भ हैं जिसके जरिए कांग्रेस देश के युवाओं को जोड़ना चाहता है। वैसे भी 25 करोड़ की आबादी का यह युवा देश की सभी पार्टियों के लिए टारगेट-वोटर हैं। यही कारण है कि कभी युवाओं के प्रतीक बने राजीव गांधी और अब राहुल गांधी ब्रांड-इमेज या ब्रांड चिन्ह के तौर पर दिखाये जाते हैं। दोनों विज्ञापनों में विजुअल्स के अलावे शब्द-रुप में भी इन दोनों के नाम शामिल हैं। तस्वीर नए भारत की बनी थी/राजीवजी के हाथ/टेलीफोन का जाल बिछाया/हुई दिल से दिल की बात/कम्प्यूटर की क्रांति लाए/लिखा नया इतिहास/धिनक धिक हाथ/( न्यूज 24: मार्च 21,8:41 बजे रात)।
जय हो,विजय हो/आओ नौजवानों आज राहुलजी के संग/ आओ जीत के दिखाएं, बोलो कांग्रेस की जय।( स्टार न्यूजः मार्च 04,8:21 बजे रात)।
राजनीतिक विज्ञापनों के जरिए सम्पूर्ण संचार के इसी फार्मूले को बीजेपी ने थोड़ा अलग तरीके से इस्तेमाल किया है। कांग्रेस की तरह इसे भी विज्ञापन के माध्यम से देश के युवाओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करनी है इसलिए ये एक शंखनाद है/पुकारता प्रभात है/ये देश तेरा स्वप्न है/पहचान है अभिमान है/ जैसी पंक्तियों का प्रयोग करते हुए अपनी छवि एक ऐसी पार्टी के रुप में बनाना चाहती है जो कि जोश और कुछ नया करने की इच्छा से लवरेज है। इस क्रम में जिन विजुअल्स का इस्तेमाल किया गया है वह कांग्रेस की एप्रोच से बिल्कुल अलग है। कांग्रेस के विज्ञापन में जो पंक्तियों के शब्द हैं,उसी के अनुरुप विजुअल्स दिखाए गए हैं जबकि भाजपा विजुअल्स का प्रयोग,पंक्तियों से अलग अर्थ पैदा करने के लिए करती है। स्वाभिमान औऱ जोश भरी पंक्तियों को दोहराते हुए एक युवा है जिसके पार्श्व में विजुअल्स चल रहे हैं- सेंसेक्स गिर रहा है, होटल ताज के आगे लोग लाचार दिखाई दे रहे हैं,शेयर मार्केट की बिल्डिंग के आगे लोग कटोरा लेकर खड़े हैं।(इंडिया टीवीः 30 मार्च, 8:14 बजे रात)। इसमें इमोशनल के बजाए “लॉजिकल अपील” का इस्तेमाल किया गया है। इस विज्ञापन में टेलीविजन का ज्यादा बेहतर तरीके से प्रयोग हुआ है और बीजेपी का एक ही विज्ञापन के माध्यम से अपने पक्ष में साकारात्मक और कांग्रेस के विरोध में नाकारात्मक विज्ञापन कर पाने में सफल हो जाता है। यहां सकारात्मक विज्ञापन की तुलना में नाकारात्मक विज्ञापन ज्यादा बेहतर ढंग से संप्रेषित हो पाया है। उत्पाद आधारित विज्ञापन की तुलना में राजनीतिक विज्ञापनों पर विचार करें तो यह चुनाव के लिए ज्यादा असरदार साबित होते हैं। यहां पर रॉबर्ट्स की मान्यता काफी हद तक सही जान पड़ती है कि नकारात्मक विज्ञापन, साकारात्मक विज्ञापन की तुलना में ज्यादा सूचनात्मक होते हैं। रॉबर्ट्स का तो यहां तक मानना है कि नकारात्मक विज्ञापन मतदान को सफल बनाने में भी योगदान करते हैं।( रॉबर्ट्स एम.:1992 दि फ्ल्युडिटी ऑफ एटीट्यूड्स टूवर्ड्स पॉलिटिकल एडविर्टाइजिंग, पेज न- 134-35,जीए,यूनिवर्सिटी ऑफ गार्जिया, ग्रैडी कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन)।
मौजूदा चुनाव एवं लोकतंत्र की राजनीति में राजनीति विज्ञापनों और टेलीविजन की अनिवार्यता को कई स्तरों पर साबित किया जा सकता है। राजनीतिक पार्टियों एवं प्रत्याशियों के लिए यह मन-मुताबिक छवि प्रसारित करने का आसान माध्यम है तो वही मतदाता के पक्ष में इस बात की सुविधा मिल जाती है कि वह घर बैठे राजनीतिक पार्टियों की रणनीति को समझ पाता है। इन सबके वाबजूद विज्ञापन समीक्षकों ने इस पर सवाल उठाते हुए इसे नागरिकों के लिए फैंटेसिया मात्र कहा है।( विलियम लीज, क्लीन, जैलीः 1990,सोशल कम्युनिकेशन इन एडवर्टाइजिंगः पर्सन,प्रोडक्ट्स एंड इमेज ऑफ वेल विइंग, पेज नं-309,राउट्लेज,11 न्यू फीटर लेन,लंदन EC4P 4EE)। नागरिकों के लिए फैंटेसिया इस अर्थ में है कि रंगों,ध्वनियों,संगीत और तस्वीरों के दम पर जिस लोकतंत्र को टेलीविजन स्क्रीन पर रचने की कोशिश की जाती है वह वस्तुस्थिति से बिल्कुल अलग होती है। इस बात की समझ के लिए हमें कोई सामाजिक सर्वे की जरुरत नहीं होती,सुविधा के लिए इसे भी टेलीविजन के माध्यम से समझा जा सकता है। हम विज्ञापनों से हटकर जैसे ही राजनीतिक-सामाजिक खबरों की तरफ बढ़ते हैं जो हमें बिल्कुल ही अलग तस्वीर दिखाई देती है। ये तस्वीरें विज्ञापन में बनी राजनीतिक पार्टी की छवियों को झुठला जाती है।
विज्ञापन विशेषज्ञों ने राजनीतिक विज्ञापन की कमजोरियों को जिस रुप में रेखांकित किया है,यह मतदाता के साथ-साथ राजनीतिक पार्टियों के लिए भी फैंटेसिया है। उनका सवाल है कि क्या पैसा मतदान को खरीद सकता है, इसे और स्पष्ट करते हुए कहें तो क्या पैसे के माध्यम से वैसे विशेषज्ञ जुटाए जा सकते हैं जो कि प्रत्याशी के लिए अपने पक्ष में मतदान की गारंटी दे सके।( डायमंड,एडविन,स्टीफनः1984,दि स्पॉटः दि राइज ऑफ पॉलिटिकल एडवर्टाइजिंग ऑन टेलीविजन, पेज नं- 78 कैम्ब्रिज,मासःएमआइटी प्रेस)। इससे ठीक पहले वाले लोकसभा चुनाव के संदर्भ में हम देख चुके हैं कि इंडिया शाइनिंग के लाख जोर होने के वाबजूद भी मतदाताओं के चेहरे पर की झुर्रियां कम नहीं हो पायी । दूसरी तरफ मशरुम की तर्ज पर करोड़ों रुपये खर्च करके बनाए और प्रसारित किए जानेवाले विज्ञापन इस विज्ञापन के बावजूद परिणाम के स्तर पर बीजेपी बुरी तरह पिट गयी।
सच्चाई इस बात में है कि राजनीतिक विज्ञापनों और टेलीविजन द्वारा मनोरंजन,संगीत और विजुअल्स के दम पर प्रत्याशी की छवि तो गढ़ी जा सकती है,इससे दर्शक के स्तर पर मतदाता को रिझाया जा सकता है लेकिन इससे दर्शकों का मनोरंजन भले ही हो जाए लेकिन जब तक उसकी डिकोडिंग मतदाता के स्तर पर नहीं हो जाती,तब तक विज्ञापन औऱ टेलीविजन के बूते चुनाव जीतने की कोई भी गारंटी नहीं दे सकता। टेलीविजन के जरिए छवि निर्माण करके पॉलिटिकल मार्केटिंग की जा सकती है किन्तु यह राजनीति की अधूरी प्रक्रिया है। छवि निर्माण के लोकतंत्र का विस्तार जब तक लोकतंत्र की राजनीति के स्तर पर नहीं हो जाता,तब तक राजनीतिक विज्ञापन रचनात्मकता औऱ मनोरंजन के स्तर पर बेहतर होते हुए भी एक दर्शक को मतदाता में नहीं बदल सकता है।

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