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Monday, 16 April 2012

ये किस घटिया खेल में शामिल हैं मोहल्लालाइव के अविनाश ?

सुबह उठकर जब मैंने वेबसाइट खंगालने शुरु किए तो देखा जनसत्ता के जिस लेख "पेड न्यूज के पिछवाडे" की पीडीएफ मोहल्लालाइव को भेजी थी,वो लेख भड़ास4मीडिया पर छपा है. उस लेख में इस बात का कहीं जिक्र नहीं था कि ये पहले जनसत्ता में छप चुका है. लिहाजा सबसे पहले मैंने भड़ास4मीडिया के कमेंट बॉक्स में लिखा- सर,ये लेख कल जनसत्ता में छप चुका है और इस बात का जिक्र किया जाना जरुरी है. थोड़ी देर बाद वेबसाइट ने इसे शामिल कर लिया.

जीमेल इन्बॉक्स देखा तो उसमें अविनाश के मेल थे. लिखा था- चूंकि यह अभियान भड़ास ने चलाया है,वहां ये छपे तो ज्यादा सही रहेगा. रात में ब्रॉडबैंड न चलने की स्थिति में मैंने ये मेल सरसरी तौर पर मोबाईल से देखा था लेकिन लैपटॉप से पूरा खोलकर देखने पर पता चला कि यूनीकोड में कन्वर्ट करने के बाद अविनाश ने वो लेख भड़ास4मीडिया के मॉडरेटर यशवंत सिंह को भेजा है. मुझे अटपटा लगा और साथ में बेतुका भी. जब मैंने लेख मोहल्लालाइव के लिए भेजा था तो उसे भड़ास4मीडिया को भेजने की क्या जरुरत थी ? अगर अविनाश को ये लेख मोहल्लालाइव पर नहीं छापनी थी तो उसे इग्नोर करने या फिर मना करने के कई बहाने हो सकते थे. ये मॉडरेटर का अपना विवेक और निर्णय है कि वो अपनी वेबसाइट पर क्या छापे,क्या नहीं. जैसा कि वो पहले से करते आए हैं. नहीं छापने की स्थिति में मेरे सहित दूसरे लोगों को भी वजह बताई है कि चूंकि ये लेख पहले कहीं छप चुका है, हम इसे मोहल्लालाइव पर नहीं छाप सकते. ये अलग बात है कि कई ऐसे लेख जो उन्हें जरुरी लगा,वर्चुअल स्पेस की कब्र से खोदकर निकालकर छापते रहे हैं. खैर,

मोहल्लालाइव या किसी भी दूसरी वेबसाइट के लिए भेजा गया लेख वहां न छपने की स्थिति में कहां छपेगा,ये तय करने का अधिकार उस वेबसाइट के मॉडरेटर को है या फिर खुद लेखक को,ये अविनाश जैसे सधे मॉडरेटर से बेहतर भला कौन बता सकता है ? उन्होंने किस समझदारी से ये लेख भड़ास4मीडिया को भेज दिया,ये अभी तक मेरी समझ के बाहर है. अगर उनके तर्क के हिसाब से भी समझने की कोशिश करें कि इस लेख में भड़ास4मीडिया का जिक्र है तो वहां छपनी चाहिए. इसमें सीधा सा सवाल है कि लेख में मीडिया दरबार डॉट कॉम का भी तो जिक्र था, फिर उसे क्यों नहीं भेजा. जब इस लेख के जरिए प्रचार-प्रसार( उनसे लिया उधार के शब्द) ही करना था तो ये मौका मीडिया दरबार को क्यों न दिया गया ? अविनाश ऐसा करके आखिर साबित क्या करना चाहते हैं ? कहीं भड़ास4मीडिया के मॉडरेटर को ये एहसास कराना तो नहीं कि विनीत कुमार की इच्छा थी कि ये लेख इस वेबसाइट पर छपे और चूंकि पिछले चार सालों से मॉडरेटर यशवंत सिंह से सीधे बात नहीं की है तो अविनाश दास के जरिए लेख छपवाने की कोशिश की ? अविनाश को क्या ऐसा करने का हक है कि वो इस तरह की अटकलें और आकलन लगाने की छूट उस वेबसाइट को दे जहां पिछले चार सालों से लेखक की कोई भी पोस्ट नहीं छपी है.

ये वही अविनाश हैं जिन्होंने आज से चार साल पहले मोहल्ला( तब वो ब्लॉग भर था) पर मेरी पोस्ट ये कहते हुए छापने से मना कर दिया था कि जो भड़ास पर छपता है,हम उसे यहां नहीं छापते. आज आखिर ऐसा क्या हो गया कि चार साल से जो लेखक सिर्फ मोहल्ला औऱ मोहल्लालाइव के लिए लिखता आया है, उसका लेख भड़ास4मीडिया को यूनिकोड में कन्वर्ट करके भेजा गया ? ये बात भड़ास4मीडिया पर छपे लेख और किए गए परिवर्तन पर ध्यान देने पर आसानी से समझ आ जाता है.

दरअसल लेख में मैंने लिखा था कि सबसे पहले स्टार न्यूज ने निर्मल बाबा के विरोध में स्टोरी चलायी जबकि अविनाश को इस बात से असहमति थी. उनके अनुसार न्यूज एक्सप्रेस ये काम पहले से करता आया है. न्यूज एक्सप्रेस के कुछ प्रोग्राम कार्टून की शक्ल में हमने पहले भी देखे थे. उड़ती-उड़ती ये भी खबर आयी कि चूंकि न्यूज एक्सप्रेस को निर्मल बाबा ने विज्ञापन देने लायक नहीं समझा तो आखिर में चैनल के मुखिया मुकेश कुमार झंड़े लेकर खड़े हो गए. थर्ड आइ ऑफ निर्मल बाबा पिछले ढाई-तीन महीने से आ रहा है, जाहिर है मुकेश कुमार इस कार्यक्रम से गुजरे होंगे.लेकिन ये चैनल हर खबर के पीछे पॉलिटिकल एंगिल खोजता है,समाज और अंधविश्वास का एंगिल बहुत बाद में आता है,लिहाजा इस पर कोई स्टोरी करना जरुरी नहीं समझा. बाद में विज्ञापन न मिलने और निर्मल बाबा का नाम सांसद इंदर सिंह नामधारी से जुड़ने के कारण स्टोरी करनी शुरु कर दी. न्यूज एक्सप्रेस और मुकेश कुमार को इस बात की पीड़ा लगातार बनी रही कि स्टोरी सबसे पहले उन्होंने की लेकिन उन्हें कोई क्रेडिट क्यों नहीं दे रहा ? शायद इसलिए भड़ास4मीडिया ने जब जनसत्ता में मेरा लेख छापा तो उसमें इस चैनल का नाम जोड़ दिया. साथ में ये स्पष्टीकरण देना भी जरुरी नहीं समझा कि इस लेख में वेबसाइट की तरफ से कुछ फेरबदल किए गए हैं. अगर मैंने लेख में गलत जानकारी दी थी तो इसका सबसे बेहतर तरीका था कि वेबसाइट अपनी तरफ से इसे लिखता,मेरे लिखे को खारिज करता,जनसत्ता को पत्र लिखकर शिकायत करता लेकिन नहीं. उसने अपने तरीके से मूल लेख को एडिट करके छापा. बहरहाल

भड़ास4मीडिया ने ऐसा क्यों किया, इस वेबसाइट को लगातार विजिट करनेवाले लोगों के लिए समझना आसान नहीं है. न्यूज एक्सप्रेस का विज्ञापन औऱ मुकेश कुमार की प्रशस्ति पहले लगातार आते रहे हैं और शायद आगे भी आएं. इस लेख में अलग से चैनल का नाम जोड़कर वेबसाइट ने अपने तरीके से ठीक ही किया. लेकिन ये सब करने से मोहल्लालाइव और अविनाश को क्या लाभ मिला, इसे समझने में मुझे थोड़ा सा वक्त लगा.

दुनिया की नजर में अविनाश दास और यशवंत सिंह दो अलग-अलग टापू पर बैठे मॉडरेटर हैं जहां से गुजरनेवाली हवा को एक-दूसरे से छूकर गुजरने की भी मनाही है. लेकिन मेल के जरिए यूनीकोड मटीरिअल का भेजा जाना साबित करता है कि अविनाश दास की उदारता कुछ दूसरी ही गली में जाकर खुलती है. जाहिर है ये अविनाश का बडप्पन नहीं बल्कि एक तरह की खीज और बाद में उसे पीआरगिरी की शक्ल में बदलने की कोशिश से ज्यादा नहीं थी. ये बात तब और स्पष्ट हो गई जब

फेसबुक पर शशिभूषण एक पीस लिखी और उसमें निर्मल बाबा के पर्दाफाश के लिए असली हकदार मोहल्लालाइव और हंस को दिया. मोहल्लालाइव को इसलिए कि उसने सबसे पहले निर्मल बाबा के सच को सामने लाने की कोशिश की थी. उसने अमेरिकी वेबसाइट पर छपी सामग्री का उल्था पेश किया था और हिन्दी समाज के बीच गर्माहट पैदा करने की कोशिश थी. हंस को क्रेडिट इसलिए दिया जाना चाहिए था क्योंकि सबसे पहले मुकेश कुमार ने वहां लेख लिखकर पर्दाफाश किया था. जाहिर है शशिभूषण ने मेरी जानकारी ही बढ़ाई थी लेकिन साथ में ये भी जतला दिया था कि उनका उद्देश्य निर्मल बाबा के विरोध के प्रसंग को क्रम से देखना नहीं था बल्कि मुकेश कुमार और मोहल्लालाइव का जो हक मारा जा रहा था, उसे जाहिर करना था. अगर ऐसा नहीं होता तो वे मार्च में छपे तहलका के उस लेख का भी जिक्र करते जिसका शीर्षक था- ये देश संसद से नहीं,निर्मल बाबा से चलता है..

अविनाश ने शशिभूषण की इस एफबी पोस्ट के नीचे कमेंट में सिर्फ विनीत कुमार लिखा जिसका मतलब था- विनीत कुमार,आप कहां सोए पड़े हैं,ये देखिए निर्मल बाबा के पर्दाफाश का असली सच. इसी क्रम में बात मुकेश कुमार तक आ गयी और एक सज्जन ने उनमें खास दिलचस्पी इसलिए दिखाई क्योंकि वो मुकेश कुमार के बारे में कुछ और ही जानते थे और उन्हीं के इलाके के थे. अविनाश ने तपाक से लिखा था- हां ये वही मुकेश कुमार हैं जिन्होंने सहारा में रहकर सहारा प्रणाम करने से मना कर दिया था. एक-दो और ऐसे कमेंट जिसमें हमें सलाह दी गई कि अगर हमने मुकेश कुमार के चैनल न्यूज एक्सप्रेस को देखा होता तो शायद उनके बारे में ऐसी निगेटिव राय नहीं रखते. हालांकि शशिभूषण की एफबी वॉल पर से मुकेश कुमार से जुड़ी सारी टिप्पणियां हटा दी गई हैं. मुकेश कुमार ने मौर्या टीवी में रहकर क्या किया है औऱ कैसे चैनल को नंबर वन बनाया है,ये अलग से बताने की जरुरत नहीं है. इस पर तहलका ने कवर स्टोरी ही की है. स्टोरी में स्पष्ट किया है कि केबल के साथ चैनल ने ऐसी सेटिंग की कि कुछ घंटे के लिए पटना में सिर्फ मौर्या टीवी ही आया और चैनल रातोंरात नंबर वन हो गया. बाद में इसकी क्या हालत हुई, कैसे बेतहाशा छंटनी का दौर शुरु हुआ,ये सब इंटरनेट पर मौजूद है.

इस तरह कहानी यहां आकर पहुंचती है कि भड़ास4मीडिया ने  मेरे लेख में न्यूज एक्सप्रेस का नाम जोड़कर संशोधन/ नमक का हक अदा किया तो अविनाश हमें कौन सा सच समझा रहे थे ? अविनाश और यशवंत में परस्पर विरोध होने जो कि जब-तब वर्चुअल स्पेस में जाहिर होता रहा है के वाबजूद एक धागा है जो इस पूरे धत्तकर्म से जुड़ती है और वो हैं मुकेश कुमार. मुकेश कुमार ने तो भड़ास4मीडिया को विज्ञापन देकर यशवंत सिंह को अपना मुरीद बना लिया लेकिन अविनाश को सहारा प्रणाम का विरोध याद रह गया और मौर्या टीवी का गंदा खेल नहीं, ये कैसे भूल गए ? क्या जो विज्ञापन नहीं दिखता है, उसके भी अपने लाभ होते हैं ?

वर्चुअल स्पेस पर क्रेडिट लेने की मारकाट उसी तरह से जारी है जिस तरह से स्टार न्यूज की स्ट्रैटजी से मार खाया हुआ इंडिया टीवी भी घसीट-घसीटकर एक्सक्लूसिव कहलाए जाने की बेचैनी से भोकार रहा है.

Friday, 17 July 2009

अब सच का सामना पर लट्टू हैं न्यूज चैनल्स

क्या इंसान की जिंदगी में सेक्स,शारीरिक संबंध और स्त्री-पुरुष के बीच होनेवाली गतिविधियां और उस बीच महसूस की जानेवाली भावनाएं ही जीवन के सबसे बड़े सच हैं। क्या जिंदगी का सच यही जाकर खत्म हो जाता है? न्यूज24 के एंकर अखिलेश आनंद ने चैनल के विशेष कार्यक्रम ये सच नहीं आसान में पिछले सप्ताह स्टार प्लस पर शुरु हुई रियलिटी शो के एंकर राजीव खंडेलवाल से जो सवाल किए उसके मिलते जुलते भाव यही है कि क्या ये शो सच के सवाल को उसकी सीमा को बहुत ही सीमित करके नहीं देख रहा? क्या जीवन में इन सबके अलावे कोई दूसरा बड़ा सच नहीं हो सकता। हालांकि इस मामले में राजीव खंडलेवाल की अपनी समझ है कि इंसान के जीवन में यही वो जरुरी पहलू हैं जो कि उसके लिए सबसे ज्यादा मायने रखते हैं। जाहिर तौर पर वो पहलू जिसे कि वो आसानी से सार्वजनिक नहीं करता लेकिन दूसरी तरफ जब वो इन रिश्तों के बीच घुलता रहता है,कैंसर की तरह उसके बीच फैलने लगता है तो वो उसे लोगों के बीच बांटना चाहता है,शेयर करना चाहता है। न्यूज24 पर आकर राजीव खंडेलवाल ने ये स्वीकार किया है कि आगे भी जाकर कार्यक्रम में इसी तरह के सवाल पूछे जाएंगे। सवलों के मिजाज को लेकर बहुत ज्यादा बदलाव की गुंजाइश नहीं है। मोटे तौर पर सच का सामना के जरिए हम ये निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि निजी जीवन और बहुत ही पर्सनल फीलिंग के मौके ही इंसानी जीवन का सबसे बड़ा सच होता है। अब हम इस बात पर बहस कर सकते हैं कि क्या ऐसा मानना या होना सही है और अगर है तो इसके पहले और बाद के,आजू-बाजू के जो सच हैं उसका क्या होगा?

स्टार प्लस पर शुरु होनेवाले कार्यक्रम सच का सामना के जब सिर्फ प्रोमो ही दिखाए गए तभी से न्यूज चैनलों ने अटकलें लगानी शुरु कर दी कि ये शो जबरदस्त तरीके से कई विवादों को जन्म देगा। इसके ठीक पहली वाली पोस्ट में हमने लिखा भी कि इन विवादों को लेकर चैनल के अलग-अलग डेस्क को कई मसाले मिलेंगे। कार्यक्रम के उस प्रोमो से जिसमें कि कांबली की ओर से सचिन तेंदुलकर पर कुछ कमेंट किए गए,जिसमें ये लगातार दिखाया जाता रहा( जो कि अब भी जारी है)कांबली का मानना है कि अगर तेंदुलकर ने मेरा साथ दिया होता तो करियर लाइफ लंबी होती,उसके बाद से ही न्यूज चैनलों ने कांबली और तेंदुलकर पर स्पेशल स्टोरी बनानी शुरु कर दी। कुल मिलाकर कार्यक्रम शुरु होने से पहले से ही उसकी प्रकृति और तासीर को न्यूज चैनलों ने फिक्स कर दिया। इस आधार पर कुछेक चैनलों ने इस बात की आलोचना भी कि ये शो लोगों के बीच के आपसी रिश्तों में खटास पैदा करने का काम करेगा। कांबली जैसे लोगों पर कमेंट करने शुरु किए कि एक करोड़ के चक्कर में दोस्ती जैसे रिश्ते को ताक पर रख आए। यहां तक चैनलों ने सच का सामना के लिए राजी नहीं होनेवाले जैकी श्राफ और शेखर सुमन जैसे शख्सियतों को ज्यादा महान और बेहतर बताने की कोशिशें करते रहे।

लेकिन ऑडिएंस के बीच सच का सामना के जबरदस्त ढंग से सराहे जाने के बाद न्यूज चैनलों ने दो-तीन दिन के भीतर अपने पैंतरे बदल लिए। उन्हें अब ये समझ आने लगा है कि इस शो का एकमात्र एंगिल विवाद नहीं हो सकता है,इसके भीतर से कई चीजें निकलकर आने की भरपूर संभावना है.इस लिहाज से ये मनोरंजन चैनलों पर जारी मौजूदा किसी भी सीरियल और रियलिटी शो से ज्यादा दुधारु शो है जिस पर कई तरीके से कार्यक्रम बनाए जा सकते हैं,इसे कई स्टोरी आइडिया में फिट करके आधे घंटे का कार्यक्रम बहुत ही मजे से बनाया जा सकता है। शायद यही वजह है कि कल एनडीटीवी इंडिया से लेकर इंडिया टीवी तक ने इस शो के बहाने सच के फ्लेवर को अपने-अपने ढंग से खोजने की कोशिश की बल्कि न्यूज24 के अखिलेश आनंद ने तो यहां तक कहा कि जिस समाज में झूठ का बोलबाला है,ऐसे में इस शो ने काफी हद तक हलचल तो जरुर मचा दी है। लंबे समय तक इसके विरोध में कुछ न दिखाने और कहने की स्थिति में न्यूज चैनल अब इस कार्यक्रम की चिरौरी करने में जुट गए हैं। संभव है हर ब्रेक के बाद इस शो का विज्ञापन भी एंकर को ऐसा करने के लिए प्रेरित करता हो। बहरहाल,

न्यूज24 ने ये सच नहीं आसान नाम से जो स्पेशल प्रोग्राम दिखाया उसमें बाकी बातों की तफसील में न जाएं तो शो में भाग लेने आयी मनीषा,सीनियर जर्नलिस्ट की बात सबसे ज्यादा दमदार और ठहरकर सोचनेवाली लगी। मनीषा का साफ मानना है कि स्त्री का सच पुरुषों के सच से अलग होता है। द्रौपदी ने भी सच कहा था कि अंधे के बच्चे तो अंधे ही होते हैं,सीता ने भी कहा था कि रावण के साथ उसके कोई संबंध नहीं है लेकिन आप समझ सकते हैं कि उसे किस रुप में लिया गया। वही कृष्ण ने भी दुर्योधन से झूठ बोला,राम ने भी झूठ बोला और उसे अलग तरीके से लिया गया। इसलिए हमें इस शो में भी एक स्त्री के बोले गए सच और पुरुष के बोले गए सच में फर्क करना होगा। जाहिर है स्त्री अपने सच को उतनी सहजता से बोलने की स्थिति में नहीं होती। सच का सामना का पक्ष लेते हुए एंकर अखिलेश आनंद ने गांधीजी के सात सत्य के प्रयोग की चर्चा की जो कि संदर्भ के अभाव में बेतुका ही लगा। सच का सामना के बहाने सच पर बात करते हुए अधिकांश चैनल के एंकर ये समझ ही नहीं पा रहे हैं कि जिस सच को सामने लाने की बात ये शो कर रहा है वो जीवन के बाकी के सच से अलग है। इसलिए सच के जो अलग-अलग एडीशन(संस्करण) है उसके साथ इस शो में जबाब के तौर पर पेश किए गए सच से घालमेल करना स्थितियों का सरलीकरण भर है। राजीव खंडलेवाल की हां में हां मिलाते हुए औऱ शो से अतिरिक्त रुप से प्रभावित होते हुए अंजना कश्यप ने इस विशेष कार्यक्रम के खत्म होने की घोषणा करते हुए स्पष्ट किया कि इस कार्यक्रम के माध्यम से वो इस शो के तमाम पहलुओं पर सोचने और सवाल पैदा करने के मौके को पेश करना चाह रही थी।



सच का सामना के आने के बाद से लाइ डिटेक्टिव औऱ पॉलीग्राफी ये दो शब्द बहुत ही तेजी से पॉपुलर हुए हैं। अब तक अपराधियों के लिए प्रयोग में लायी जानेवाले इस प्रोसेस से एक आम ऑडिएंस का सरोकार न के बराबर रहा है। न्यूज चैनलों ने इसे जिस रुप में दिखाया है उसके हिसाब से आम लोगों के बीच इसे लेकर डर भी पैदा हुआ है। इस शो ने पॉलीग्राफी को फैमिलियर बनाने का काम किया है। संभवतः इसलिए स्टार न्यूज सच का सामना स्पेशल स्टोरी में पॉलीग्राफी मशीन के काम करने के तरीके से लेकर इसके प्रभाव और इससे मिलनेवाली फाइंडिंग के बारे में तफसील से जानकारी देने की कोशिश की। कार्यक्रम का एक बड़ा हिस्सा इस मशीन की कार्यप्रणाली को समझाने और सच का सामना में इसके प्रयोग को सामने में लगा रहा।


अपनी आदत के मुताबिक इंडिया टीवी ने सच का सामना में भी दावे पेश करता नजर आया। उसने कार्यक्रम के शुरु होते ही दावा किया कि वो स्टार प्लस पर आज सच का सामना शुरु होने से आधे घंटे पहले ही इसे इंडिया टीवी पर दिखाएगा। एंकर ने अपनी तरफ से ही संभावित सवाल तैयार किए औऱ दर्शनशास्त्री सुजाता मीरी की मदद से इस पर अटकलें लगानी शुरु कर दी कि अगर आज युसुफ हुसैन से शारीरिक संबंध,रिश्तों और तीन पत्नियों के बारे में पूछा जाएगा तो उनका क्या जबाब होगा? इस मामले में सुजाता मीरी बार-बार इस बात पर जोर देती रही कि युसुफ साहब एक्टर हैं,वो कैमरे को फेस करते रहे हैं,इसलिए उन्हें इन सब सवालों के जबाब देने में कोई परेशानी नहीं होगी,और रसिक तो हैं ही। लेकिन इससे अलग साइकियाट्रिस्ट सुरभि सोनी की समझ रही कि कोई भी इंसान भले ही कैमरे के आगे कुछ बी बोल देता हो लेकिन अपनी बेटी के सामने सबकुछ सच कहने में थोड़ी तो परेशानी जरुर होगी। वैसे इंडिया टीवी पर सच बोलने और उसके बाद इंसान और उसके रिश्तों पर पड़नेवाले असर को लेकर चल रही बहस भी दिलचस्प रही।



सच दिखाने की दौड़ में एनडीटीवी इंडिया का अंदाज बाकी के चैनलों से अलग रहा। स्पेशल रिपोर्ट में रवीश कुमार ने ये कहीं भी पकड़ में आने नहीं दिया कि वो भी बाकी चैनलों की भेड़चाल में शआमिल हैं और इसलिए सच को लेकर स्पेशल रिपोर्ट बना रहे हैं लेकिन लगातार टेलीविजन देखनेवाले लोग आसानी से समझ सकते हैं कि सच को लेकर आधे घंटे की स्टोरी का दिखाया जाना इतना जरुरी क्यों हो गया है? रवीश सच का सामना शो के बहाने आदत से ज्यादा फैशन के तौर पर सच की चर्चा किए जाने की स्थिति को अपने से अलग करते हैं और शो के बारे में बिना कुछ कहे,उधार में बिना कोई फुटेज लिए पंजाब के गुरुदासपुर की ओर रुख करते हैं। गुरुदासपुर का वही स्कूल-कॉलेज जिस पर रवीश कुमार ने पहले भी एक स्पेशल स्टोरी की है। जिसकी अपनी कोई बिल्डिंग नहीं है,जहां लड़कियां पढ़ते हुए अपने से नीचे क्लासवाली लड़कियों को पढ़ाती भी है। अबकी बार रवीश ने सच के प्रयोग को दिखाने के लिए इस स्कूल को दोबारा चुना। एक लड़की से रवीश का सवाल है- तुम्हें शर्म नहीं आती कि इतने सारे लोगों के बीच अपनी गलती(परीक्षा में चोरी) को मान रही हो। लड़की का जबाब है- जब गलती करने पर शर्म नहीं आयी तो फिर अब मानने में क्या शर्म? धारदार अंदाज में बोलते हुए एक तरह से वादा भी करती है कि अबकी वो इमानदारी से फर्स्ट क्लास लाएगी। इस प्रोग्रा में एक-दूसरे की गलती को,झूठ को पकड़ने और सुधारे के तरीके को व्यवस्थित तरीके से दिखाया गया। इस स्कूल में ईमानदारी इस हद तक है कि चोरी पकड़े जाने पर 21,000 रुपये का इनाम है लेकिन कभी किसी को ये इनाम मिला नहीं।

अब देखिए तो कार्यक्रम सच का सामना का अर्थ सिर्फ स्त्री-पुरुष के बीच के रिश्तों और उलझनों से भले ले रहा हो,शुरुआती दौर में न्यूज चैनलों ने सच का मतलब विवादों को पैदा करना समझा हो लेकिन कार्यक्रम की पॉपुलरिटी ने कोने-कोने में सच के प्रयोग को खोजने की जिम्मेवारी न्यूज के लिए जरुर बढ़ा दी है। ठीक उसी तरह जैसे बालिका वधू,लाडो और उतरन को देखते हुए सामाजिक कुरीतियों पर थोक के भाव में मुद्दे दिखाए जाने लगे। अब देखना ये होगा कि ये सच,बस एक मुहावरा बनकर रह जाता है,भावुकता और अतिरेक में खो जाता है या फिर इस शो के बहाने सार्वजिनक स्तर के सच खुलकर सामने आते हैं?