सुबह उठकर जब मैंने वेबसाइट खंगालने शुरु किए तो देखा जनसत्ता के जिस लेख "पेड न्यूज के पिछवाडे" की पीडीएफ मोहल्लालाइव को भेजी थी,वो लेख भड़ास4मीडिया पर छपा है. उस लेख में इस बात का कहीं जिक्र नहीं था कि ये पहले जनसत्ता में छप चुका है. लिहाजा सबसे पहले मैंने भड़ास4मीडिया के कमेंट बॉक्स में लिखा- सर,ये लेख कल जनसत्ता में छप चुका है और इस बात का जिक्र किया जाना जरुरी है. थोड़ी देर बाद वेबसाइट ने इसे शामिल कर लिया.
जीमेल इन्बॉक्स देखा तो उसमें अविनाश के मेल थे. लिखा था- चूंकि यह अभियान भड़ास ने चलाया है,वहां ये छपे तो ज्यादा सही रहेगा. रात में ब्रॉडबैंड न चलने की स्थिति में मैंने ये मेल सरसरी तौर पर मोबाईल से देखा था लेकिन लैपटॉप से पूरा खोलकर देखने पर पता चला कि यूनीकोड में कन्वर्ट करने के बाद अविनाश ने वो लेख भड़ास4मीडिया के मॉडरेटर यशवंत सिंह को भेजा है. मुझे अटपटा लगा और साथ में बेतुका भी. जब मैंने लेख मोहल्लालाइव के लिए भेजा था तो उसे भड़ास4मीडिया को भेजने की क्या जरुरत थी ? अगर अविनाश को ये लेख मोहल्लालाइव पर नहीं छापनी थी तो उसे इग्नोर करने या फिर मना करने के कई बहाने हो सकते थे. ये मॉडरेटर का अपना विवेक और निर्णय है कि वो अपनी वेबसाइट पर क्या छापे,क्या नहीं. जैसा कि वो पहले से करते आए हैं. नहीं छापने की स्थिति में मेरे सहित दूसरे लोगों को भी वजह बताई है कि चूंकि ये लेख पहले कहीं छप चुका है, हम इसे मोहल्लालाइव पर नहीं छाप सकते. ये अलग बात है कि कई ऐसे लेख जो उन्हें जरुरी लगा,वर्चुअल स्पेस की कब्र से खोदकर निकालकर छापते रहे हैं. खैर,
मोहल्लालाइव या किसी भी दूसरी वेबसाइट के लिए भेजा गया लेख वहां न छपने की स्थिति में कहां छपेगा,ये तय करने का अधिकार उस वेबसाइट के मॉडरेटर को है या फिर खुद लेखक को,ये अविनाश जैसे सधे मॉडरेटर से बेहतर भला कौन बता सकता है ? उन्होंने किस समझदारी से ये लेख भड़ास4मीडिया को भेज दिया,ये अभी तक मेरी समझ के बाहर है. अगर उनके तर्क के हिसाब से भी समझने की कोशिश करें कि इस लेख में भड़ास4मीडिया का जिक्र है तो वहां छपनी चाहिए. इसमें सीधा सा सवाल है कि लेख में मीडिया दरबार डॉट कॉम का भी तो जिक्र था, फिर उसे क्यों नहीं भेजा. जब इस लेख के जरिए प्रचार-प्रसार( उनसे लिया उधार के शब्द) ही करना था तो ये मौका मीडिया दरबार को क्यों न दिया गया ? अविनाश ऐसा करके आखिर साबित क्या करना चाहते हैं ? कहीं भड़ास4मीडिया के मॉडरेटर को ये एहसास कराना तो नहीं कि विनीत कुमार की इच्छा थी कि ये लेख इस वेबसाइट पर छपे और चूंकि पिछले चार सालों से मॉडरेटर यशवंत सिंह से सीधे बात नहीं की है तो अविनाश दास के जरिए लेख छपवाने की कोशिश की ? अविनाश को क्या ऐसा करने का हक है कि वो इस तरह की अटकलें और आकलन लगाने की छूट उस वेबसाइट को दे जहां पिछले चार सालों से लेखक की कोई भी पोस्ट नहीं छपी है.
ये वही अविनाश हैं जिन्होंने आज से चार साल पहले मोहल्ला( तब वो ब्लॉग भर था) पर मेरी पोस्ट ये कहते हुए छापने से मना कर दिया था कि जो भड़ास पर छपता है,हम उसे यहां नहीं छापते. आज आखिर ऐसा क्या हो गया कि चार साल से जो लेखक सिर्फ मोहल्ला औऱ मोहल्लालाइव के लिए लिखता आया है, उसका लेख भड़ास4मीडिया को यूनिकोड में कन्वर्ट करके भेजा गया ? ये बात भड़ास4मीडिया पर छपे लेख और किए गए परिवर्तन पर ध्यान देने पर आसानी से समझ आ जाता है.
दरअसल लेख में मैंने लिखा था कि सबसे पहले स्टार न्यूज ने निर्मल बाबा के विरोध में स्टोरी चलायी जबकि अविनाश को इस बात से असहमति थी. उनके अनुसार न्यूज एक्सप्रेस ये काम पहले से करता आया है. न्यूज एक्सप्रेस के कुछ प्रोग्राम कार्टून की शक्ल में हमने पहले भी देखे थे. उड़ती-उड़ती ये भी खबर आयी कि चूंकि न्यूज एक्सप्रेस को निर्मल बाबा ने विज्ञापन देने लायक नहीं समझा तो आखिर में चैनल के मुखिया मुकेश कुमार झंड़े लेकर खड़े हो गए. थर्ड आइ ऑफ निर्मल बाबा पिछले ढाई-तीन महीने से आ रहा है, जाहिर है मुकेश कुमार इस कार्यक्रम से गुजरे होंगे.लेकिन ये चैनल हर खबर के पीछे पॉलिटिकल एंगिल खोजता है,समाज और अंधविश्वास का एंगिल बहुत बाद में आता है,लिहाजा इस पर कोई स्टोरी करना जरुरी नहीं समझा. बाद में विज्ञापन न मिलने और निर्मल बाबा का नाम सांसद इंदर सिंह नामधारी से जुड़ने के कारण स्टोरी करनी शुरु कर दी. न्यूज एक्सप्रेस और मुकेश कुमार को इस बात की पीड़ा लगातार बनी रही कि स्टोरी सबसे पहले उन्होंने की लेकिन उन्हें कोई क्रेडिट क्यों नहीं दे रहा ? शायद इसलिए भड़ास4मीडिया ने जब जनसत्ता में मेरा लेख छापा तो उसमें इस चैनल का नाम जोड़ दिया. साथ में ये स्पष्टीकरण देना भी जरुरी नहीं समझा कि इस लेख में वेबसाइट की तरफ से कुछ फेरबदल किए गए हैं. अगर मैंने लेख में गलत जानकारी दी थी तो इसका सबसे बेहतर तरीका था कि वेबसाइट अपनी तरफ से इसे लिखता,मेरे लिखे को खारिज करता,जनसत्ता को पत्र लिखकर शिकायत करता लेकिन नहीं. उसने अपने तरीके से मूल लेख को एडिट करके छापा. बहरहाल
भड़ास4मीडिया ने ऐसा क्यों किया, इस वेबसाइट को लगातार विजिट करनेवाले लोगों के लिए समझना आसान नहीं है. न्यूज एक्सप्रेस का विज्ञापन औऱ मुकेश कुमार की प्रशस्ति पहले लगातार आते रहे हैं और शायद आगे भी आएं. इस लेख में अलग से चैनल का नाम जोड़कर वेबसाइट ने अपने तरीके से ठीक ही किया. लेकिन ये सब करने से मोहल्लालाइव और अविनाश को क्या लाभ मिला, इसे समझने में मुझे थोड़ा सा वक्त लगा.
दुनिया की नजर में अविनाश दास और यशवंत सिंह दो अलग-अलग टापू पर बैठे मॉडरेटर हैं जहां से गुजरनेवाली हवा को एक-दूसरे से छूकर गुजरने की भी मनाही है. लेकिन मेल के जरिए यूनीकोड मटीरिअल का भेजा जाना साबित करता है कि अविनाश दास की उदारता कुछ दूसरी ही गली में जाकर खुलती है. जाहिर है ये अविनाश का बडप्पन नहीं बल्कि एक तरह की खीज और बाद में उसे पीआरगिरी की शक्ल में बदलने की कोशिश से ज्यादा नहीं थी. ये बात तब और स्पष्ट हो गई जब
फेसबुक पर शशिभूषण एक पीस लिखी और उसमें निर्मल बाबा के पर्दाफाश के लिए असली हकदार मोहल्लालाइव और हंस को दिया. मोहल्लालाइव को इसलिए कि उसने सबसे पहले निर्मल बाबा के सच को सामने लाने की कोशिश की थी. उसने अमेरिकी वेबसाइट पर छपी सामग्री का उल्था पेश किया था और हिन्दी समाज के बीच गर्माहट पैदा करने की कोशिश थी. हंस को क्रेडिट इसलिए दिया जाना चाहिए था क्योंकि सबसे पहले मुकेश कुमार ने वहां लेख लिखकर पर्दाफाश किया था. जाहिर है शशिभूषण ने मेरी जानकारी ही बढ़ाई थी लेकिन साथ में ये भी जतला दिया था कि उनका उद्देश्य निर्मल बाबा के विरोध के प्रसंग को क्रम से देखना नहीं था बल्कि मुकेश कुमार और मोहल्लालाइव का जो हक मारा जा रहा था, उसे जाहिर करना था. अगर ऐसा नहीं होता तो वे मार्च में छपे तहलका के उस लेख का भी जिक्र करते जिसका शीर्षक था- ये देश संसद से नहीं,निर्मल बाबा से चलता है..
अविनाश ने शशिभूषण की इस एफबी पोस्ट के नीचे कमेंट में सिर्फ विनीत कुमार लिखा जिसका मतलब था- विनीत कुमार,आप कहां सोए पड़े हैं,ये देखिए निर्मल बाबा के पर्दाफाश का असली सच. इसी क्रम में बात मुकेश कुमार तक आ गयी और एक सज्जन ने उनमें खास दिलचस्पी इसलिए दिखाई क्योंकि वो मुकेश कुमार के बारे में कुछ और ही जानते थे और उन्हीं के इलाके के थे. अविनाश ने तपाक से लिखा था- हां ये वही मुकेश कुमार हैं जिन्होंने सहारा में रहकर सहारा प्रणाम करने से मना कर दिया था. एक-दो और ऐसे कमेंट जिसमें हमें सलाह दी गई कि अगर हमने मुकेश कुमार के चैनल न्यूज एक्सप्रेस को देखा होता तो शायद उनके बारे में ऐसी निगेटिव राय नहीं रखते. हालांकि शशिभूषण की एफबी वॉल पर से मुकेश कुमार से जुड़ी सारी टिप्पणियां हटा दी गई हैं. मुकेश कुमार ने मौर्या टीवी में रहकर क्या किया है औऱ कैसे चैनल को नंबर वन बनाया है,ये अलग से बताने की जरुरत नहीं है. इस पर तहलका ने कवर स्टोरी ही की है. स्टोरी में स्पष्ट किया है कि केबल के साथ चैनल ने ऐसी सेटिंग की कि कुछ घंटे के लिए पटना में सिर्फ मौर्या टीवी ही आया और चैनल रातोंरात नंबर वन हो गया. बाद में इसकी क्या हालत हुई, कैसे बेतहाशा छंटनी का दौर शुरु हुआ,ये सब इंटरनेट पर मौजूद है.
इस तरह कहानी यहां आकर पहुंचती है कि भड़ास4मीडिया ने मेरे लेख में न्यूज एक्सप्रेस का नाम जोड़कर संशोधन/ नमक का हक अदा किया तो अविनाश हमें कौन सा सच समझा रहे थे ? अविनाश और यशवंत में परस्पर विरोध होने जो कि जब-तब वर्चुअल स्पेस में जाहिर होता रहा है के वाबजूद एक धागा है जो इस पूरे धत्तकर्म से जुड़ती है और वो हैं मुकेश कुमार. मुकेश कुमार ने तो भड़ास4मीडिया को विज्ञापन देकर यशवंत सिंह को अपना मुरीद बना लिया लेकिन अविनाश को सहारा प्रणाम का विरोध याद रह गया और मौर्या टीवी का गंदा खेल नहीं, ये कैसे भूल गए ? क्या जो विज्ञापन नहीं दिखता है, उसके भी अपने लाभ होते हैं ?
वर्चुअल स्पेस पर क्रेडिट लेने की मारकाट उसी तरह से जारी है जिस तरह से स्टार न्यूज की स्ट्रैटजी से मार खाया हुआ इंडिया टीवी भी घसीट-घसीटकर एक्सक्लूसिव कहलाए जाने की बेचैनी से भोकार रहा है.



