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Friday, 17 July 2009

अब सच का सामना पर लट्टू हैं न्यूज चैनल्स

क्या इंसान की जिंदगी में सेक्स,शारीरिक संबंध और स्त्री-पुरुष के बीच होनेवाली गतिविधियां और उस बीच महसूस की जानेवाली भावनाएं ही जीवन के सबसे बड़े सच हैं। क्या जिंदगी का सच यही जाकर खत्म हो जाता है? न्यूज24 के एंकर अखिलेश आनंद ने चैनल के विशेष कार्यक्रम ये सच नहीं आसान में पिछले सप्ताह स्टार प्लस पर शुरु हुई रियलिटी शो के एंकर राजीव खंडेलवाल से जो सवाल किए उसके मिलते जुलते भाव यही है कि क्या ये शो सच के सवाल को उसकी सीमा को बहुत ही सीमित करके नहीं देख रहा? क्या जीवन में इन सबके अलावे कोई दूसरा बड़ा सच नहीं हो सकता। हालांकि इस मामले में राजीव खंडलेवाल की अपनी समझ है कि इंसान के जीवन में यही वो जरुरी पहलू हैं जो कि उसके लिए सबसे ज्यादा मायने रखते हैं। जाहिर तौर पर वो पहलू जिसे कि वो आसानी से सार्वजनिक नहीं करता लेकिन दूसरी तरफ जब वो इन रिश्तों के बीच घुलता रहता है,कैंसर की तरह उसके बीच फैलने लगता है तो वो उसे लोगों के बीच बांटना चाहता है,शेयर करना चाहता है। न्यूज24 पर आकर राजीव खंडेलवाल ने ये स्वीकार किया है कि आगे भी जाकर कार्यक्रम में इसी तरह के सवाल पूछे जाएंगे। सवलों के मिजाज को लेकर बहुत ज्यादा बदलाव की गुंजाइश नहीं है। मोटे तौर पर सच का सामना के जरिए हम ये निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि निजी जीवन और बहुत ही पर्सनल फीलिंग के मौके ही इंसानी जीवन का सबसे बड़ा सच होता है। अब हम इस बात पर बहस कर सकते हैं कि क्या ऐसा मानना या होना सही है और अगर है तो इसके पहले और बाद के,आजू-बाजू के जो सच हैं उसका क्या होगा?

स्टार प्लस पर शुरु होनेवाले कार्यक्रम सच का सामना के जब सिर्फ प्रोमो ही दिखाए गए तभी से न्यूज चैनलों ने अटकलें लगानी शुरु कर दी कि ये शो जबरदस्त तरीके से कई विवादों को जन्म देगा। इसके ठीक पहली वाली पोस्ट में हमने लिखा भी कि इन विवादों को लेकर चैनल के अलग-अलग डेस्क को कई मसाले मिलेंगे। कार्यक्रम के उस प्रोमो से जिसमें कि कांबली की ओर से सचिन तेंदुलकर पर कुछ कमेंट किए गए,जिसमें ये लगातार दिखाया जाता रहा( जो कि अब भी जारी है)कांबली का मानना है कि अगर तेंदुलकर ने मेरा साथ दिया होता तो करियर लाइफ लंबी होती,उसके बाद से ही न्यूज चैनलों ने कांबली और तेंदुलकर पर स्पेशल स्टोरी बनानी शुरु कर दी। कुल मिलाकर कार्यक्रम शुरु होने से पहले से ही उसकी प्रकृति और तासीर को न्यूज चैनलों ने फिक्स कर दिया। इस आधार पर कुछेक चैनलों ने इस बात की आलोचना भी कि ये शो लोगों के बीच के आपसी रिश्तों में खटास पैदा करने का काम करेगा। कांबली जैसे लोगों पर कमेंट करने शुरु किए कि एक करोड़ के चक्कर में दोस्ती जैसे रिश्ते को ताक पर रख आए। यहां तक चैनलों ने सच का सामना के लिए राजी नहीं होनेवाले जैकी श्राफ और शेखर सुमन जैसे शख्सियतों को ज्यादा महान और बेहतर बताने की कोशिशें करते रहे।

लेकिन ऑडिएंस के बीच सच का सामना के जबरदस्त ढंग से सराहे जाने के बाद न्यूज चैनलों ने दो-तीन दिन के भीतर अपने पैंतरे बदल लिए। उन्हें अब ये समझ आने लगा है कि इस शो का एकमात्र एंगिल विवाद नहीं हो सकता है,इसके भीतर से कई चीजें निकलकर आने की भरपूर संभावना है.इस लिहाज से ये मनोरंजन चैनलों पर जारी मौजूदा किसी भी सीरियल और रियलिटी शो से ज्यादा दुधारु शो है जिस पर कई तरीके से कार्यक्रम बनाए जा सकते हैं,इसे कई स्टोरी आइडिया में फिट करके आधे घंटे का कार्यक्रम बहुत ही मजे से बनाया जा सकता है। शायद यही वजह है कि कल एनडीटीवी इंडिया से लेकर इंडिया टीवी तक ने इस शो के बहाने सच के फ्लेवर को अपने-अपने ढंग से खोजने की कोशिश की बल्कि न्यूज24 के अखिलेश आनंद ने तो यहां तक कहा कि जिस समाज में झूठ का बोलबाला है,ऐसे में इस शो ने काफी हद तक हलचल तो जरुर मचा दी है। लंबे समय तक इसके विरोध में कुछ न दिखाने और कहने की स्थिति में न्यूज चैनल अब इस कार्यक्रम की चिरौरी करने में जुट गए हैं। संभव है हर ब्रेक के बाद इस शो का विज्ञापन भी एंकर को ऐसा करने के लिए प्रेरित करता हो। बहरहाल,

न्यूज24 ने ये सच नहीं आसान नाम से जो स्पेशल प्रोग्राम दिखाया उसमें बाकी बातों की तफसील में न जाएं तो शो में भाग लेने आयी मनीषा,सीनियर जर्नलिस्ट की बात सबसे ज्यादा दमदार और ठहरकर सोचनेवाली लगी। मनीषा का साफ मानना है कि स्त्री का सच पुरुषों के सच से अलग होता है। द्रौपदी ने भी सच कहा था कि अंधे के बच्चे तो अंधे ही होते हैं,सीता ने भी कहा था कि रावण के साथ उसके कोई संबंध नहीं है लेकिन आप समझ सकते हैं कि उसे किस रुप में लिया गया। वही कृष्ण ने भी दुर्योधन से झूठ बोला,राम ने भी झूठ बोला और उसे अलग तरीके से लिया गया। इसलिए हमें इस शो में भी एक स्त्री के बोले गए सच और पुरुष के बोले गए सच में फर्क करना होगा। जाहिर है स्त्री अपने सच को उतनी सहजता से बोलने की स्थिति में नहीं होती। सच का सामना का पक्ष लेते हुए एंकर अखिलेश आनंद ने गांधीजी के सात सत्य के प्रयोग की चर्चा की जो कि संदर्भ के अभाव में बेतुका ही लगा। सच का सामना के बहाने सच पर बात करते हुए अधिकांश चैनल के एंकर ये समझ ही नहीं पा रहे हैं कि जिस सच को सामने लाने की बात ये शो कर रहा है वो जीवन के बाकी के सच से अलग है। इसलिए सच के जो अलग-अलग एडीशन(संस्करण) है उसके साथ इस शो में जबाब के तौर पर पेश किए गए सच से घालमेल करना स्थितियों का सरलीकरण भर है। राजीव खंडलेवाल की हां में हां मिलाते हुए औऱ शो से अतिरिक्त रुप से प्रभावित होते हुए अंजना कश्यप ने इस विशेष कार्यक्रम के खत्म होने की घोषणा करते हुए स्पष्ट किया कि इस कार्यक्रम के माध्यम से वो इस शो के तमाम पहलुओं पर सोचने और सवाल पैदा करने के मौके को पेश करना चाह रही थी।



सच का सामना के आने के बाद से लाइ डिटेक्टिव औऱ पॉलीग्राफी ये दो शब्द बहुत ही तेजी से पॉपुलर हुए हैं। अब तक अपराधियों के लिए प्रयोग में लायी जानेवाले इस प्रोसेस से एक आम ऑडिएंस का सरोकार न के बराबर रहा है। न्यूज चैनलों ने इसे जिस रुप में दिखाया है उसके हिसाब से आम लोगों के बीच इसे लेकर डर भी पैदा हुआ है। इस शो ने पॉलीग्राफी को फैमिलियर बनाने का काम किया है। संभवतः इसलिए स्टार न्यूज सच का सामना स्पेशल स्टोरी में पॉलीग्राफी मशीन के काम करने के तरीके से लेकर इसके प्रभाव और इससे मिलनेवाली फाइंडिंग के बारे में तफसील से जानकारी देने की कोशिश की। कार्यक्रम का एक बड़ा हिस्सा इस मशीन की कार्यप्रणाली को समझाने और सच का सामना में इसके प्रयोग को सामने में लगा रहा।


अपनी आदत के मुताबिक इंडिया टीवी ने सच का सामना में भी दावे पेश करता नजर आया। उसने कार्यक्रम के शुरु होते ही दावा किया कि वो स्टार प्लस पर आज सच का सामना शुरु होने से आधे घंटे पहले ही इसे इंडिया टीवी पर दिखाएगा। एंकर ने अपनी तरफ से ही संभावित सवाल तैयार किए औऱ दर्शनशास्त्री सुजाता मीरी की मदद से इस पर अटकलें लगानी शुरु कर दी कि अगर आज युसुफ हुसैन से शारीरिक संबंध,रिश्तों और तीन पत्नियों के बारे में पूछा जाएगा तो उनका क्या जबाब होगा? इस मामले में सुजाता मीरी बार-बार इस बात पर जोर देती रही कि युसुफ साहब एक्टर हैं,वो कैमरे को फेस करते रहे हैं,इसलिए उन्हें इन सब सवालों के जबाब देने में कोई परेशानी नहीं होगी,और रसिक तो हैं ही। लेकिन इससे अलग साइकियाट्रिस्ट सुरभि सोनी की समझ रही कि कोई भी इंसान भले ही कैमरे के आगे कुछ बी बोल देता हो लेकिन अपनी बेटी के सामने सबकुछ सच कहने में थोड़ी तो परेशानी जरुर होगी। वैसे इंडिया टीवी पर सच बोलने और उसके बाद इंसान और उसके रिश्तों पर पड़नेवाले असर को लेकर चल रही बहस भी दिलचस्प रही।



सच दिखाने की दौड़ में एनडीटीवी इंडिया का अंदाज बाकी के चैनलों से अलग रहा। स्पेशल रिपोर्ट में रवीश कुमार ने ये कहीं भी पकड़ में आने नहीं दिया कि वो भी बाकी चैनलों की भेड़चाल में शआमिल हैं और इसलिए सच को लेकर स्पेशल रिपोर्ट बना रहे हैं लेकिन लगातार टेलीविजन देखनेवाले लोग आसानी से समझ सकते हैं कि सच को लेकर आधे घंटे की स्टोरी का दिखाया जाना इतना जरुरी क्यों हो गया है? रवीश सच का सामना शो के बहाने आदत से ज्यादा फैशन के तौर पर सच की चर्चा किए जाने की स्थिति को अपने से अलग करते हैं और शो के बारे में बिना कुछ कहे,उधार में बिना कोई फुटेज लिए पंजाब के गुरुदासपुर की ओर रुख करते हैं। गुरुदासपुर का वही स्कूल-कॉलेज जिस पर रवीश कुमार ने पहले भी एक स्पेशल स्टोरी की है। जिसकी अपनी कोई बिल्डिंग नहीं है,जहां लड़कियां पढ़ते हुए अपने से नीचे क्लासवाली लड़कियों को पढ़ाती भी है। अबकी बार रवीश ने सच के प्रयोग को दिखाने के लिए इस स्कूल को दोबारा चुना। एक लड़की से रवीश का सवाल है- तुम्हें शर्म नहीं आती कि इतने सारे लोगों के बीच अपनी गलती(परीक्षा में चोरी) को मान रही हो। लड़की का जबाब है- जब गलती करने पर शर्म नहीं आयी तो फिर अब मानने में क्या शर्म? धारदार अंदाज में बोलते हुए एक तरह से वादा भी करती है कि अबकी वो इमानदारी से फर्स्ट क्लास लाएगी। इस प्रोग्रा में एक-दूसरे की गलती को,झूठ को पकड़ने और सुधारे के तरीके को व्यवस्थित तरीके से दिखाया गया। इस स्कूल में ईमानदारी इस हद तक है कि चोरी पकड़े जाने पर 21,000 रुपये का इनाम है लेकिन कभी किसी को ये इनाम मिला नहीं।

अब देखिए तो कार्यक्रम सच का सामना का अर्थ सिर्फ स्त्री-पुरुष के बीच के रिश्तों और उलझनों से भले ले रहा हो,शुरुआती दौर में न्यूज चैनलों ने सच का मतलब विवादों को पैदा करना समझा हो लेकिन कार्यक्रम की पॉपुलरिटी ने कोने-कोने में सच के प्रयोग को खोजने की जिम्मेवारी न्यूज के लिए जरुर बढ़ा दी है। ठीक उसी तरह जैसे बालिका वधू,लाडो और उतरन को देखते हुए सामाजिक कुरीतियों पर थोक के भाव में मुद्दे दिखाए जाने लगे। अब देखना ये होगा कि ये सच,बस एक मुहावरा बनकर रह जाता है,भावुकता और अतिरेक में खो जाता है या फिर इस शो के बहाने सार्वजिनक स्तर के सच खुलकर सामने आते हैं?

Wednesday, 15 July 2009

क्या कीमत लेकर ही आप सच का सामना करेंगे ?


रोजमर्रा की जिंदगी में ये मुहावरा आम हो चला है कि सच बोलना आसान काम नहीं है,इसकी हमें भारी कीमत चुकानी पड़ती है। ये कीमत किस तरह की हो सकती है,ये किसी को पहले से पता नहीं होता। संभव है सच बोलते हुए किसी को अपनी नौकरी से हाथ धोनी पड़ जाए,किसी से आपसी रिश्ते खराब हो जाए,पत्नी या गर्लफ्रैंड से रगड़ा हो जाए.वो कुछ हो जाए जिसके बारे में सोचते हुए आप और हम अंदर से हिल तक जाते हैं। शायद यही वजह है कि एक समझौता परस्त जीवनशैली हमारे बीच बड़ी तेजी से पनप रही है। चीजों को देखते-समझते हुए हम अपनी जुबान बंद कर लेते हैं,देखकर भी अनदेखा कर जाने की आदत विकसित करते हैं और गलत-सलत सुनकर भी गम खाकर रह जाने की कोशिश करते हैं। अब इस बात पर फिलहाल विवाद मत करने लग जाइए कि ऐसे में हम लिजलिजेपन को बढ़ावा देते हैं,रेंगनेवाले जंतु की तरह बनते चले जाते हैं,चाटुकार और हां जी सर,हां जी सर संस्कृति को बढ़ावा देते हैं लेकिन हममें से जो लोग भी सच बोलने,सुनने औऱ कहने से बचते आ रहे हैं,उन्हें पता है कि ऐसा करते हुए हमें तात्कालिक रुप से कितनी राहत मिल जाती है। हम कई तरह के झमेले में पड़ने से बच जाते हैं।

दूसरी स्थिति ये भी बनती है कि मानवीयता,संवेदनशीलता,विवेक और आदमी होने की सबूत को जिंदा रखने के लिए वक्त-वेवक्त हम सच बोल भी देते हैं तो उसके बाद जो स्थिति बनती है,दिमाग में एक ही सवाल उठता है कि हमने सच बोल भी दिया तो बदले में हमें मिलता क्या है? फ्रस्ट्रेशन,थाना-पुलिस का चक्कर,कूलीग से हिकारत कि बड़ा आया हरिश्चन्द्र बनने। बॉस की आंखों में खटकने लग जाते हैं। इसे सिस्टम से दूर करों,ये अगर रह गया तो सारा खेल बिगाड़ देगा। गर्लफ्रैंड को कह दिया-सच कहूं तुमसे बस इसलिए जुड़ा हूं कि अपनी शाम अकेले कटती नहीं,सच्चाई ये है कि शादी के स्तर पर तुम्हारे बारे में सोच ही नहीं सकता,हमें अपने बाबूजी को हर्ट करना नहीं है। जाहिर है ऐसा करते हुए आपका महीना,दो महीने शाम क्या चौबीसों घंटे खराब हो जाए। आज जिन लोगों ने भी दि टाइम्स ऑफ इंडिया से गुजरे हों,उन्हें मेरी लिखी सारी बात अनुवाद लगे। ऐसा कुछ भी नहीं लगेगा कि मैं अपनी तरफ से कुछ कह रहा हूं। फ्रंट पेज के पहले आधे पन्ने में जो कुछ भी लिखा है-उस पर इन्हीं सारी स्थितियों की चर्चा है। आप जैसे ही उस पन्ने को पलटते हैं,इन सबकी कीमत मिलने की बात करता है। हम और आप सच बोलने की स्थिति में जो फ्रस्ट्रेट होते रहे हैं,उसकी सही कीमत,संबंधों के बिगड़ने और नौकरी के जाने का उचित मुआवजा देने की गारंटी की बात की जाती है। जिन लोगों ने मिशनरी कॉन्वेंट स्कूल या कॉलेज में पढ़ाई की है,उन्हें पता है कि फादर के आगे सच बोलने पर एक घड़ी के लिए मन तो हल्का हो जाता है लेकिन उसके आगे क्या? लेकिन अब टेलीविजन पर,राजीव खांडेलवाल के सामने सच कबूल करने पर एक करोड़ रुपये मिलेंगे,आप फिर से सच बोलने के लिए मचल पड़ते हैं।

इंटरटेन्मेंट चैनल स्टार प्लस की ओर से घोषणा की जा रही है कि वक्त आ गया है सच्चाई की अग्निपरीक्षा देने का। चैनल हमें इस बात का आश्वासन देता है कि सच का सामना की कीजिए,आपको फ्रशस्ट्रेट नहीं होना पड़ेगा। जाहिर है चैनल सच बोलने की जो कीमत हमें अदा करेगा उसके सामने किसी भी संबंध के बिगड़ने,किसी भी तरह की नौकरी के खोने और किसी भी शख्स से मतभेद होना कोई बड़ी बात नहीं है। चैनल की ओर से पूरे के पूरे एक करोड़ रुपये दिए जाएंगे। भावना और मानवीय संवेदना को आधार बनाकर टेलीविजन समीक्षा करनेवाले लोगों के लिए ये बात खटक सकती है कि टेलीविजन संबंधों,संवेदना,व्यक्तिगत अनुभवों और विचारों की भी कीमत लगाने में जुटा है। अभी तक तो टीआरपी के आंसू ही बनते रहे टेलीविजन पर लेकिन अब तो सब बेपर्दा हो जाएगा। इसे रोकिए,इसे आगे चलने मत दीजिए। शायद इसी सिरे से विचार करते हुए जैकी श्राफ, महेश भट्ट, शेखर सुमन, गुलशन ग्रोवर और रणजीत जैसी शख्सियत ने लेकिन दूसरी तरफ ये स्थिति भी बनती है। ये समाज के वो लोग हैं जिनके लिए अपनी सिक्रेसी,संबंध,भावुक पलों को बचाए रखने के आगे एक करोड़ की रकम कुछ भी नहीं है।

लेकिन दूसरी स्थिति ये भी है कि एक करोड़ के आगे हममे से कितने ऐसे लोग हैं जो रिश्तों,संबंधों,सच और संवेदना आधारित सच को बाहर आने नहीं देना चाहेंगे। इसे एक आम बोलचाल की भाषा में भावुकता से भरा लिया गया निर्णय ही कहा जाएगा। न्यूज चैनल आज के शो में दिखाए जानेवाले कांबली के सच के प्रोमो को जिस रुप में प्रोजेक्ट कर रहे हैं,उससे तो यही झलकता है कि एक करोड़ के लिए वो कितना गिर गया है कि सचिन तेंदुलकर और अपने बीच के बहुत ही घरेलू औऱ व्यक्तिगत संबंध को दुनिया के सामने रखकर बेपर्दा कर दिया। एक निजी चैनल ने तो यहा तक कहा कि कांबली को ऐसा करने का अफसोस भी है। यकीन मानिए,न्यूज चैनल इस शो में सच बोलने की स्थिति को जिस रुप में ले रहे हैं,प्रोजेक्ट कर रहे हैं,उस पर गौर करते हुए सच बोलने आया पार्टिसिपेंट सदमे से मर जाए। सच बोलकर जो मानसिक तौर पर मजबूती मिलती है कि हमने प्रतिरोध के स्वर को मजबूत किया है,संबंधों को बीच अपने हिस्से की इमानदारी निभायी है,वो सब कुछ भी दिमाग में नहीं आएगा। एक नए किस्म का ग्लानि बोध पैदा होगा कि मैं क्या इतना गिर गया हूं कि एक करोड़ की खातिर वो सबकुछ भी देश के लोगों के सामने बेपर्द कर सकता हूं जो सच होने से पहले बहुत ही निजी अनुभव रहे हैं। छीः मैं इतना घटिया इंसान हूं। ऐसे में आम लोगों के बीच शेखर सुमन और जैकी श्राफ जैसे लोगों का कद पहले से और उंचा होगा जो कि एक करोड़ की चिंता किए बगैर सच बोलने से साफ मुकर जाते हैं। यहीं पर एक बार फिर से स्थापित होता है कि झूठे बने रहकर ही ज्यादा शान और आराम की जिंदगी संभव है। झूठ औऱ सच बोलने की स्थिति के बीच जो करोड़ रुपये को बीच में शामिल किया गया है वो सच को फिर से बौना करने की कोशिश है। न्यूज चैनल इसे और मजबूत करने में जुटे हैं।

ये कार्यक्रम अभी शुरु नहीं हुए हैं। आज रात से 10:30 बजे से शुरु होंगे लेकिन एक तो विज्ञापन स्ट्रैटजी औऱ दूसरा कि न्यूज चैनलों के बीच की खदबदाहट इस कार्यक्रम के लिए महौल बनाने में जुटे हैं। कल शाम से ही कांबली की बाइट सहित सचिन के साथ जोड़कर पैकेज पर पैकेज चलाए जा रहे हैं। ऐसे में शो का एक एंगिल जो बनने चाहिए कि 21 सवालों के जरिए एक इंसान के मनोविज्ञान को समझने की जो कोशिशें होगी,लाइ डिटेक्टर के जरिए इसे बाकी की रियलिटी शो से ज्यादा विश्वसनीय बनाने की कोशिशें होगी,वो सारा पक्ष दबता नजर आ रहा है। विदेशों में मोमेंट ऑफ ट्रूथ के नाम से प्रसारित इस शो को लेकर ये बताया जा रहा है कि इस शो ने कई घरों को बर्बाद किया है लेकिन स्टार प्लस की ऑफिसियल वेबसाइट ने इसे इंसानी जिंदगी की वो खिड़की कहा है जिससे अपने भीतर के मन को झांका जा सकता है,अपने को बेहतर और सुंदर बनाया जा सकता है। ये एक किस्म की साइकोथेरेपी है। इसके अलावे अगर सच बोलने पर कुछ सच सामने आते हैं तो उन चैनलों के स्टिंग ऑपरेशन से ज्यादा दिलचस्प और मतलब के होंगे जो कि चैनलों की कैंटीन को खाली करवाकर किए जाते हैं,उससे ज्यादा मजबूत होगा जो स्टिंग हो करके उसकी टेप चैनल की अर्काइव में खो जाते हैं,ऑन एयर नहीं होते। ये राजनीति,समाज,मनोविज्ञान,देश और दुनिया को समझने का एक बेहतर संदर्भ पैदा कर सकता है। समय-समय पर जब एक सामान्य व्यक्ति आकर 21 सवालों से गुजरेगा तो आप इसके जरिए एक औसत आदमी की मनःस्थिति को समझ सकेंगे।

लेकिन जैसा कि अभी से ही जो लक्षण दिखायी दे रहे हैं,उसमें इस शो के सकारात्मक दिशा में बढ़ने की गुंजाइश बहुत ही कम दिखती है। ये थोक के भाव में विवादों को जन्म देगा जिससे कि चैनलों को भरपूर मसाला मिलेगा। हर डेस्क के हाथ कुछ न कुछ लगेगा जिसे खींचकर दो-तीन तक दावत कर सकेंगे। आप देखिए न कि बालिका-वधू जैसे संभावना से लैस सीरियल संसद के गलियारों में जाकर इस आरोप से घिर जाता है कि इसने बाल-विवाह को बढ़ावा देने का काम किया है। पता नहीं,सच को सामने लाने की कोशिश में(जाहिर है टीआरपी और बिजनेस के लिए ही सही)इस शो से खुन्नस खाए कुछ लोग दंगा-फसाद करानेवाला कार्यक्रम न करार दे दें।