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Wednesday, 15 July 2009

क्या कीमत लेकर ही आप सच का सामना करेंगे ?


रोजमर्रा की जिंदगी में ये मुहावरा आम हो चला है कि सच बोलना आसान काम नहीं है,इसकी हमें भारी कीमत चुकानी पड़ती है। ये कीमत किस तरह की हो सकती है,ये किसी को पहले से पता नहीं होता। संभव है सच बोलते हुए किसी को अपनी नौकरी से हाथ धोनी पड़ जाए,किसी से आपसी रिश्ते खराब हो जाए,पत्नी या गर्लफ्रैंड से रगड़ा हो जाए.वो कुछ हो जाए जिसके बारे में सोचते हुए आप और हम अंदर से हिल तक जाते हैं। शायद यही वजह है कि एक समझौता परस्त जीवनशैली हमारे बीच बड़ी तेजी से पनप रही है। चीजों को देखते-समझते हुए हम अपनी जुबान बंद कर लेते हैं,देखकर भी अनदेखा कर जाने की आदत विकसित करते हैं और गलत-सलत सुनकर भी गम खाकर रह जाने की कोशिश करते हैं। अब इस बात पर फिलहाल विवाद मत करने लग जाइए कि ऐसे में हम लिजलिजेपन को बढ़ावा देते हैं,रेंगनेवाले जंतु की तरह बनते चले जाते हैं,चाटुकार और हां जी सर,हां जी सर संस्कृति को बढ़ावा देते हैं लेकिन हममें से जो लोग भी सच बोलने,सुनने औऱ कहने से बचते आ रहे हैं,उन्हें पता है कि ऐसा करते हुए हमें तात्कालिक रुप से कितनी राहत मिल जाती है। हम कई तरह के झमेले में पड़ने से बच जाते हैं।

दूसरी स्थिति ये भी बनती है कि मानवीयता,संवेदनशीलता,विवेक और आदमी होने की सबूत को जिंदा रखने के लिए वक्त-वेवक्त हम सच बोल भी देते हैं तो उसके बाद जो स्थिति बनती है,दिमाग में एक ही सवाल उठता है कि हमने सच बोल भी दिया तो बदले में हमें मिलता क्या है? फ्रस्ट्रेशन,थाना-पुलिस का चक्कर,कूलीग से हिकारत कि बड़ा आया हरिश्चन्द्र बनने। बॉस की आंखों में खटकने लग जाते हैं। इसे सिस्टम से दूर करों,ये अगर रह गया तो सारा खेल बिगाड़ देगा। गर्लफ्रैंड को कह दिया-सच कहूं तुमसे बस इसलिए जुड़ा हूं कि अपनी शाम अकेले कटती नहीं,सच्चाई ये है कि शादी के स्तर पर तुम्हारे बारे में सोच ही नहीं सकता,हमें अपने बाबूजी को हर्ट करना नहीं है। जाहिर है ऐसा करते हुए आपका महीना,दो महीने शाम क्या चौबीसों घंटे खराब हो जाए। आज जिन लोगों ने भी दि टाइम्स ऑफ इंडिया से गुजरे हों,उन्हें मेरी लिखी सारी बात अनुवाद लगे। ऐसा कुछ भी नहीं लगेगा कि मैं अपनी तरफ से कुछ कह रहा हूं। फ्रंट पेज के पहले आधे पन्ने में जो कुछ भी लिखा है-उस पर इन्हीं सारी स्थितियों की चर्चा है। आप जैसे ही उस पन्ने को पलटते हैं,इन सबकी कीमत मिलने की बात करता है। हम और आप सच बोलने की स्थिति में जो फ्रस्ट्रेट होते रहे हैं,उसकी सही कीमत,संबंधों के बिगड़ने और नौकरी के जाने का उचित मुआवजा देने की गारंटी की बात की जाती है। जिन लोगों ने मिशनरी कॉन्वेंट स्कूल या कॉलेज में पढ़ाई की है,उन्हें पता है कि फादर के आगे सच बोलने पर एक घड़ी के लिए मन तो हल्का हो जाता है लेकिन उसके आगे क्या? लेकिन अब टेलीविजन पर,राजीव खांडेलवाल के सामने सच कबूल करने पर एक करोड़ रुपये मिलेंगे,आप फिर से सच बोलने के लिए मचल पड़ते हैं।

इंटरटेन्मेंट चैनल स्टार प्लस की ओर से घोषणा की जा रही है कि वक्त आ गया है सच्चाई की अग्निपरीक्षा देने का। चैनल हमें इस बात का आश्वासन देता है कि सच का सामना की कीजिए,आपको फ्रशस्ट्रेट नहीं होना पड़ेगा। जाहिर है चैनल सच बोलने की जो कीमत हमें अदा करेगा उसके सामने किसी भी संबंध के बिगड़ने,किसी भी तरह की नौकरी के खोने और किसी भी शख्स से मतभेद होना कोई बड़ी बात नहीं है। चैनल की ओर से पूरे के पूरे एक करोड़ रुपये दिए जाएंगे। भावना और मानवीय संवेदना को आधार बनाकर टेलीविजन समीक्षा करनेवाले लोगों के लिए ये बात खटक सकती है कि टेलीविजन संबंधों,संवेदना,व्यक्तिगत अनुभवों और विचारों की भी कीमत लगाने में जुटा है। अभी तक तो टीआरपी के आंसू ही बनते रहे टेलीविजन पर लेकिन अब तो सब बेपर्दा हो जाएगा। इसे रोकिए,इसे आगे चलने मत दीजिए। शायद इसी सिरे से विचार करते हुए जैकी श्राफ, महेश भट्ट, शेखर सुमन, गुलशन ग्रोवर और रणजीत जैसी शख्सियत ने लेकिन दूसरी तरफ ये स्थिति भी बनती है। ये समाज के वो लोग हैं जिनके लिए अपनी सिक्रेसी,संबंध,भावुक पलों को बचाए रखने के आगे एक करोड़ की रकम कुछ भी नहीं है।

लेकिन दूसरी स्थिति ये भी है कि एक करोड़ के आगे हममे से कितने ऐसे लोग हैं जो रिश्तों,संबंधों,सच और संवेदना आधारित सच को बाहर आने नहीं देना चाहेंगे। इसे एक आम बोलचाल की भाषा में भावुकता से भरा लिया गया निर्णय ही कहा जाएगा। न्यूज चैनल आज के शो में दिखाए जानेवाले कांबली के सच के प्रोमो को जिस रुप में प्रोजेक्ट कर रहे हैं,उससे तो यही झलकता है कि एक करोड़ के लिए वो कितना गिर गया है कि सचिन तेंदुलकर और अपने बीच के बहुत ही घरेलू औऱ व्यक्तिगत संबंध को दुनिया के सामने रखकर बेपर्दा कर दिया। एक निजी चैनल ने तो यहा तक कहा कि कांबली को ऐसा करने का अफसोस भी है। यकीन मानिए,न्यूज चैनल इस शो में सच बोलने की स्थिति को जिस रुप में ले रहे हैं,प्रोजेक्ट कर रहे हैं,उस पर गौर करते हुए सच बोलने आया पार्टिसिपेंट सदमे से मर जाए। सच बोलकर जो मानसिक तौर पर मजबूती मिलती है कि हमने प्रतिरोध के स्वर को मजबूत किया है,संबंधों को बीच अपने हिस्से की इमानदारी निभायी है,वो सब कुछ भी दिमाग में नहीं आएगा। एक नए किस्म का ग्लानि बोध पैदा होगा कि मैं क्या इतना गिर गया हूं कि एक करोड़ की खातिर वो सबकुछ भी देश के लोगों के सामने बेपर्द कर सकता हूं जो सच होने से पहले बहुत ही निजी अनुभव रहे हैं। छीः मैं इतना घटिया इंसान हूं। ऐसे में आम लोगों के बीच शेखर सुमन और जैकी श्राफ जैसे लोगों का कद पहले से और उंचा होगा जो कि एक करोड़ की चिंता किए बगैर सच बोलने से साफ मुकर जाते हैं। यहीं पर एक बार फिर से स्थापित होता है कि झूठे बने रहकर ही ज्यादा शान और आराम की जिंदगी संभव है। झूठ औऱ सच बोलने की स्थिति के बीच जो करोड़ रुपये को बीच में शामिल किया गया है वो सच को फिर से बौना करने की कोशिश है। न्यूज चैनल इसे और मजबूत करने में जुटे हैं।

ये कार्यक्रम अभी शुरु नहीं हुए हैं। आज रात से 10:30 बजे से शुरु होंगे लेकिन एक तो विज्ञापन स्ट्रैटजी औऱ दूसरा कि न्यूज चैनलों के बीच की खदबदाहट इस कार्यक्रम के लिए महौल बनाने में जुटे हैं। कल शाम से ही कांबली की बाइट सहित सचिन के साथ जोड़कर पैकेज पर पैकेज चलाए जा रहे हैं। ऐसे में शो का एक एंगिल जो बनने चाहिए कि 21 सवालों के जरिए एक इंसान के मनोविज्ञान को समझने की जो कोशिशें होगी,लाइ डिटेक्टर के जरिए इसे बाकी की रियलिटी शो से ज्यादा विश्वसनीय बनाने की कोशिशें होगी,वो सारा पक्ष दबता नजर आ रहा है। विदेशों में मोमेंट ऑफ ट्रूथ के नाम से प्रसारित इस शो को लेकर ये बताया जा रहा है कि इस शो ने कई घरों को बर्बाद किया है लेकिन स्टार प्लस की ऑफिसियल वेबसाइट ने इसे इंसानी जिंदगी की वो खिड़की कहा है जिससे अपने भीतर के मन को झांका जा सकता है,अपने को बेहतर और सुंदर बनाया जा सकता है। ये एक किस्म की साइकोथेरेपी है। इसके अलावे अगर सच बोलने पर कुछ सच सामने आते हैं तो उन चैनलों के स्टिंग ऑपरेशन से ज्यादा दिलचस्प और मतलब के होंगे जो कि चैनलों की कैंटीन को खाली करवाकर किए जाते हैं,उससे ज्यादा मजबूत होगा जो स्टिंग हो करके उसकी टेप चैनल की अर्काइव में खो जाते हैं,ऑन एयर नहीं होते। ये राजनीति,समाज,मनोविज्ञान,देश और दुनिया को समझने का एक बेहतर संदर्भ पैदा कर सकता है। समय-समय पर जब एक सामान्य व्यक्ति आकर 21 सवालों से गुजरेगा तो आप इसके जरिए एक औसत आदमी की मनःस्थिति को समझ सकेंगे।

लेकिन जैसा कि अभी से ही जो लक्षण दिखायी दे रहे हैं,उसमें इस शो के सकारात्मक दिशा में बढ़ने की गुंजाइश बहुत ही कम दिखती है। ये थोक के भाव में विवादों को जन्म देगा जिससे कि चैनलों को भरपूर मसाला मिलेगा। हर डेस्क के हाथ कुछ न कुछ लगेगा जिसे खींचकर दो-तीन तक दावत कर सकेंगे। आप देखिए न कि बालिका-वधू जैसे संभावना से लैस सीरियल संसद के गलियारों में जाकर इस आरोप से घिर जाता है कि इसने बाल-विवाह को बढ़ावा देने का काम किया है। पता नहीं,सच को सामने लाने की कोशिश में(जाहिर है टीआरपी और बिजनेस के लिए ही सही)इस शो से खुन्नस खाए कुछ लोग दंगा-फसाद करानेवाला कार्यक्रम न करार दे दें।