Monday, 2 March 2009

शाहरुख की एंजिल्स का वो क्या कर लेंगे



टेलीविजन पर होनेवाले लटके-झटके को देखकर और अक्सर बिना देखे ही कोसनेवालों की कमी नहीं है। लेकिन उस लड़की ने अपने नाचने के पीछे के मकसद को बताया तो इस लटके-झटके का एक नया अर्थ निकलकर सामने आया। उसका कहना था कि हमारे नाचने से खिलाडियों में जोश आता है, हम उनमें उत्साह भरना चाहते हैं। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए एक दूसरी लड़की ने कहा- हमारे नाचने से कई बार खिलाड़ी चौके,छक्के भी मारते हैं। खिलाड़ियों को हमारी जरुरत तब सबसे ज्यादा होती है जब वो थोड़े परेशान होते हैं, चीयर लीडर्स के रुप में ये लड़कियां इससे उबारने का काम करती हैं। इस नाचने में नए अर्थ के खुलने से विनोद दुआ की उस बात में बहुत दम नहीं रह जाता जो कि उन्होंने मुहावरे के तौर पर स्लमडॉग मिलेनियर को लेकर हिन्दुस्तानी जश्न के बारे में कहा था कि- आखिर हम भारतीय नाच-नाचकर इतना परेशान क्यों हैं। इसका जबाब मुझे कामेडी सर्कस में एक प्रतिभागी के मसखरई में मिलता है जिस पर चंकी पांडे ठहाके लगाते हुए उलटने-पलटने लग जाते हैं। एक गुजराती के घर क सांप निकला और वो पार्टी मनाने लगा। मतलब ये कि गुजराती को पार्टी मनाने के लिए बहानों की कमी नहीं है। इसे आप ये भी समझ सकते हैं कि गुजराती इतने सम्पन्न होते हैं कि बात-बेबात पार्टी मनने के लिए तैयार होते हैं। तो क्या हम ये मानकर चलें कि हिन्दुस्तान इतना सम्पन्न होता जा रहा है कि वो बात-बेबात पार्टी मनाने और नाच-नाचकर थक जाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यहां हम हिन्दुस्तानियों की समझ के बारे में कोई बात नहीं कर रहे।
टेलीविजन में अभी ये दौर तेजी से पनप रहा है जिसके तहत जो चीजें बकवास,फालतू,टाइमपास और लीजर पीरियड के लिए मानी जाती रही है, उसे एक शेप दिया जाए, उसे स्क्रीन पर उतारा जाए। इससे होता ये है कि ऑफिस में कीपैड घिसते हुए, बच्चों औऱ पतियों के बीच जीवन हलाल करती हुई फीमेल ऑडिएंस इससे तेजी से जुड़े। इसलिए आप देखेंगे कि टेलीविजन में लगी पूंजी का एक बड़ा हिस्सा डोमेस्टिक इवेंट या फिर टाइमपास कारनामों को बतौर प्रोग्राम की शक्ल देकर तैयार करने में लगाया जा रहा है। इस लिहाज से जो चीजें डोमेस्टिक नहीं है विवादों में है, उसे सबसे पहले डोमेस्टिक टच दिया जाना जरुरी समझा जाता है।

आइपीएल की शुरुआत के साथ ही हिन्दुस्तान में चीयर लीडर्स का कॉन्सेप्ट शुरु हुआ। इसके पहले भी किसी इवेंट के शुरु होने के पहले सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन होता रहा है। लेकिन कॉन्सेप्ट वेस्ड होकर डांस कराने का रिवाज भारत के लि नई चीज रही। छोटी-छोटी स्कर्ट पहने, हाथ में रंग-बिरंगे प्लासटिक की रिबनों के झूमर लिए जब चैन्नई, दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में लड़कियों ने परफार्म( नाचना) शुरु किया तो एकबारगी ऐसा लगा कि क्या हिन्दुस्तान में भी आम दर्शकों के लिए ये सबकुछ मयस्सर है। ऐसे मौके पर दिल्ली या मुंबई मेट्रो न होकर एक खिचड़ी प्रदेश हो जाता है क्योंकि इसमें सिर्फ मेट्रों की शर्तों की भीड़ नहीं होती। अंधेरे में लाल-पीली रोशनियों के बीच इस तरह से लड़कियों का नाचना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन यही सब कुछ आम दर्शकों के लिए भी मुहैया हो गया औऱ एक्सक्लुसिवनेस टूटा तो जमकर विरोध शुरु होने लगे। लोगों ने हमेशा की तरह इसे संस्कृति का खतरा बताया, अपसंस्कृति का हिस्सा बताया, देश को नष्ट होने औऱ भ्रष्ट होने की बात की। इसमें मजेदार बात हुई कि जो क्रिकेट प्रेमी भी रहे वो भी चीयर लीडर्स के विरोध में अपने बयान देने लगे। जिस क्रिकेट में इंडियननेस पैदा करने औऱ दिखाने की मुहिम चली उसी के बीच से पाश्चात्य संस्कृति का लगाकर फिर से विरोध शुरु होने लगे। आइपीएल की सफलता औऱ इसकी राजनीति में न भी जाएं तो इतना साफ है कि देश की ऑडिएंस ने चीयर लीडर्स कॉन्सेप्ट को नहीं सराहा।
इस चीयर लीडर्स विरोधी ऑडिएंस के बीच में एनडीटीवी इमैजिन ने पिछले शनिवार( रात दस बजे) से नाइट्स एंड एंजिल्स नाम से रियलिटी शो की शुरुआत की है। इसमें शाहरुख की टीम नाइट राइडर्स के लिए चीयर लीडर्स की तलाश होगी, उसे चुना जाएगा। देशभर से चौबीस लड़कियों को चुना गया है। सबों को छह-छह की ग्रुप में लाल, हरा, नीला और पीला रंग टीम के रुप में अलग किया गया है। जज के तौर पर सौरभ गांगुली, अनुष्का शर्मा( जिससे होता है हौले-हौले प्यार) और थर्ड एम्पायर जज के तौर पर मुरली कार्तिक की बहाली हुई है। ये जज कई तरह के सवाल करते हैं, कमेंट देते हैं। सवाल पूछते हैं कि- आप जब चीयर लीडर्स के लिए आ रही थीं तो आपके फादर ने आपको कुछ नहीं कहा। मध्य वर्ग से आई लड़की ने जबाब दिया नहीं, बिल्कुल भी नहीं। मैं अपने ममा-पापा की शुरु से चीयर लीडर्स रही हूं, अब वो चाहते हैं कि मैं देश की चीयर लीडर बनूं। गजब का कॉन्फीडेंस, गजब का खुलापन दिखा। उन अंध संस्कृतिवादियों पर झन्नाटेदार तमाचा कि लो देखो। न देश की स्त्रियों के सम्मान में कुछ बट्टा लग रहा है औऱ न ही उनके गार्जियनों की नाक कट रही है। एकदम मुहावरा फिट है- जब मियां बीबी राजी तो क्या करेगा काजी। इसे आप टेलीविजन का असर है कहें, ये शाहरुख खान का असर है कहें, जो मन में आए कहें. लेकिन टेलीविजन किसी भी चीज को कैसे डोमेस्टिक बनाता है, उसे तो आप बेहतर महसूस कर ही रहे हैं। इसे कहते हैं हो-हंगामें का टेलीविजन वर्जन जहां आते ही सबकुछ मनोरंजन का हिस्सा बन जाता है। आखिर हम और आप जैसे संस्कृति विमर्श करनेवाले लोग भी तो देख ही रहे हैं न सबकुछ। अभी तो वोटिंग लाइन भी खुलनी बाकी है, तब और साफ हो जाएगा कि संस्कृति बचानेवाले जो लोग उपद्रव कर रहे हैं वो किससे के लिए कर रहे हैं, उन्हें खुद ही पता नहीं है। इसे बेमतलब की हुज्जत और बदलाव जल्द ही करार दिया जाएगा।

2 comments:

  1. प्रभावी विश्‍लेषण. वैसे भी अब टेलीविज़न से घिन मानने वाले रह ही कितने गए हैं.

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  2. विनीत जी जहां तक मेरा निजी सवाल है मेरा मानना है कि कुछ लोगों छोकरियों के छोटे स्कर्ट पहन कर नाच लेने से हमारी कथित उच्च भावों वाली संस्कृति खंडिय नहीं हो जाएगी। खंडित तो तभी हो जानी चाहिए थी, जब कुछ लोग निर्दोषों पर हमला करें, आपस में रंजिश की भडा़स दंगों में निकालें, लड़कियों पर हमला करें। तालिबानिज्म या बजरंगीपन हमारी संस्कृति नहीं है। और न ही उन्हं हमारी संस्कृति की रक्षा का ठेका दिया गया है। विनीत जब भी किसी किस्म का बदलाव आता है समाज में, ऐसे शुचितावादी हो-हल्ला करते ही हैं अपसंस्कृति, अश्लील। महज ध्यानाकर्षण के लिए। हम उन पर ध्यान न दें तो आप ही आप फुस्स् हो जाएँगे।

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