Friday, 22 May 2009

न्यूज चैनलों के लिए कैसे-कैसे आम आदमी



न्यूज चैनलों को याद आता है आम आदमी का अगला और अंतिम हिस्सा

इन सबसे अलग देश के आम आदमी की एक तीसरी तस्वीर भी है जिसे कि चैनल अक्सर प्रमुखता से दिखाते हैं वह है भावावेश में आकर अपनी ही प्रत्याशी को पीटनेवाली जनता। चैनल यहां आकर हाइपर डेमोक्रेसी पैदा करने की कोशिश करते हैं.( कांग्रेस प्रत्याशी और मंत्री कल्याण काले की पिटाई,एनडीटीवी इंडियाः 9.01 बजे, 3 मई 09)। तकदीर बदलनेवाले नेताओं के समर्थन में कार्यकर्ता बनकर सड़क जाम करनेवाली आम जनता है।( जय श्रीराम के नारे लगा रहे वरुण के समर्थकों ने सड़कों को जाम करने की कोशिश की ताकि पुलिस को आने से रोका जा सके। न्यूज 24: 8.04 बजे,28 मार्च 09). 30 रुपये में कांग्रेस और बीजेपी नाम से सियासी पान खाने और बेचनेवाली जनता है।( पांच कांग्रेस का पान देना भाई. पान चबाओ,बटन दबाओ, अजमेरः आजतक,12.55 बजे रात,26 अप्रैल 09)। और सलमान खान जैसे सिलेब्रेटी को चुनाव मैंदान में देखने के लिए संकरे मुंडेर पर चढ़ जानेवाली जनता है। ये सब देश की उसी आम जनता की तस्वीर है जिससे चुनाव आयोग लगातार अपील करती आ रही है कि इस बार पप् मत बनिए,वोट कीजिए।

राजदीप सरदेसाई के शब्दों में कहें तो – मीडिया केवल लोगों के सामने आईना में आपका चेहरा दिखा रही है। अगर वो चेहरा आपको अच्छा नहीं लगे तो ये आपकी बात है।( IBN7: 8.08 बजे,28 मार्च 09)। मौके पर तो यह बात राजदीप ने राजनीतिक व्यक्तियों के लिए कही लेकिन यह बात क्या आम जनता की तस्वीर के मामले में भी उसी रुप में लागू होती है ? कांग्रेस के राजनीतिक विज्ञापनों द्वारा आम जनता की जो तस्वीर दिखाई जा रही है उससे न्यूज चैनलों को असहमति है। उनके लिए यह पाखंड से ज्यादा कुछ भी नहीं है,इसलिए तमाम न्यूज चैनलों की कोशिश है कि आम आदमी के उन घिसे-पिटे चेहरे को सामने लाएं जो चमकदार छवि के बरक्स सच की छवि स्थापित कर सके, वो ऑडिएंस को बता सके कि ये है देश के आम आदमी की तस्वीर। अपने इस प्रयास में न्यूज चैनल लगातार धारावी के चक्कर लगा रहे हैं, बिहार के इलाकों में कहिए नेताजी के तहत साहस से राजनीति का सच सामने ला रहे हैं। आप कह सकते हैं कि ये सारे चैनल उन विज्ञापनों से होड़ कर रहे हैं, उन्हें पटकनी देने की जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं जहां सब कुछ जय हो के रुप में दिखाया जा रहा है। ये विज्ञापन और चैनलों, सॉरी पत्रकारों के बीच की सीधी लड़ाई है।

लेकिन एक स्थिति यह भी है कि चैनल जब बता रहे होते हैं कि बिहार में पिछले पन्द्रह सालों में कोई भी विकास का काम नहीं हुआ, आजादी के साठ साल बाद भी धारावी पहले की तरह ही बेहाल है, ऐन वक्त पर कॉमर्शियल ब्रेक हो जाता है और फिर से विज्ञापन शुरु हो जाते हैं- आम आदमी के बढ़ते कदम,हर कदम पर भारत बुलंद। ऐसे ही मौके पर अभी तक देखी जानेवाली आम आदमी की सारी खबरें झूठ जान पड़ती है। ऐसा लगता है कि चैनल ने एक खास मौके को ध्यान में रखकर देश के घिसे-पिटे चेहरे और हालातों को बटोरने की कोशिश की है। पिछले दो महीने से विज्ञापन और न्यूज चैनलों के आम आदमी के बीच सांप-सीढ़ी का खेल जारी है। अब तो खुद न्यूज चैनल भी अपने इस आम आदमी को ढ़ोते-ढ़ोते उब गए हैं। स्टार न्यूज के सिद्धार्थ को लगने लगता है कि इस खबर के बीच आइपीएल ज्यादा हावी होने लग गया है। जी न्यूज उबकर नैनो युग में पहुंचने का एलान कर देता है। चैनलों की ओर से एक गुपचुप घोषणा कर दी जाती है कि तरक्की आम आदमी के वोट से नहीं,नैनो और आइपीएल से है। अब स्क्रीन पर से आम आदमी छंटने लग जाते हैं. यहां आकर आपको सहज ही अंदाजा लग जाएगा कि जिन खबरों को वो दिखा रहे हैं, खुद उनका मन भी इसमें ज्यादा देर तक नहीं लगता। इसलिए खबर दो पाटों के बीच बंट जाती है- आइपीएल( इंडियन प्रीमियर लीग) वर्सेज आइपीएल( इंडियन पॉलिटिकल लीग)।

इस पूरे मामले में देश के किसी भी टेलीविजन पत्रकार से आप सवाल करने की स्थिति में नहीं हैं कि अगर ये सारे विज्ञापन झूठे हैं तो आप इसे क्यों दिखा रहे हैं? मौजूदा मीडिया की संरचना को देखते हुए, सवाल करने के पहले आप को खुद ही समझना चाहिए कि विज्ञापनों का दिखाया जाना पत्रकारिता का हिस्सा नहीं, यह तो मैंनेजमेंट और मार्केटिंग का हिस्सा है,इसमें पत्रकारों की कहीं कोई दखल नहीं है। ऐसे में देश के पत्रकार किसी भी तरह के आरोप से बरी हैं। लेकिन इनके हिला देनेवाले अंदाज में खबर देखने के तुरंत बाद विज्ञापन में आम आदमी को देखकर एक सवाल तो मन में आता ही आता है कि कहीं हमें एक ही चैनल पर आम आदमी की दो तस्वीरें क्यों दिखाई जा रही है। क्यों हर पांच-सात मिनट के बाद अड़ा,तना और डटा पत्रकार कांग्रेस,बीजेपी और बसपा को अपना-अपना राग अलापने के लिए ब्रेक पर चला जाता है ? एक डर भी बनता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि आनेवाले समय में आम आदमी पर “आम आदमी” हावी तो नहीं हो जाएगा?

1 comment:

  1. क्या खूब लिखा है श्री मान, ठीक कहा आपने. आज जिस तेजी से मिडिया समाज को बदलना चाहता है उसी तेजी से उसके प्रति सवाल खड़े हो रहे है की वो क्या दिखाना चाहता है और क्या दिखा रहा. इसमें न्यूज़ चैनल की भूमिका भी संदिग्ध है . में भी कुछ ऐसी ही गुफ्तगू करता हूँ. आपका भी मेरे ब्लॉग पर स्वागत है . www.gooftgu.blogspot.com

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