Saturday, 27 June 2009

एस.पी.सिंह ने पत्रकारिता में नस्लभेद को खत्म किया- आशुतोष,IBN7


कल यानी 27 जून को संवादधर्मी टेलीविजन के जनक एस.पी.सिंह की बारहवीं पुण्यतिथि का आयोजन प्रेस क्लब में किया गया। एस.पी.सिंह की याद में मीडिया मंत्र ने उन पर एक विशेषांक निकाला जिसका लोकार्पण भी किया गया। इस मौके पर एक तरफ टेलीविजन पत्रकारिता से जुड़े पुण्य प्रसून वाजपेयी,अजीत अंजुम,आशुतोष और सुमित अवस्थी जैसे चर्चित चेहरों की मौजूदगी ने महौल में गर्माहट पैदा की, एस.पी.सिंह के दौर के बुजुर्ग पत्रकारों के वक्तव्यों ने आज की पत्रकारिता पर सवाल खड़े करने का जिम्मा उठाया तो दूसरी तरफ इन सबों को सुनने के लिए नए पत्रकारों औऱ मीडिया छात्रों की मौजूदगी ने, दीवारों पर नोटबुक रखकर वक्ताओं की बातों को नोट करते रहने की दीवनगी ने ये साफ कर दिया कि कायदे की बात की जाए तो उसे सुनने-समझने और इसके जरिए अपने को बेहतर करने की ललक नए लोगों के बीच से अभी खत्म नहीं हुई है। पत्रकारिता करते और सीखते हुए अभी भी एक तबका बचा है जो वाकई बदलाव की छटपटाहट के लिए इस प्रोफेशन से जुड़ा है।
एस.पी.सिंह जैसे पायनियर पत्रकारों की जब कभी भी चर्चा होती है तो मौजूदा पत्रकारिता के मूल्यांकन करने का भी काम साथ-साथ चलता है। कल भी ऐसा ही हुआ। एस.पी.सिंह की यादों में डूबते-उतरते जितने भी वक्ताओं ने अपनी बात कही,उनमें कहीं न कहीं आज की पत्रकारिता को विश्लेषित करने की योजना साफ तौर पर नजर आयी। ये अलग बात है कि कुछ लोग कोरी नैतिकता से लदी-फदी भाषा और विचार के साथ हमारे सामने आए तो कुछ वक्ताओं ने व्यावहारिक तौर पर मीडिया आलोचना की हमारी समझ को दुरुस्त किया। हम जैसे मीडिया रिसर्चर औऱ स्टूडेंट के लिए मौके-मौके पर इन लोगों के विचारों को जानते रहना अनिवार्य है। मीडिया के जो भी स्टूडेंट अपने निजी कारणों से कल नहीं पहुंच पाए,उनके लिए सीरिज में मैं महत्वपूर्ण वक्ताओं के वक्तव्य को अविकल प्रस्तुत कर रहा हूं। इसे मैंने पहले टेप किया है और फिर धीरे-धीरे ट्रांसक्राइव कर रहा हूं इसलिए साथियों से अनुरोध है कि इसका किसी भी रुप में व्यावसायिक प्रयोग करने के पहले हमें जरुर खबर करें।


इस कड़ी में पेश है,आशुतोष,मैनेजिंग एडीटर IBN7 के संस्मरण और टीवी पत्रकारिता को लेकर उनके व्यक्तिगत अनुभव

एस.पी. के साथ मैंने बहुत ज्यादा काम नहीं किया है,डेढ़ साल मैंने काम किया है और ये डेढ़ साल मैंने आजतक में काम किया है। बहुत सारी चीजें हैं जिनके बारे में बात तो होती है। किसी भी चीज के बारे में बहुत कुछ कहा जा सकता है और कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। हमारे समाज के साथ दिक्कत ये है कि खासकर हिन्दी पत्रकारों की की दिक्कत ये है कि बिना सेंट्रिक हुए,बिना सिनिक हुए किसी का मूल्यांकन करना नहीं चाहते। हम बनाएंगे तो किसी को खुदा बना देंगे,भगवान बना देंगे,नहीं तो ऐसा पीटेंगे...। या तो पत्रकारिता है या पत्रकारिता नहीं है। या तो पत्रकारिता में इतना कूड़ा भर गया कि जो पिछले दो साल में भी नहीं भरा था। या एस.पी.सिंह इतने बड़े भगवान हैं कि उनके सामने कुछ भी आलोचना कर दीजिए,उनका मूल्यांकन कर दीजिए तो आप असली पत्रकार नहीं हैं। शायद हम अंदर के आक्रोश को कम करते हुए विशुद्ध रुप से भरतीय परंपरा में जो वाद-विवाद संवाद की जो स्थिति है जिस पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचे,बिना किसी निर्णय के पहुंचे अगर अपनी बात को ठीक से रख सकें तब मूल्यांकन हो सकेगा। ऐसा नहीं है कि एस.पी.सिंह के अंदर कमियां नहीं थी। ऐसा नहीं है कि किसी ने कह दिया कि एस.पी.सिंह मनोरंजन के साथ खबरों को पेश करना चाहते थे तो कुछ गलत कह रहा है। लेकिन हमारी सत्यता में,हमारी परंपरा में अतिरेक के लिए जगह नहीं है,सरेंडर के लिए जगह है। शंकराचार्य के बाद जो पूरा भक्ति आंदोलन है उसमें व्यक्ति के गुणों से खुश होकर और उसकी ईमानदारी के प्रति अपने आप को सरेंडर कर सकते हैं। लेकिन उस सरेंडर में ये अधिकार है, पूरी दुनिया में भारत में अकेली ऐसी परंपरा है जहां ईश्वर के सामने भी खड़े होकर वाद-विवाद संवाद कर सकते हैं,उनके सामने खुलकर आलोचना कर सकते हैं।

लेकिन मुझे यहां बैठे-बैठ अचानक ये ध्यान आ रहा था कि हमारे अंदर लोकतंत्र का उतना भाव नहीं है। एस.पी.को समझने के लिए तीन चीजें समझनी पड़ेंगी। पहली बात मैंने उनके साथ डेढ़ साल तक काम किया। लेकिन हिन्दी पत्रकारिता में कहीं क्रांति की शुरुआत हुई तो वो आजतक के साथ हुई। हिन्दी पत्रकारिता अगर आधुनिक हुई तो एस.पी.के साथ शुरु हुई,हिन्दी पत्रकारिता अगर प्रोफेशन हुई तो वो एस.पी.के साथ हुई और पत्रकारिता के अंदर नस्ल भेद खत्म हुआ तो वो एस.पी. सिंह के साथ खत्म हुआ।

चार मेरी अवधारणाएं हैं,बहुत लोगों को इससे आपत्ति हो सकती है,होनी चाहिए। लेकिन उसको अगर हम संवेदना के धरातल पर विवेक का इस्तेमाल करते हुए,अगर वाद-विवाद करना चाहते हैं तो संभव है। लेकिन कोई आक्रोश के साथ हमले और आक्रमक होना चाहे तो संभव नहीं है,कम से मैं तो नहीं करना चाहूंगा। एस.पी का जो सबसे बड़ा कन्ट्रीव्यूशन था कि नब्बे के दशक में जो हिन्दी पत्रकारिता की जो स्थिति थी वो इतनी दैन्य स्थिति थी कभी-कभी लगता है,जब मैं पत्रकारिता में आया तो डेढ़ साल तक मेरे पिताजी ने बात तक नहीं की। उनके सामने पत्रकार की इमेज ऐसी थी कि वो अपने बेटे को पत्रकार बनते हुए देखना नहीं चाहते थे,ठीक से बात तक नहीं करते थे। सपनों में,ख्बाबों में अपने बेटे को एक आइएस के रुप में देखा था। इसमें पावर था,शहर में कुछ भी कर सकता था। 1500 रुपये तनख्वाह थी,जोला छाप,टुटहा चप्पल औऱ मुंह में पान और कहीं भी पीक करने की हमारी जो परंपरा थी, हम किसी भी नेता के पीछे भाग लिया करते थे।

एस.पी.के साथ जब मैं पहली बार मिला,आजतक के दफ्तर तो उन्होंने मुझसे कहा कि- देखो,मैं यहां आ तो गया हूं लेकिन मुझे यह रेलवे स्टेशन नजर आता है,कुलियों के बीच आ गया हूं। मुझे इसको बदलना है। क्योंकि अंग्रेजी पत्रकार हिन्दी के पत्रकार के प्रति हेय दृष्टि रखेगा, अंग्रेजी न बोल पाने के कारण कुंठित रहेगा,तो इससे हिन्दी पत्रकारिता का भविष्य नहीं बन सकता। मुझे लगता है कि इसे बदलना चाहिए और ये बदलेगा। ये हालत ये थी कि मैं भी अंग्रेजी ठीक से बोल नहीं पाता था और मेरे अंदर भी ये कुंठा भाव थी कि अगर अंग्रेजी नहीं बोल पाउंगा तो देश का लब्ध प्रतिष्ठित पत्रकार नहीं बन पाउंगा,लोग मेरी इज्जत नहीं करेंगे। एस.पी. का कहना था कि हिन्दी के पत्रकारों में सब संभव है,जितना वो जड़ से जुड़ा है,जितना उसको अपने समाज की समझ है और जितना वो संघर्ष के साथ खबरों को निकालकर ले आता है,जितना वो शब्दों की लड़ाई लड़त सकता है, वो अंग्रेजी का पत्रकार कभी नहीं करता। उन्होंने ये भी कहा कि जितनी भी बड़ी खबरें होती हैं वो किसी न किसी छोटे पत्रकार या अखबार की चुराई खबरें होती हैं। उसको किसी बड़े अखबार में छाप देने पर वो खबर राष्ट्रीय हो जाती है और अचानक उसको पूरा समाज नोटिस लेने लग जाता है। ये है पॉवर ऑफ लैंग्वेज और हमें भाषा की इस ताकत को तोड़ना है। भाषा वो नहीं होनी चाहिए जिसको चंद लुटियन जोन्स के लोग बोलते हों और वो राष्ट्रीय भाषा कहलाए। भाषा वो होनी चाहिए जिसको कि आम आदमी भी समझ सके,जिसको मिर्जापुर में रहनेवाला भी आसानी से समझ जाता हो औऱ जिसको लुटियन जोन्स में रहनेवाले मंत्री महोदय को भी समझ में आती हो। तो भाषा की ताकत उसके रंग से तय नहीं होनी चाहिए बल्कि उसके साथ कितने अधिक से अधिक लोग जुड़े हैं,उनमें कितनी संवेदनाएं हैं उससे तय होनी चाहिए। और आनेवाले डेढ़ साल के अंदर उन्होंने इस बात को साबित कर दिया कि अगर आप किसी कमिटमेंट के चीजों साथ आगे बढ़ाते हैं तो वो असर करेगा।

वो नस्लवाद था। अंग्रेजी बनाम हिन्दी का नस्लवाद था जिसको कि एस.पी. ने डेढ़ साल के अंदर तोड़ दिया। मैं इस बात को फक्र के साथ इसलिए भी कह सकता हूं कि जब मैंने ज्वायन किया था आजतक तो मैं उस दीवार को शिद्दत के साथ महसूस करता था कि अंग्रेजीदां पत्रकारों की किस तरह की हैसियत हुआ करती थी और हिन्दी के पत्रकार किस तरह की कुंठा में जीया करते थे जो महज चार-पांच महीने के अंदर वो दीवार टूटने लगी और टूटने के बाद हमने अचानक देखा कि आजतक खबरों का इतना बड़ा सिंबल हो गया कि जैसे वनस्पति घी में डालडा हो गया कि जैसे एक जमाने में लाइफब्ऑय हो गया था जैसे पानी में विसलरी हो जाया करता है,खबर और आजतक बिल्कुल एक हो गए. और वो इसलिए नहीं हुआ कि उसके साथ भाषा जुड़ गयी बल्कि इसलिए हुआ कि उसके साथ आधुनिकता जुड़ गयी। उस प्रोफेशनलिज्म के साथ एक कमिटमेंट जुड़ गया। वो एक कमिटमेंट की भाषा बन गयी। उस भाषा के साथ ऐसे लोग जुड़ गए जो बहुत कमिटेड थे। जब आइने में ढाला गया उस भाषा को,जब उसको टीवी के सामने रखा गया तो शब्दों का एक नया संसार आया,शब्दों की एक नयी दुनिया सामने आयी और वो शब्दों की दुनिया खबरों का एक बहुत बड़ा ब्रांड बन गया। तो उन्होंने इस भाषा को खबरों का इतना बड़ा ब्रांड कर दिया कि उसके समकक्ष अंग्रेजी का ब्रांड था वो पीछे हो गया और अचानक आजतक का जो पत्रकार था वो उसी बिल्डिंग के अंदर अपने आप को इतना ताकतवर महसूस करने लगा कि जिसको डेढ़ साल पहले देखकर डरता था,भयभीत हुआ करता था,अचानक उसी दफ्तर के अंदर मुझको देखने का नजरिया,सम्मान का नजरिया बदल गया और मुझे कभी इस बात का एहसास नहीं हुआ कि मैं हिन्दी में हूं या अंग्रेजी में हूं। अंग्रेजी के लोगों के बारे में लगता था कि ये तो ऐसे ही हैं,फालतू हैं,इनको कुछ आता-जाता नहीं है। और भी लोगों का नजरिया बदला कि ये तो हवाबाज हैं,इनको कुछ नहीं आता-जाता। ये बदलाव था और मैं गर्व के साथ कह सकता हूं कि एस.पी. ने हिन्दी में टेलीविजन पत्रकारिता को रिडिफाइन किया। उससे प्रतिष्ठित बनाया,प्रोफेशनल बनया,भाषा को इज्जत दी जो कभी नहीं हुआ करती थी। मुझे याद है कि अंग्रेजी के बड़े-बड़े पत्रकार शाम के वक्त फोन करके और हिन्दी के बड़े पत्रकार फोन करके पूछते थे कि आज की हेडलाइन क्या है और बताया करते थे। आफ देख सकते थे कि अंग्रेजी की जो बुलेटिन हुआ करती थी वो हिन्दी के समकक्ष हुआ करती और उसकी भाषा में हिन्दी की संस्कार मिलने लगा था और कुछ लोगों के मन में हसरत रह गयी,किसी का नाम नहीं लेना चाहूंगा लेकिन कि जब भी कोई कैमरा बाहर निकले तो लोग कहें कि ये फलां का कैमरा है। लेकिन लोग हमेशा कहते-आजतक वाले हैं,आजतक वाले हैं।
आजतक की लोकप्रियता इस मुकाम पर पहुंच गयी थी कि मैं बता सकता हूं,जम्मू कश्मीर में विधान सभा चुनाव होनेवाले थे और मैं वहां गया हुआ था। फारुक अबदुल्ला की कन्सटीचुएंसी में पीटीसी कर रहा था,एक साल काम करते हुए थे मुझे आजतक में औऱ जब मैं वहां खड़ा हुआ तो एक बिल्कुल ही छोटा बच्चा,आप सोचिए- जम्मू कश्मीर में दांदरवल,दांदरवल में एक छोटा सा बच्चा,वो अचानक कैमरे के सामने आया औऱ बोला- आजतक,आशुतोष दिल्ली आजतक और मैं बिल्कुल चमत्कृत था तो ये उस भाषा की ताकत थी। वो खबर की ताकत थी और वो इसलिए नहीं हो पायी कि एस.पी.सिंह ने उसको प्रोफेशनलाइज किया,मॉर्डनलाइज किया। बल्कि उन्होंने उस दीवार को तोड़ा.....

आशुतोष का एस.पी.सिंह से जुड़े संस्मरण और हिन्दी टेलीविजन पत्रकारिता की बदलती शक्ल पर उनके व्यक्तिगत विचार औऱ अनुभव आगे भी जारी।......

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