Monday, 6 July 2009

आम आदमी की चिंता में बजट को आम बनाते न्यूज चैनल्स



केन्द्र में आम आदमी की चिंता करनेवाली सरकार बनने के साथ ही न्यूज चैनलों की जुबान पर आम आदमी मुहावरे की तरह चढ़ गया है। ग्लैमर,फैशन और मनोरंजन से जुड़ी खबरों को छोड़ दें तो बाकी ऐसी कोई खबर नहीं होती जिसमें कि हिन्दी के चैनल्स आम आदमी शब्द का प्रयोग नहीं करते। न्यूज चैनलों की ओर से अगर ये कहा जाए कि- हम आम आदमी ओढ़ते और बिछाते हैं,ख़बरें हम आम आदमी के लिए दिखाते हैं तो कुछ गलत नहीं होगा।

सरकार को आम आदमी के प्रति इतनी चिंता इससे पहले कभी दिखी हो या नहीं,ये राजनीतिक विश्लेषक बेहतर तरीके से बता सकते हैं लेकिन न्यूज चैनलों के मामले में ये बात दावे के साथ की जा सकती है कि पिछले छह महीने में न्यूज चैनलों में आम आदमी,आम आदमी की चिंता जितनी बार रिपीट होते आ रहे हैं,उससे पहले कभी नहीं हुआ। मीडिया विश्लेषक जो कि टेलीविजन से लगातार सामाजिक सरोकार की मांग करते आए हैं,उन्हें इस बात से खुश होना चाहिए कि खबरों में अब आम आदमी(शब्द या फिर संदर्भ इस बहस में न जाएं तो) को ठीक-ठाक स्पेस मिल रहा है। इसलिए न्यूज चैनलों को इस शिकायत से बरी कर देना चाहिए कि वो आम आदमी की बात नहीं करते,आम आदमी के लिए बात नहीं करते। ये काम उन्होंने चुनाव से दो महीने पहले ही शुरु कर दिया था। लेकिन बजट के मामले में आम आदमी का मुद्दा उठाने का मकसद सिर्फ इतने भर से है कि अब न्यूज चैनल न सिर्फ आम आदमी की बात करने लग गए हैं बल्कि आम आदमी की तरह बात करने लग गए हैं। स्टूडियों में बैठकर वो अपने को खास मानने के बजाय आम बताने लगे हैं...इतना आम कि आपको उनकी बातों को सुनकर लगे कि-ये तो हमारे बीच का, हमारी ही लाइफ स्टाइल में जीनेवाला बंदा है। चैनलों की ओर से खबरों की प्रस्तुति को लेकर इससे ज्यादा लोकतांत्रिक रवैया शायद ही कभी दिखा हो। यहां पर मुझे लोकतंत्र को लेकर लिंकन की ओर से दी गयी परिभाषा याद आ रही है- लोकतंत्र जनता द्वारा,जनता के लिए,जनता का शासन है। इसमें अगर आप लोकतंत्र की जगह न्यूज चैनल और जनता की जगह आम आदमी या आम दर्शक कर दें तो एक आदर्श स्थिति आपके सामने है। बजट 2009 को आम आदमी के देखने लायक कैसे बनाया गया। इसे आप भाषा से लेकर प्रस्तुति,मुद्दे और विमर्शों को लेकर समझ सकते हैं।

IBN7 पर आशुतोष और संदीप चौधरी बजट से पहले की अटकलों से जूझ रहे हैं। टैक्स और सरकारी सुविधाओं को लेकर जो भी गड़बड़ झाला है उसकी गुत्थियों को बिजनेस और इकॉनमी स्पर्ट के सहयोग से सुलझाने की कोशिश में हैं। संदीप चौधरी का कहना है कि हमारे ऑफिस के सामने जो करोड़ों रुपये की लागत से जो अंबेडकर पार्क बन रहा है, उसे क्यों बनाया जा रहा है, करोड़ों रुपये के बुत क्यों बनाए जा रहे हैं, उसकी जगह स्कूल,अस्पताल,आवास और जनता के लिए बाकी चीजें क्यों नहीं बनवाए जा रहे,मुहैया कराए जा रहे। इस पर आशुतोष की टिप्पणी है- क्योंकि हम स्टूडियों में ही बैठे रह जाते,वहां जाकर हम इसका विरोध नहीं करते। इस बातचीत से ये मुद्दा सामने आया कि हम जो टैक्स देते हैं,हमें चाहिए कि सरकार से उसका हिसाब मांगे। सिविल सोसायटी जब तक सक्रिय नहीं होगी,तब तक विकास का काम नहीं होगा। मैनेजमेंट गुरु अरिंदम चौधरी ने विदेशों के हवाले से कहा कि वहां तो लोग इस मामले में काफी सक्रिय हैं।
संदीप चौधरी के मन में दूसरा सवाल कुलबुलाता है- अब देखिए, अगर हम अपनी पत्नी को गिफ्ट दें तो टैक्स लगेगा जबकि दूसरी की पत्नी को दें तो कोई टैक्स नहीं,ये क्या है। इस पर मुंबई में बैठे एक्सपर्ट के साथ-साथ आशुतोष ने भी चुटकी ली कि सरकार भी चाहती है कि आप अपनी पत्नी को गिफ्ट न दें। आपकी पत्नी भई अभी टेलीविजन देख रही होगी।
कहानी ये है कि बजट को कुछ इस तरह से पेश किए जाएं कि एक आम दर्शक को भी इसमें अपने मतलब की बात समझ में आए। शायद इसी एजेंडे को ध्यान में रखकर IBN7 ने बालिका वधू की आनंदी को स्क्रीन पर उतारा और दर्शकों को बताने की कोशिश की कि आनंदी प्रणव अंकल से क्या-क्या मांगेगे। आनंदी अपनी उम्र से कहीं ज्यादा मैच्योरिटी दिखाने की कोशिश में पढ़ाई,शिक्षा के साथ-साथ स्पोर्टस की सुविधाओं की भी मांग की औऱ लॉजिक दिया कि तभी तो यहां के लोग भी ओलंपिक में ट्राफियां ला सकेंगे।

टेलीविजन के औऱ पत्रकारों के मुकाबले पुण्य प्रसून वाजपेयी की जुबान पर आम आदमी,बुनायादी ढांचा,सामाजिक सरोकार और गरीब तबका जैसे साहित्य औऱ प्रिंट मीडिया के बीच के मिले-जुले शब्द ज्यादा रहते हैं। एक तरह से उनकी ब्रांडिंग भी इन्हीं सारे शब्दों के प्रयोग को लेकर हुई है इसलिए अब सुनना एक आदत सी हो गयी है। सुनकर कहीं से अटपटा नहीं लगता कि टेलीविजन का पत्रकार ऐसा बोलकर पाखंड क्यों रच रहा है औऱ न ही वरिष्ठ पत्रकारों की तरह सवाल करने का मन होता है कि क्या टेलीविजन के पत्रकारों को गरीबों,वंचितों औऱ शोषित लोगों पर बात करने का अधिकार है। पुण्य प्रसून के मामले में हम अभ्यस्त हो चले हैं कि वो चाहे जिस भी चैनल में हो सरोकार शब्द का प्रयोग करेंगे,ये अलग बात है कि वो संदर्भ के कितने माकूल होते हैं।

लेकिन न्यूज24 पर जब इसी आम आदमी की स्टोरीलाइन पकड़कर बात शुरु होती है तो अंजना कश्यप और सईद अंसारी के भाषा प्रयोग से ये आम आदमी गांव में खाद औऱ बीज के लिए जुगत भिड़ाता आम आदमी न होकर शहर का वो आम आदमी हो जाता है जिसे कि कार औऱ फ्लैट के लिए लोन चुकाने हैं। वो आम आदमी है जो विदर्भ के किसानों की तरह आत्म हत्या तो नहीं करता लेकिन शहर में रहकर इन्सटॉलमेंट में मरता रहता है। यहां पर आपको आम आदमी को नए सिरे से डिफाइन करने की जरुरत पड़ जाती है। आपको फिर से समझना होता है कि आखिर आम आदमी में शामिल कौन-कौन से और किस वर्ग के लोग शामिल हैं। दरअसल कांग्रेस गठबंधन ने आम आदमी का प्रयोग करके इन न्यूज चैनलों के लिए आम आदमी नाम से एक ऐसा पिपरमिंट दे दिया जो कि हर समस्याग्रस्त नागरिक के साथ जोड़ा जा सकता है। देश का चाहे जो भी नागिरक हो अगर परेशानी में है तो चैनल उसके लिए आम आदमी का प्रयोग कर सकता है। लेकिन इसमें भारी गड़बड़ी हुई है कि हैसियत और सुविधा के स्तर पर जो वर्ग बंटे हैं और अब तक उसीक के अनुरुप लोगों को समझने की कोशिशें होती रही है,वो धारणा खत्म हो जाती है। क्या आम आदमी के बीच क्लासलेस सोसायटी इतनी आसानी से बननी है और संभव है। सच्चाई ये है कि इन चैनलों की ओर से आम आदमी शब्द के प्रयोग और फिर दिखायी जानवाली स्टोरी औऱ फुटेज पर गौर करें तो आपको अंदाजा लग जाएगा कि छोटे से छोटे और बड़े से बड़े वर्ग के बीच एक आम आदमी कम्युनिटी है। विश्लेषण की सुविधा के लिए चैनलों ने आम आदमी जैसे मुहावरे को तो हाथों-हाथ ले लिया,उसके कुछ नार्म्स पहचानकर छुट्टी पा ली लेकिन उसके सामने भी समवेत रुप से साफ नहीं है कि आम आदमी में आखिर किस-किस को शामिल किया जाए। इसकी बड़ी वजह है कि उनके विश्लेषण का आधार देश की सामाजिक संरचना न होकर सत्ता और राजनीति के गलियारों से निकलनेवालो जुमले और शब्द हैं। जिसे कि कई मीडिया विश्लेषक फील्ड की पत्रकारिता के खत्म होने के रुप में देखते हैं।

यही हाल ग्रामीण लोगों के लिए खबर दिखाते,बताते और बनाने के संदर्भ में है। औऱ चैनलों की अपेक्षा जी न्यूज बजट को लेकर ग्रामीण लोगों के सरोकार की चर्चा ज्यादा होती रही। लेकिन कृषि प्रधान देश की पाठ आधारित समीक्षा अभी तक इस बात को समझने की क्षमता नहीं पैदा कर सकी है कि ग्रामीण का मतलब सिर्फ किसान नहीं होता। क्या गांव में बाजार नहीं होते, क्या गांव में निवेश नहीं होता, क्या गांव की सामाजिक संरचाना में तेजी से बदलाव नहीं आ रहे। सरकार जब खाद,बीज और कर्ज पर सब्सिडी और माफी की बात करती है,तब बात समझ में आती है कि उसे आगे के पांच साल का भविष्य पक्की करनी है लेकिन न्यूज चैनलों के लिए ये समझदारी कितनी खतरनाक है, इसे शायद ही समझने की कोशिशें की जा रही हो। ये सही है कि समय के अभाव में चीजों का बारीब विश्लेषण संभव नहीं है लेकिन एक ही चीज को लेकर रंटत न्यूज कल्चर के बीच थोड़ी गुंजाइश तो बनती है कि खबरों के साथ-साथ बदलती सामाजिक संरचना को तफसील से समझा जाए।

आम आदमी की चिंता में स्टार न्यूज इस बात को सामने लाने की कोशिश करता है कि टैक्स पे करने की प्रणाली को इतना कॉम्प्लीकेटेड क्यों बनाया गया है। चालीस-चालीस पेज के रिटर्न पेपर क्यों भरने पड़ते हैं। दीपक चौरसिया के पास करीब डेढ़ हजार पेज की एक किताब है जो कि टैक्स से संबंधित है। उनका एक्सपर्ट से सीधा सवाल है कि ये कब कम होगा। एक्सपर्ट का जबाब है कि ये सब व्यूरोक्रेसी को बनाए रखने के लिए हैं, आम आदमी को परेशान करने के लिए है औऱ कुछ नहीं है।

दिन के ग्यारह बजे प्रणव मुखर्जी को बजट पेश करनी है। इससे एक घंटे और शायद उससे भी पहले आजतक और स्टार न्यूज पर फ्लैश होता है- पूरी बजट देखिए हिन्दी में। हिन्दी में सुनिए बजट। ये भी आम आदमी या आम दर्शक के लिए है। चैनल्स को पहले से पता है कि बजट अग्रेजी में पेश किया जाना है। अब जो लोग रोज आजतक औऱ स्टार न्यूज जैसे हिन्दी चैनल देखते हैं,लाइव देखते हैं,आज लाइव लेकिन अंग्रेजी में आने पर कहां जाएंगे। इसलिए आम आदमी की सुविधा के लिए प्रणव मुखर्जी जो कुछ बी अंग्रेजी में बोलेंगे उसे चैनल हिन्दी में प्रसारित करेगा। अंग्रेजी में जिन आम दर्शकों के हाथ तंग हैं उनके लिए इससे ज्यादा औऱ क्या चाहिए। लेकिन जब स्टार,आजतक सहित जी न्यूज और इंडिया टीवी के इस प्रयोग को देखा तो लगा कि प्रणव मुखर्जी के भाषण के बीच चैनल के लोगों द्वारा हिन्दी किया जाना एक अनावश्यक आवाज है जिसकी कोई जरुरत नहीं। ये बजट देखने औऱ सुनने में खलल पैदा कर रहा है। एक तो घटिया अनुवाद औऱ दूसरा कि प्रणव के बीच-बीच में कूद जाना एक ऐसा महौल पैदा करने लगा जैसे कोई मेले का अनाउंनसमेंट हो। मेरी तरह कई लोग अंग्रेजी चैनलों या फिर IBN7 या न्यूज24 की तरफ स्विच कर गए होंगे। इससे बेहतर सीएनबीसी आवाज का मामला रहा जिससे प्रणव मुखर्जी की आवाज को म्यूट करके सिर्फ हिन्दी में बजट को पेश किया। उम्मीद की जानी चाहिए कि हिन्दी न्यूज चैनलों ने अंग्रेजी की सामग्री को हिन्दी में इन्टरप्रेट करने का जो ट्रैंड शुरु किया है आगे ऑडियो क्वालिटी के साथ भाषा-समझ के स्तर पर अपने को सुधारेंगे।

इन सबों बातों के साथ हिन्दी न्यूज चैनलों को इस बात की क्रेडिट मिलनी चाहिए कि वो बजट जैसे गरिष्ठ मसले को सामान्य बनाने की कोशिश में लगे होते हैं। वो उन प्रसंगों को उठाते हैं जिसे कि देख-सुनकर एक सामान्य नागरिक उसमें अपने संदर्भों को खोज सके। आर्थिक मसलों के प्रति रुचि पैदा करने में इन चैनलों के योगदान को नजरअंदाज नहीं कर सकते। नहीं तो अब तक होता यही आया है कि इसे केवल वही देखे और समझे जो सीधे-सीधे तौर पर इससे जुड़ा है औऱ इसे समझने के लिए या तो एनडीटीवी प्रॉफिट देखे या फिर सीएनबीसी आवाज। लेकिन अगर किसी को टेक्निकल टर्म की समझ नहीं है तो गाल पर हाथ धरकर चुपचाप सुनता रहे। भाषाई खिलंदड़ेपन के साथ इन न्यूज चैनलों ने एक हद तक बजट को इन्टरेस्टिंग औऱ बजट के प्रति इन्टरेस्ट तो जरुर पैदा किया है।...

1 comment:

  1. वैसे अगर आपको बजट अंग्रेज़ी में ही सुनना भा रहा था तो आप इसे सीधे लोकसभा टीवी पर भी देख सकते थे। जहां से फ़ीड काटकर हर चैनल दिखा रहा था।

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