Tuesday, 21 July 2009

भकुआए टीवी पत्रकार आज आप हमें गरिआइए



ये अपने रवीश ने सूर्यग्रहण के चक्कर में अपना क्या हाल बना रखा है? बिखरे हुए बाल,चेहरा उड़ा हुआ,आंखें ऐसी कि बेमन से खोल-बंद कर रहे हों,पलकों के उठने-गिरने में जबरदस्ती करनी पड़ रही हो,ताकत लगानी पड़ रही हो। बोलने का उनका मन ही नहीं हो रहा। कभी हंसते हैं,कभी टेलीविजन प्रोफेसर बनकर ग्रहण के नाम पर पाखंड फैलानेवालों को रगेदते हैं। कभी अपने संवाददाता मनीष को गर्माते हैं। मेरी मां इसे हुरकुच्चा(जबरदस्ती)मारकर बोलना कहती है। यही हाल उधर इलाहाबाद की तट पर खड़े आजतक के एंकर और संवाददाता प्रतीक त्रिवेदी का है। बता रहे हैं कि अब अभी यहां स्वर्ग महसूस कर रहा हूं। जी न्यूज का संवाददाता प्रमोद बौला-सा इधर-उधर ताकते हुए बोले जा रहा है। वो समझ ही नहीं पा रहा कि नींद पर लगाम लगाए कि जुबान पर। न्यूज24 का संवाददाता कुरुक्षेत्र की भीड में घुसे जा रहा है,निकलने के लिए नहीं बल्कि लोगों के बीच औऱ गहरे धंसने के लिए। स्टूडियों से एंकर अखिलेश आनंद ने बोल दिया है कि कुरुक्षेत्र में हजारों की संख्या में लोग इस नजारे को देखने के लिए जुटे हैं,सरोवर में स्नान करने आए हैं,अब संवाददाता इस जुबान को सच करने में जुटा है। आजतक पर सोनिया सिंह और श्वेता सिंह की जोड़ी लगातार हमें बताए जा रही है कि हम आपके लिए जमीन से 41हजार फीट की उंचाई से तस्वीरें लाकर दिखा रहे हैं,हम वहां विमान से गए। एनडीटीवी लगातार दो मिनट तक नीतिश कुमार को नताश कुमार फ्लैश चलाता रहा। IBN7 ने अपने एक संवाददाता के आगे डॉक्टर लगा दिया।

सब चैनल अफरा-तफरी में। रात से ही कैमरा सेट लगा रहे हैं,सरोवर,छत,नदी और अटारी वहीं से वो लाइव कवरेज देंगे,रिपोर्टर पीटीसी देगा। सब परेशान,सब रात-रातभर के जगे हुए। आंखों के नीचे डार्कनेस लिए हुए। सूर्यग्रहण के चक्कर में न तो दिनभर ठीक से खाया-पिया और न ही पूरी नींद ली, बदहजमी और गैस से परेशान होने पर भी दिन-रात काम में लगे रहे। इस रतजग्गा के बीच जो कुछ भी दिखाए जा रहे हैं,दोस्तों उसे टीआरपी के लिए,सब बाजार के लिए जैसे फार्मूलाबद्ध जुमलों का इस्तेमाल करने से पहले जरा सोचिए। आलोचना के दायरे को बढ़ाइए,भाषाई स्तर पर कुछ नए प्रयोग कीजिए औऱ अपने पत्रकारों से पूछिए किसके लिए करते हैं,आप ये सब। मत कीजिए,हम बिना ये सब देखें ही जी लेंगे,आप हलकान मत होइए प्लीज। हम देर रात खस का शर्बत औऱ मैगी ले रहे होते हैं औऱ आप ट्राइपॉड पर सिर रखकर सुस्ताते हैं,हमे जरा भी अच्छा नहीं लगता।


किसके लिए करते हैं ये सब,हमारे जैसे देश के उन हजारों दर्शकों के लिए जो आपके हर काम को बस टीआरपी-टीआरपी का खेल कहकर दिन-रात कोसते रहते हैं। उन लाखों दर्शकों के लिए जिनके यहां टेलीविजन नहीं है और आपके डर को मारो गोली देखने से पहले ही ज्योतिषियों की दुकान जा पहुंचा है,पंडितों को लार टपकाने की खुराक दे आया है। हां,किसके लिए सूर्य ग्रहण देखने के स्पेशल चश्मा के बारे में बता रहे हो,जिसकी आंखों की रोशनी चली गयी उसके लिए या फिर उसके लिए जो नजर का चश्मा बनाने के लिए तीन पाव की जगह आधा किलो दूध घर में मंगाना शुरु कर दिया है। उस बूढ़े दर्शक के लिए जिसका बेटा पांच महीने पहले बल्लीमारान से सस्ता फ्रेम लाने का वादा करके गया सो अभी लौटा ही नहीं।

यकीन मानिए,देश का कोई भी संवेदनशील ऑडिएंस टेलीविजन पर अपने इन पत्रकारों की ये दशा देखकर गिल्टी फील किए बिना नहीं रह सकेगा। वो इनसे एक ही सवाल करेगा कि हमें लाइव कवरेज दिखाने के लिए आपको इतनी मशक्कत करने की क्या जरुरत पड़ गयी? हम आपकी नींद और चैन हराम हो जाने की शर्तों पर सबसे तेज नहीं होना चाहते। भाड़ में जाए सूर्य ग्रहण के वक्त हीरे-सा दिखनेवाला छल्ला। जाने दीजिए 123 साल बाद दिखे तो दिखे ये अजूबा दृश्य। इसके पहले भी कई अजूबा हुए,हम नहीं देख पाए तो क्या जिंदा नहीं है,क्या कोई असर पड़ रहा है हमारी सेहत को। हम नहीं चाहते कि खबरों की आपाधापी में दिल के साफ टीवी पत्रकार अब दिमाग से भी साफ हो जाएं। आपलोग खाइए,पीजिए,कोशिश कीजिए की ऑफिस ऑवर की ही खबरें हमें दिखाएं। ये रतजग्गा करके खबर दिखाने की कोई जरुरत नहीं है। हमें आपके बच्चों की पापा,चाचा और भइया का इंतजार करते हुए नींदाई आंखें देखी नहीं जाती। एक किस्स पर दुनिया लुटा देनेवाली आपकी पत्नी का रात-रातभर तक टीवी रुम और संकरी बालकनी के बीच का चक्कर लगाते रहना देखा नहीं जाता। आपको शायद पता नहीं कि आपके परिवार वालों की कितनी आह हमें लगती है। हमें जबरदस्ती बददुआ मत दिलवाइए। मेरे घर में पापा-भइया अक्सर दूकान से बहुत लेट आते हैं। मां कई बार थक-थककर सो जाती है। नींद में बड़बड़ाती है- चमोकन जैसन सट जाता है गाहक सब,तब इ लोग भी क्या करे,छोड़कर कैसे आ जाए। न जाने कितने मासूम ग्राहकों को,जिनके होने से हमारी रोजी-रोटी है,मां की बददुआएं मिलती है। क्या पता,आपकी पत्नी और मां भी कुछ ऐसा ही कहती हो कि जब देखनेवाले का मन ही नहीं उबता है तो आदमी को बाल-बच्चा,घर-परिवार तो सब झोंकना ही पड़ेगा न उसके आगे। आप हमारे लिए मत अपना परिवार झोंकिए।

आपको सच बताउं,रात-रातभर जागकर जो आप बनारस,तारेगना,गया,लखनउ और दुनिया जहान की तस्वीरें दिखा रहे हैं न उसको एक-दो दिन में ही हम बिसर जाएंगे। जब तक आपकी उबासी भी खत्म नहीं होगी कि गरियाने के मुहावरे इजाद कर लिए जाएंगे। अच्छी बात है कि आप हमें सतर्क कर रहे हैं कि इससे डरिए मत,मुकाबला कीजिए या फलां-फलां दान कीजिए। हर ब्राह्मण को महर्षि व्यास मानिए लेकिन 52 घंटे तक टीवी देखने के बाद भी पता नहीं क्यों मैं भीतर से उस तरह से भरा-भरा महसूस नहीं कर रहा जो कभी साइंस की एक पीरियड में या उपाध्यायजी के श्लोकों की व्याख्या में किया करता रहा। हम जानना चाहते हैं। दूसरी बात जब आप कोसी बाढ़ को लेकर कवरेज करते रहे तो कई बार मुझे कुछ रिपोर्टरों को देखते हुए लगा कि मैं उन्हें ब्रेक के वक्त पानी पिलाउं जैसा कि हमने मीडिया करियर के दौरान जिनके लिए लगा,किया,जब आप मुंबई बम विस्फोट जैसी घटना के लिए कवरेज कर रहे होते हैं तो नास्तिक होने के वाबजूद भी लगातार आपकी हिफाजत के लिए कविता,संदेश और एसएमएस के तौर पर कुछ शब्द व्यक्त होते रहे। लेकिन आज आप जिस तरह से हलकान हो रहे हैं,मेरे मन में एक ही सवाल उठ रहा है,अपने उपर ही शक हो रहा है कि ऐसे मौके पर हम संवेदना क्यों नहीं रख पा रहे,सिर्फ ग्लानि-बोध पैदा हो रहा है भीतर से जो कि हमने आपको इस हालत में लाकर छोड़ दिया। हम नंदीग्राम और लालगढ़ के बनते छोटे-छोटे संस्करण के आगे आपकी इस मेहनत को क्यों नहीं पचा पा रहे हैं? ये ग्लानि कुछ उसी तरह की है जैसे कोई मां सुहाग की निशानी बेचकर बेटे की जिद में साइकिल खरीदती है। ये वैसा ही अपराध बोध है जब हम अपने पिता के खाली जेब का हाल जाने बिना स्कूल की फीस मांग बैठते हैं। हम लाइव होने के चक्कर में,पसंद-नापसंद के फंदे में जकड़कर आपको बहाए लिए जा रहे हैं,आप बहे जा रहे हैं। आप हमारे भीतर न्यूज सेंस पैदा कीजिए ताकि आपको एक घटना को लेकर पॉलिएशन न करना पड़ जाए। एक ही स्टूडियों में पंडित, वैज्ञानिक,ज्योतिषाचार्य औऱ धर्मगुरुओं को बिठाने की नौबत न पड़ जाए। कल तक हमने आपको कोसा है कि आप बकवास दिखाते हैं,कूड़ा दिखाते हैं,आज आप हमें कोसिए,ऑफिस से फारिग होते ही घर जाकर पत्नी और बच्चों को भी साथ कर लीजिए और हम जैसी ऑडिएंस को समवेत कोसिए,गरिआइए कि हमने आपका जीना हराम कर दिया है,हम सुविधाभोगी हो गए हैं जो कमरे में बैठकर,बटरस्कॉच खाते हुए एक ही साथ भारत,जापान और प्रशांत महासागर पर सूर्यग्रहण को लेकर पड़नेवाले असर के बारे में जानना चाहते हैं। आप हमें गरिआइए तो सही,देखिए कि हम कैसे नहीं सुधरते हैं।

3 comments:

  1. गरियाते लेकिन ईएमआई का करें!

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  2. हा हा हा हा लाजवाब पोस्ट, बेहद मजेदार… वाकई आप बहुतै बारीकी से नज़र रखते हैं सभी चैनलों पर…। मैं भी सोच रहा था, कि कब यह मुआ सूर्यग्रहण खत्म हो और बेचारे घर जायें और कुछ नये शब्द ढूँढकर लायें…

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  3. उम्दा पोस्ट............. बेचारे रिपोर्टरों के साथ हमें भी सहानुभूति है.......... सचमुच अगर वे हमारे लिए इतनी तकलीफ उठाते हैं तो हमें बेहद ग्लानि हो रही है. कसम खाते हैं अब से कभी भी इस तरह के प्रोग्राम की मांग नहीं करेंगे (बल्कि हम तो किसी भी तरह के प्रोग्राम की मांग नहीं करेंगे)..... भले ही इनकी गाली खानी पड़े..........

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