Tuesday, 28 July 2009

टीआरपी का कंटेट से कोई संबध नहीं-अंबिका सोनी



टेलीविजन औऱ मीडिया में दिलचस्पी रखनेवाले लोगों के लिए 27 जुलाई को राज्य सभा में "देश के सांस्कृतिक मूल्यों के विरुद्ध विभिन्न चैनलों पर दिखाए जा रहे टीवी कार्यक्रमों में बढ़ती अश्लीलता और अशिष्टता" को लेकर होनेवाली चर्चा पर विचार करने की जरुरत है। भाजपा नेता औऱ टेलीविजन स्क्रीन पर अक्सर दिखनेवाले रविशंकर प्रसाद की ओर से टीआरपी के खेल को संसद के सामने रखने के बाद टेलीविजन,मनोरंजन,न्यूज चैनलों औऱ इन सबके बीच संस्कृति औऱ पारिवारिक मूल्यों के बचाए जाने की बात दूसरे सांसदों द्वारा जिस तरह से की गयी उससे साफ है कि वो टेलीविजन के मौजूदा रवैये से नाखुश हैं और आनेवाले समय में सरकार इसे गंभीरता से लेने जा रही है। हालांकि पूरी चर्चा में अधिकांश लोगों ने चैनलों पर नकेल कसने की बात से साफ इन्कार किया है वाबजूद इसके वो एक ऐसी मशीनरी डेवलप करना चाहते हैं जिससे कि टेलीविजन को बेलगाम होने से बचाया जा सके। इस पूरी चर्चा के बाद सूचना और प्रसारण मंत्री श्रीमती अंबिका सोनी ने अपनी तरफ से जो बात रखी है उससे इस बात का अंदाजा तो लगाया जा सकता है कि वो टेलीविजन को पूरी तरह सेल्फ रेगुलेशन के आधार पर चलने देने के पक्ष में नहीं है। लेकिन ये भी है कि अंबिका सोनी अपनी बात रखने के क्रम में जिस हमारी संस्कृति,हमारी परंपरा और पारिवारिक मूल्यों की बात करती है उसे फिर से देखना-समझना होगा औऱ इन सबके साथ अभिरुचि को भी शामिल करते हुए बातचीत को आगे बढ़ानी होगी। टेलीविजन को रेगुलेट करने के पहले संस्कृति औऱ परंपरा को लेकर जो भी आधार बने हैं,उससे हटकर हमें इनकी प्रैक्टिस को लेकर बात की जानी चाहिए और जरुरी है कि हम किताबी समझ से परे सीधे लोगों के बीच घुसकर संस्कृति,परंपरा और मूल्यों के बनने-बिगड़ने की बात पर अंतिम निर्णय के लिए तैयार हों। फिलहाल यहां अंबिका सोनी की बात को पेश कर रहा हूं। मकसद सिर्फ इतना भर है कि टेलीविजन को रेगुलेट करने के संबध में आपकी समझ क्या है प्रतिक्रिया के जरिए हमसे साझा करें-

सभा में सभी दलों के सदस्यों ने हमारे सामाजिक मूल्यों,हमारे पारिवारिक मूल्यों औऱ विशेषकर हमारे युवाओं के विकसित होते मन-मस्तिष्क पर आज के कुछ टेलीविजन कार्यक्रमों जो अत्यधिक हिंसा और अश्लीलता से भरे होते हैं,के पड़नेवाले कुप्रभाव के बारे में अपना दुख तथा अपनी गहरी चिंता व्यक्त की है। कभी-कभी हम सभी लोग सोचने लगते हैं कि टीवी चैनल,टीवी शो औऱ सिनेमा देखते रहने के कारण समाज में हिंसा बढ़ रही है। हम सभी लोग महसूस करते है कि यह एक अतिसंवेदनशील विषय है। प्रतिस्पर्धा से जुड़ी प्राथमिकताएं होती है।

एक तरफ अनुच्छेद 19 के अधीन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है,दूसरी तरफ सिविल सोसायटी,सांसदों,
गैर-सरकारी संगठनों,माता-पिताओं, कमजोर वर्ग की चिंताएं हैं जो उतने ही महत्वपूर्ण हैं औऱ न्यायालयों ने भी इस
मामले में निर्देश दिए हैं। लगभग हर किसी ने कुछ तंत्र बनाए जाने की जरुरत के बारे में कहा है,जो विश्वसनीय हो भले ही
वो स्व-नियामक क्यों न हो लेकिन निश्चय ही उसके पास निपटने और विभिन्न स्टेकहोल्डरों से अन्य बहुस सारे मुद्दों से
निपटने के लिए स्वतंत्रता हो।भारत संभवतः उन गिने-चुने देशों में से हैं जिसके यहां इस बारे में नियामक मौजूद नहीं है।
लेकिन पूरे विश्व में बहुत सारे देशों में इस प्रकार के नियामक मौजूद हैं। भारत में भी हमने पिछले कुछ वर्षों में कुछ तंत्र
विकसित किए हैं,हो सकता है ये प्रभावी न हों,लेकिन पर्यास किया गया है और हमें इसकी सराहना करनी चाहिए। यहां
नेशनल ब्राडकास्टर्स एसोसिएशन(एनबीए) और इंडियन ब्राडकास्टर्स फेडरेशन(आइबीएफ) हैं।इन संगठनों ने भी अपनी संहिताएं
स्थापित की है। इन बीते वर्षों में इस बात को कहीं अधिक महसूस किया गया है कि प्रसारण विधेयक लाकर एक भारतीय प्रसारण नियामक प्राधिकरण जैसे तंत्र की स्थापना किया जाए।
अतः समिति को इन सभी बातों को देखना होगा। सरकार एक वर्ष पहले ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की निगरानी के लिए एक तंत्र को लायी है। हमने चैनलों की संख्या 150 से बढ़ाकर तीन सौ कर दिया है। यह मामला इतना संवेदनशील है कि पारिवारिक मूल्य,हमारी संस्कृति,हमारी सांस्कृतिक विभिन्नता,हमारी सामूहिक सांस्कृतिक परंपराओं को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए। हमारा मंत्रालय इस दृष्टिकोण से प्रयास करता है। शायद आपको यह हैरानी होगी कि पिछले तीन-चार वर्षों में हमने 278 नोटिस दिए,कुछ चैनल बंद कर दिए गए। मैं विशेष रुप से श्री रंविशंकर प्रसादजी को कहना चाहती हूं कि वह इस मंत्रालय में मंत्री रह चुके हैं औऱ हमसे ज्यादा जानकारी रखते हैं। उन्होंने टीआरपी का मुद्दा उठाया है और यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। टीआरपी एक प्रेरक शक्ति है। बीएआरसी इस मुद्दे पर गौर करना चाहती है। टीआरपी उन कारणों में से एक है कि
लोगों को समाचार चैनलों से खबर नहीं मिल पाती। जब हमें खबर नहीं मिलती तो हम खबर बनाने के लिए विवश हो जाते हैं। नियामक निकाय का सृजन अत्यंत आवश्यक है। यह स्व-नियामक निकाय एकमात्र हल है। मुझे सभा को बताते हुए खुशी हो रही है कि पिछले सात सप्ताह से मंत्रालय में मेरे साथी औऱ मैं एनबीए,एबीएफ और एएससीआईआई औऱ व्यक्तिगत स्टेकहोल्डरों तीन बैठक कर चुके हैं कि इस मामले में आगे कैसे बढ़ना है। हमने राज्य सरकारों के साथ चर्चा की है। अधिकतर राज्य सरकारों ने इस कदम के समर्थन में उत्तर दिया है।

चैनलों द्वारा सभ्य समाज से प्राप्त कुछ सुझावों को लागू किया जा रहा है। परन्तु यह कारगर नहीं है।'पेरेन्टल लॉक्स' ऐसी चीज है जिस पर लगातार जोर दिया जा रहा है। चैनलों द्वारा स्व-विनियामक तरीके से अधिक जोर डाला जा रहा है। ये सभी चिंताएं तभी सार्थक है जब हम स्व-विनियामक दिशा में प्रगति कर सकें। ऐसा चर्चा द्वारा ही किया जा सकता है। हमें चैनलों को देखना बंद करना चाहिए। टीआरपी का उल्लेख किया गया है। ट्राई ने यह मामला'बीएआरसी' को सौंपा था परन्तु 'बीएआरसी' सरकार के साथ कोई तालमेल नहीं चाहता है। 'टीआरपी' उद्योग औऱ घरानों के बीच निजी रुप से चलाया जानेवाला एक संगठन है। इसका विषय-वस्तु के साथ कोई संबंध नहीं है। विज्ञापनों की सृजनात्मकता को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। हमने टीआरपी के संबंध में 'ट्राई' से संपर्क किया,उन्होंने कुछ सुझाव दिए। सूचना औऱ प्रौद्योगिकी मंत्रालय की स्थायी समिति ने भी अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया है। 'टीआरपी' से दूरवर्ती क्षेत्रों की इच्छा का पता नहीं चलता।
यह सुझाव दिया गया है कि उल्लंघनों के संबंध में कोई प्रभावी स्वतंत्र विनियामक नियामक होना चाहिए। मैं किसी अन्य निकाय के मौजूद न होने के कारण स्व-विनियामक की सराहना करती हूं। वेबसाइट पर मसौदा विधेयक डाले जाने का अभिप्राय औऱ अधिक आदान प्राप्त करने और राष्ट्रीय बहस से था। इसे सर्वाधिक सर्वसम्मति प्राप्त होनी चाहिए। मुझे आशा है कि मुझे माननीय सदस्य कुछ और समय देंगे।

नोटः- इस चर्चा में श्याम बेनेगल,राजीव शुक्ला,वृंदा कारत,कलराज मिश्र सहित करीब 12-13 दूसरे सासंदों ने भी अपनी बात रखी। विस्तार से जानने के लिए हम नीचे डाल दे रहे हैं। सरकारी अनुवाद की वजह से आज की पोस्ट की हिन्दी थोड़ी कठिन औऱ रोजमर्रा भाषा से अलग है। पूरी बात समझने के लिए आपको अतिरिक्त मेहनत करनी होगी। इसलिए हम नीचें अंग्रेजी कंटेट के लिए भी लिंक डाल दे रहे हैं।

हिन्दी के लिए-http://164.100.47.5/newsynopsis1/hindisessionno/217/Synopsis%20_Hindi_%20Dt.%2027.7.2009.pdf
अंग्रेजी के लिए- http://164.100.47.5/newsynopsis1/hindisessionno/217/Synopsis%20_Hindi_%20Dt.%2027.7.2009.pdf

4 comments:

  1. विनीत भाई, कोई न कोई रेगुलेशन का तरीका तो अवश्य होना चाहिये, क्योंकि जब इस देश का आम आदमी सड़क पर ट्रेफ़िक में या सार्वजनिक मूत्रालय में भी अनुशासनहीन बना रहता है तो मीडिया जैसे अनाकोण्डा को इस तरह खुल्ला छोड़ना कहाँ तक उचित है? इस रेगुलेशन का तरीका क्या हो यही सोचने का विषय है…

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  2. जिस दिन ब्लॉग पढ़ने वालों की संख्या भी लाखों-करोड़ों में पहुँच जायेगी, तब इस विधा को भी रेगुलेट करना पड़ेगा, तब तक कोई खतरा नहीं, क्योंकि ब्लॉग पढ़ते ही कितने लोग हैं। चैनलों की बात और है, उनके पास पैसा है, पावर है, "पत्रकार" नामक कवच-कुण्डल है, लॉबी है… बेचारा ब्लॉगर तो इन सुविधाओं का मोहताज है…

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  3. क्या टेलीविजन टीआरपी से आगे कुछ नहीं हो सकता?

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  4. donon pdf file hindi ka hai...shyam benegal ko aap as it is chhapen..

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