Monday, 5 April 2010

टेलिविजन की स्टैंडिंग कामेडी



मूलत: प्रकाशित- दैनिक जागरण 1 अप्रैल 2010
स्टैंडिंग कॉमेडी। टीवी पर यह नई चीज है। इसमें स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर सस्ती गॉसिप्स हैं, जजों के बेवजह ठहाके हैं, डबल मीनिंग पैदा करने वाले जबर्दस्ती के प्रयोग हैं, तो बोलने से ज्यादा हरकतों से हास्य पैदा करने की कोशिश है.. यही टेलीविजन की स्टैंडिंग कॉमेडी का चालू फार्मूला है। कंटेंट को लेकर थोड़ी-बहुत हेर-फेर के साथ टेलीविजन पर कॉमेडी के नाम पर जो भी शो दिखाए जा रहे हैं, वे इसी फार्मूले को अपना रहे हैं। इस फार्मूले को तोड़ना भले ही जरूरी हो, लेकिन फिलहाल टेलीविजन की स्टैंडअप कॉमेडी इससे अलग नहीं सोच पा रही है। क्योंकि व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के बावजूद न तो टीआरपी के स्तर पर इसे शिकस्त मिली है और न ही इसने अपनी संभावनाओं को सीरियसली समझने की कोशिश की है। वरना, निजी समाचार चैनलों में (जहां मीडिया का सरोकार मुद्दों और सवालों से हटकर फीलगुड खबरों की तरफ होता जा रहा है) ये शो हास्य-व्यंग्य अंदाज में सप्लीमेंटरी जर्नलिज्म की भूमिका जरूर निभा पाते।

निजी मनोरंजन चैनल दूरदर्शन और निजी चैनलों के पुराने कार्यक्रमों को काफी हद तक फॉलो करते रहे, लेकिन कॉमेडी के मामले में वे इससे एकदम अलग हो गए। दूरदर्शन के मुंगेरीलाल के हसीन सपने, मेड इन इंडिया और टी टाइम मनोरंजन जैसे कार्यक्रमों की एक लंबी फेहरिस्त रही है, जिसमें स्वाभाविक हंसी पैदा करने की ताकत के साथ एक सोशल कंसर्न भी रहा है। शुरुआती दौर के निजी चैनलों के कार्यक्रमों में भी यह अंदाज बरकरार रहा। इसमें आप मूवर्स ऐंड शेकर्स, ऑफिस-ऑफिस और राजनीतिक घटनाओं पर आधारित पोल-खोल जैसे कार्यक्रमों को शामिल कर सकते हैं। यहां तक कि ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज ने कॉमेडी के ग्रामर को पूरी तरह बदल दिया।

पहले के दो एपीसोड में उसने भी कॉमेडी में सोशल कंसर्न और स्वाभाविक हंसी को बरकरार रखा। उसने कॉमेडी को पॉपुलर और कमाऊ बनाने के लिए कई प्रयोग किए, जिसमें भाषा के साथ-साथ अभिनय शामिल है। तब भी व्यंग्य के जरिए सोशल रिपेयरिंग का काम जारी रहा। इन दोनों एपीसोड के अधिकांश कलाकारों ने अपनी-अपनी समझ और पकड़ के हिसाब से चरित्र गढ़े और फिर समाज का हाल बयान किया। ये चरित्र औसत दर्जे के वे भारतीय रहे, जो रीति-रिवाज, राजनीति, सिनेमा, सामयिक मसलों पर अपने तरीके से रिएक्ट करते हैं। राजू श्रीवास्तव के चरित्र गजोधर, छुट्टन, बिसेसर, सुनील पाल का रतन नूरा, एहसान कुरैशी का हकला और नवीन प्रभाकर की जूली, ये ऐसे ही औसत दर्जे के चरित्र हैं, जो आर्गूमेंटेटिव इंडियन के तौर पर हमारे सामने आते हैं। जो समाज की विसंगतियों पर प्रतिक्रिया देते हैं। इस कॉमेडी में स्वाभाविक स्तर पर ठहाकों की अपील के साथ सामाजिक स्थिति की समझ भी मौजूद है।

एक तरफ मनोरंजन चैनलों के ऐसे कार्यक्रम हिट हुए, तो दूसरी तरफ न्यूज चैनलों ने इसके बीच से एवरेज टीआरपी जुटा लेने का फार्मूला निकाल लिया। नतीजा यह हुआ कि दूसरे चैनलों पर भी इस तरह के कॉमेडी शोज की बाढ़ आती गई और न्यूज चैनलों के लिए इसके फुटेज काटकर स्पेशल स्टोरी बनाया जाना खबर का अनिवार्य हिस्सा बनता चला गया। नतीजा हमारे सामने है। शुरुआती दौर के लॉफ्टर चैंपियनों के पास अब नया कहने के लिए नहीं रह गया। उनकी बातों से सोशल कंसर्न गायब होने के साथ-साथ ह्यूमर भी जाता रहा। इधर आए तमाम नए शो में मिमिक्री, सी ग्रेड एक्टिंग और सॉफ्ट इश्यू ही दिखाई पड़ रहे हैं। अभिनय में भोंडापन आता जा रहा है और डबल मीनिंग के प्रभाव में भाषा एमएमएस, एसएमएस के पोर्न चुटकुले जैसा असर छोड़ रही है। अब इसे देखने और समझने के लिए टीवी ऑडियंस में एडल्ट होने का एहसास अनिवार्य है। यह सिर्फ कॉमेडी सर्कस जैसे शो में ही नहीं, बल्कि बच्चों के शो छोटे मियां -जंग छोटे हंसगुल्लों की में मौजूद है। मम्मी-पापा, टीचर और पड़ोसी पर बनाए गए चुटकुले जब आप बच्चों की जुबान से सुनते हैं, तो लगता है कि इनका बचपन अब बस आवाज और लुक तक ही रह गया है। बाकी मामलों में वे एक वयस्क की ही तरह रिएक्ट करते हैं।
ऐसा होने से टीवी पर दिखाई दे रही कॉमेडी की दुनिया पहले के मुकाबले सिकुड़ गई है। साहसिक तौर पर व्यवस्था पर चोट करने की बजाय यह आयोजन सेफ जोन का मैनेजिंग इवेंट बन गया है। जब न्यूज चैनल ही सरोकारों को लेकर प्रतिबद्ध नहीं रह गए, तो इनसे सरोकार की उम्मीद करना बेमानी होगा। लेकिन यह सवाल तो उठता ही है कि बदलाव की गुंजाइश रखने वाली इस कॉमेडी का दायरा क्या इतना सीमित होना चाहिए? क्या इसे पोर्नोग्राफी टेक्स्ट जैसा सुख लेने भर के लिए खुला छोड़ देना चाहिए। यकीन मानिए जिस स्तर की भाषा और लहजे का प्रयोग बुरा न मानो कॉमेडी है के नाम पर किया जाता है, उसमें स्त्री-छवि और क्षेत्रीय अस्मिता के आग्रह-दुराग्रह को लेकर कई सवाल उठ खड़े हो सकते हैं।

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