Thursday, 29 January 2009

चैनल के लोग भी करते हैं, चैनल की आलोचना


टेलीविजन और न्यूज चैनलों के रवैये पर विरोध करने वाले क्या केवल वे लोग ही हैं जो या तो नेता होने के नाते इसके उपर नकेल कसना चाहते हैं,अफसर होने के नाते इस पर अपनी अकड़ जमाना चाहते हैं या फिर ऑडिएंस होने के नाते इसे भला-बुरा कहकर अपनी भड़ास निकालना चाहते हैं। आमतौर पर टेलीविजन और न्यूज चैनलों के बारे में जब बात करते हैं तो हम लगभग पहले से ही मान लेते हैं कि चैनल,मीडिया औऱ टेलीवजिन से जुड़े लोग इसके विरोध में नहीं बोल सकते। वो इस पेशे से जुड़े हैं इसलिए उन्हें इसमें किसी भी तरह की बुराई दिखाई नहीं देती है या फिर उनके उपर कुछ इस तरह का दबाब होता है कि वो आत्म-आलोचना नहीं कर सकते। लेकिन दिलचस्प है कि चैनल के लोगों के बीच अब भी इतना माद्दा है कि इसके लिए, इसके भीतर और दिन-रात इसके बारे में सोचते हुए भी इसकी कमजोर नसों पर उंगली रख सकते हैं। मीडिया मंत्र का ताजा अंक जो कि जनवरी-फरवरी संयुक्त्तांक है, उसे पढ़ते हुए अपनी समझ कुछ इसी तरह की बनती है।

मीडिया मंत्र का ये अंक मुंबई आतंकवाद और न्यूज चैनलों की भूमिका पर केंद्रित है। कवर स्टोरी के तौर पर आतंकवादी घटनाओं के सीधे प्रसारण का औचित्य पर विस्तार से बात की गयी है। न्यूज चैनलों के रवैये और उससे असहमति रखनेवाले पत्रकारों की बात करें इससे पहले इतना मानना जरुरी है कि देश की किसी भी पत्रिका या अखबारों के विशेषांक ने आतंकवाद के खिलाफ मीडिया की भूमिका को लेकर एक पूरा अंक निकाला हो,कहीं नजर नहीं आया,उन विषयों को सामने लाने की कोशिश की हो जिसमें आतंकवादी घटनाओं को कवर करने के लिए अलग से ट्रेनिंग की जरुरत पर बात करते हों। मीडिया मंत्र के इस अंक में दीपक चौरसिया औऱ असगर वज़ाहत इन दोनों ने इस बात की चर्चा शिद्दत से की है कि इसके लिए अलग से ट्रेनिंग हो,लोगों की राय ली जाए मीडिया संस्थान औऱ चैनलों के सहयोग से सेमिनार और वर्कशॉप आयोजित किए जाएं। न्यूज चैनल अपने स्तर से जो भी स्ट्रैटजी बनाते हैं और उनके काम करने के जो भी तरीके हैं वो काफी नहीं है, उनके भीतर काम कर रहे लोगों को भी ट्रेंड होने की जरुरत है, इस अंक से ये बात खुलकर सामने आती है।

अब बात करें न्यूज चैनलों से लोगों की असहमति औऱ उनके द्वारा होनेवाली गड़बड़ियों को सामने लाने की। इस अंक की सबसे दिलचस्प बात है कि न्यूज चैनलों के रवैये को लेकर दो ध्रुव में बंटे विचार सामने आते हैं। अब तक तो होता यही आया है कि चैनलों की आलोचना या तो मीडिया समीक्षक करते रहे हैं,इसे अपने तरीके से नियंत्रित करने की गरज से सरकार करती आयी है या फिर अपनी पसंद-नापसंद औऱ समझ के हिसाब से ऑडिएंस करती आयी है। लेकिन यहां मामला बिल्कुल है। इस अंक में चैनलों की आलोचना वो लोग भी कर रहे हैं जो सीधे-सीधे किसी न्यूज चैनल से जुड़े हैं और चैनल की तारीफ वो कर रहे हैं जो मीडिया आलोचक की हैसियत से अपनी बात करते आए हैं। इससे एक बात तो साफ है कि टीवी पत्रकारों में प्रोफेशन के अलावे भी अपनी बात रखने में रुचि है। कई लेखों और इंटरव्यू में इन लोगों ने खुलकर कहा है कि वो एक पत्रकार होने के पहले देश के एक नागरिक हैं। इसलिए आप उम्मीद कर सकते हैं कि वो नागरिकों के पक्ष में भी बात कर सकते हैं। मीडिया मंत्र के इस अंक में तो ये साफ तौर पर दिखाई देता है। विनोद कापडी(प्रबंध संपादक,इंडिया टीवी)सीधे-सीधे टेलीविजन की भाषा और उस पर दिखाई जानेवाली चीजों पर अपनी आपत्ति दर्ज करते हैं और स्पष्ट कर देते हैं कि ये किसी भी सभ्य समाज के लिए स्वीकार्य नहीं है। दिलीप मंडल(एडीटर, इटी हिन्दी.कॉम) ने संभावना जताते हुए कहा जो कि वाकई गंभीर है कि भारत में जिस तरह से ब्रेकिंग न्यूज स्क्रीन को वाइब्रेट और रोचक बनाने रखने के लिए टूल के रुप में इस्तेमाल किया जा रहा है, एक समय बाद ये शब्द स्क्रीन को रोचक बनाने की भूमिका खो देगा। मुंबई आतंकवाद को लेकर न्यूज चैनलों ने जो कुछ भी किया उसे लेकर संजय तिवारी(संपादक, विस्फोट.कॉम) का सीधा सवाल है कि अगर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में मीडिया इतना ही ईमानदार होता तो बीच में विज्ञापनों का ब्रेक न चलाता, चिल्ला-चिल्लाकर अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने की दुहाई न देता। अगर असल मुद्दा आतंकवाद है तो फिर चैनलों के ब्रांडों पर असली पत्रकारिता की अलाप क्यों लगायी जाती। चंदन प्रताप सिंह(टोटल टीवी) इस मंजर को शैशवकाल की टीवी पत्रकारिता के जिद्दी नौनिहाल की संज्ञा देते हैं।
दूसरी तरफ मीडिया आलोचक हैं जो मीडिया की आलोचना करते हुए भी मुंबई आतंकवाद, चैनलों की आजादी औऱ प्रेस की अपनी स्वतंत्रता के समर्थन में बात करते हैं। आनंद प्रधान( मीडिया विश्लेषक और अध्यापक)स्पष्ट तौर पर आतंकवादी के लाइव फोनो का कोई जस्टिफिकेशन सही नहीं है मानते हैं,चैनल ने ऐसा करके गलत किया है। लेकिन चैनलों में कमियां होने और गलतियां करने के वाबजूद सरकार की ओर से अंकुश लगाए जाने के विरोध में हैं। आलोक पुराणिक( मीडिया विश्लेषक और व्यंग्यकार) के मुताबिक मुंबई जैसी घटना को लेकर जो चूक हुई हैं, वो स्वाभाविक है। इस बिना पर आप ये नहीं कह सकते कि इस घटना को दिखाने वाले पत्रकार कोई कमर्सियल खूंखार दरिंदे लोग थे जो किसी भी शर्त पर इस घटना को दिखाना चाहते थे। इसी अंक में दीपक चैरसिया ने बताया है कि साठ दिनों तक चैनल के बच्चे से लेकर टॉप लेवल के लोगों तक ने साठ दिनों तक एक बार भी टीआरपी शब्द जुबान पर नहीं लाया।
इन दो अलग-अलग विचार समूहों के अवाले आशुतोष(मैनेजिंग एडीटर आइबीएन7), अजीत अंजुम( प्रबंध संपादक, बीएजी फिल्म्स एंड मीडिया लिमिटेड के प्रबंध संपादक),सुप्रिया प्रसाद(डायरेक्टर न्यूज 24),विनोद मेहता(डायरेक्टर, टोटल टीवी) जैसे मीडिया की बड़ी हस्तियों ने न्यूज चैनलों के उपर लगे आरोपों का जबाब अपने-अपने तरीके से दिया है। मीडिया के परस्पर विरोधी विचारों को समझने और विश्लेषित करने के लिहाज से इन्हें पढ़ा जाना जरुरी है। दीपक चौरसिया की डायरी मुंबई आतंकवाद औऱ उसके बाद ताज के कमरा नंबर 1705 में जाकर रुकने का अनुभव दिलचस्प है।
मीडिया खबर डॉट कॉम और मीडिया मंत्र के साझा सर्वे में मुंबई आतंकवाद और न्यूज चैनलों को लेकर लोगों के बीच जो भी प्रतिक्रिया रही है, वो सबकुछ काफी हद तक ऑकड़ों के रुप में सामने आया है। चैनल से जुड़े लोग अगर इन आंकड़ों पर गौर करते हैं तो काफी कुछ अलग समझ बनेगी जो कि उनके टैम की प्रोग्रेस रिपोर्ट में नहीं होते।

1 comment:

  1. विनीत भाई अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग है।

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