Tuesday, 10 March 2009

जहां बेटी जनने का अधिकार नहीं


जा लल्ली भगवान के घर और साथ में हमारी फरियाद भी लेती जा कि हमें लल्ली नहीं, लल्ला चाहिए। इतना कहते ही अभी-अभी जन्मी अपनी बेटी को प्रताप मां का दूध मिलने के पहले ही जहरीले दूध के हवाले कर देता है, हाथ जोड़ता, मानो ऐसा करने के लिए वो उस अबोध बच्ची से माफी मांग रहा हो। पीछे से रोती-पिटती उसकी मां आती है लेकिन इसका कोई भी असर नहीं होता।
ऐसा नहीं है प्रताप ही अकेला है जो ऐसा करता है। उसके पहले भी गांव के सारे लोग ऐसा ही करते आए हैं, बेटी के जन्म लेते ही वो मां के दूध मिलने के पहले ही उसकी जान ले लेते हैं। ऑडिएंस को पूरी तरह भावुक कर देनेवाले अंदाज में कलर्स के नए सीरियल न आना इस देश लाडो की शुरुआत होती है। अपने प्रोमो में चैनल करीब दस दिनों से चलाता आ रहा है- कलर्स पर होंगे जज्बात के दो नए रंग, एक में जहां बेटी के पैदा होते ही मनायी जाती है खुशियां और दूसरे में बेटी पैदा होते ही पसर जाता है मातम। ये दोनों सीरियल क्रमशः मेरे घर आयी एक नन्ही परी और न आना इस देश लाडो है।

मेरे घर आयी एक नन्हीं पर की कहानी विभाजन की मार झेल चुके रोशन लाल से जुड़ी है। रौशन लाल जिसे कि लाला कहते हैं, विभाजन के दौरान गुनीता कौर से मिलते हैं और चांदनी चौक में रहना तय करते हैं। रौशन लाल इमरती की दूकान चलाता है और विभाजन की दर्द को अपने घर एक बेटी पैदा होने की एवज में भूलने की कोशिश करता है। सीरियल में लालाजी की फैमिली को देखते हुए उस पर खुशहाल परिवार का ठप्पा लगाने पर ऑडिएंस को कोई परेशानी नहीं होती। लालाजी के यहां एक बेटी का जन्म होता है जिसका कि चांदनी नाम रखा जाता है। बाद में पूरी कहानी चांदनी के आसपास ही घूमनी है। वो कैसे हंसती है, कैसे तुतलाकर बोलती है, पहली बार दांत आने पर डेंसिट के यहां जाना सबों के लिए कैसे उत्सव हो जाता है. पहली बार स्कूल जाते हुए कितनी प्यारी लगती है और....इसी क्रम में आगे भी। इस सीरियल को वालिका-वधू या फिर उतरन की तरह समस्यामूलक सीरियल नहीं कहा जा सकता। हां इतना जरुर है कि जिस तरह से एक लड़की के पैदा होने पर देश के अधिकांश हिस्से में अभी भी लोग उदासीन हो जाते हैं, संभव है एक हद तक ये सीरियल एक हद तक ऑडिएंस को लड़कियों से भी प्यार करना सिखाएगा। लड़की होते ही दुत्कारे जाने के बजाय, उसकी एक-एक अदा पर नोटिस लेने और मोहित होने शुरु कर दें।
लेकिन न आना इस देश लाडो की कहानी पूरी तरह समस्यामूलक है। सीरियल के मुताबिक हरियाणा के करनाल से दस किलोमीटर आगे एक गांव है वीरपुर। वीरपुर में लड़की के पैदा होते ही मार दिया जाता है। उस गांव की परंपरा है कि यहां के लोग बारात लेकर जाते हैं, यहां कोई बारात आता नहीं है. अगर ऐसा होता है तो पूरे गांव की नाक कट जाती है। सीरियल के दो मिनट शुरु हुए भी नहीं हुए कि इस परंपरा का निर्वाह प्रताप के अपनी बेटी को मार दिए जाने से शुरु हो जाती है।
वीरपुर में अम्माजी का वर्चस्व है। अम्माजी,वो चरित्र जिसके आगे पुलिस-प्रशासन सब पांव की जूतियों के बराबर है। ये सब उनके आगे-पीछे चिरौरी करते नजर आते हैं। बेटी के पैदा होते ही मार दिए जाने का रिवाज अम्माजी की सख्ती के कारण ही लागू है। बालिका-वधू सीरियल में जिस तरह दादीसा की मर्जी के बिना घर का एक पत्ता-बर्तन भी नहीं हिल सकता है, उसी तरह इस सीरियल में अम्माजी की मर्जी के बिना वीरपुर के किसी भी घर में बच्चा नहीं जना जा सकता।
न आना इस देश लाडो में लड़की-स्त्री के उपर होनेवाले भेदभाव को सांकेतिक तौर पर जगह-जगह दिखाने की सफल कोशिश है। अम्माजी का जन्मदिन है और इस मौके पर वो खैरात( मुफ्त में चीजें बांटना) बांटती है। बांटने के पहले ही अछूत का व्यवहार करती हुई लुगाई सब को पीछे हो जाने का आदेश देती है। हवेली पहुंचने पर अम्माजी के स्वागत में सारी बहुएं बारी-बारी से आतीं हैं। वो बहुएं जो पहले लड़की जन चुकीं हैं, अम्माजी उसे दुत्कारते हुए पीछे हटने को कहती है। बहुएं कोने में जाकर लड़की पैदा करने की वजह से बिसूरती हैं। लेकिन चंदा को अम्माजी गले से लगाती है, उसे ढंग से खाने-पीने की सलाह देती है। चंदा बच्चा जननेवाली है और पहले से ही अल्ट्रासाउंड के जरिए ये पता करा लिया है कि इसे लड़का होनेवाला है। पोते की उम्मीद में अम्माजी पर खुमारी-सी चढ़ जाती है। यहां आकर कहानी बालिका-वधू से मेल खाती है जहां दादीसा पोते का मुंह देखने के लिए अपने बेटे बसंत की बार-बार शादी कराती है और देश की एक बालिका फिर वधू वधू बनने के लिए मजबूर होती है।
अम्माजी का बेटी के प्रति घृणा और आतंक इस हद तक है कि चंदा डॉक्टर को पैसे देकर रिपोर्ट बदलवाती है और पेट में बेटी के पलने के वाबजूद भी रिपोर्ट में बेटा होने की घोषणा लिखवा आती है। सीरियल यहां साफ कर देता है कि सरकारी पाबंदी के वाबजूद भी देश के कई इलाकों में जन्म से पहले लिंग जांच का काम पैसे ले-देकर धडल्ले से चल रहा है। वो बेटी जनना चाहती है, वो मां कहलाना चाहती है।..
अब तक के एक ही एपिसोड में सीरियल की शुरुआत मार्मिक तरीके से होती है। इस घोषणा के साथ कि वो देश से बेटी के साथ हुए दुर्व्यवहार को खत्म करने की छोटी-सी कोशिश कर रहे हैं। इसमें संदेह नहीं कि कलर्स ने जिस तरह से सीरियलों का रुख बदला है,उसे सोप ओपेरा के इतिहास में एक नया फेज ही कहा जाएगा। सीरियल का मतलब सास-बहू की चिकचिक और वूमेन स्पेस से अलग इसने सीरियल फॉर ऑल का कान्सेप्ट दिया। अब तक के इस तरह के सीरियलों की पॉपुलरिटी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऑडिएंस इन दोनों सीरियलों को हाथों-हाथ लेगी। लेकिन फिर वही दावा कि टेलीविजन इसके जरिए सामाजिक विकास कर रहे हैं, इसे मानना ज्यादती हो जाएगी। टेलीविजन के ट्रीटमेंट से सामाजिक विकास संभव नहीं है, एक हद तक जागरुकता आ सकती है लेकिन बिना स्टेट मशीनरी के सक्रिय हुए इन मसलों पर बात करना जज्बातों को जिंदा रखने की कोशिश भर ही है।.

5 comments:

  1. उधर सीरियल चालू

    इधर तुलना बेकाबू

    तोल दिया है

    सच खोल दिया है

    बुन दिया है

    ताना बाना

    गाहे-बगाहे नहीं

    रोज प्रतिशोज

    पर बुराईयों से

    है प्रतिशोध।

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  2. सोमवार की रात उतारन के साथ ही बिना किसे नंबरिंग के शुरू कर दिया गया था, जिसने लोगों को उठने का मौका ही नहीं दिया होगा और जोड़ लिए होंगे दर्शक..

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  3. टी वी चैनलों ने मनोरंजक सामग्री परोसने के फेर में जिस तरह से सामाजिक सरोकारों से अपना नाता पूरी तरह तोड़ लिया था ,उस दिशा में कलर्स के प्रयास की सराहना करनी ही होगी.
    दृश्य प्रसंग तुंरत भले कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं ला सकते पर इसके गहरे और दूरगामी प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता....देखते देखते सोच में बदलाव आ ही जाते हैं...जितनी नकारात्मक बातें दृश्य श्रव्य माध्यम से प्रभावित करती हैं,सकारात्मक बातें कुछ धीमी सही पर पूर्णतः अप्रभावी भी नहीं रहती हैं.

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  4. रंजना जी की बात से सहमत!


    होली महापर्व की बहुत बहुत बधाई एवं मुबारक़बाद !!!

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  5. इस मामले में कलर्स चैनल की सराहना तो करनी हे पड़ेगी सबसे बड़ा सवाल है कि लोग इसे किस रूप में लेते है और दूसरी बात कि इन केबल चैनलों कि पहुच वास्तव में उस जगह तक है

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